बैसाखी सिखों का एक प्रमुख त्योहार है। वैसे ते भारत में जितने धर्म है उतने ही त्योहार है। प्रत्येक धर्म का कोई ना कोई त्योहार यहां हर दिन मनाया जाता है। बैसाखी इन्हीं प्रमुख धर्मों में से एक सिख धर्म का त्योहार है। बैसाखी का त्योहार आज पूरे देश में मनाया जाता है किन्तु इसे विशेष रुप से पंजाब में मनाया जाता है। इसे पंजाबियों का महत्वपूर्ण त्योहार भी मानते हैं। बैसाखी एक मौसमी त्योहार है जो किसानों की मेहनत का प्रतिनिधित्व करता है। बैसाखी नाम वैशाख से बना है। बैसाखी पंजाब और आसपास के प्रदेशों का सबसे बड़ा त्योहार है। यह रबी की फसल के पकने की खुशी का प्रतीक है। इस दौरान रबी की फसल पककर तैयार हो जाती हैं। फसल कटने के बाद किसान नए साल का ज़श्न मनाते हैं। इसी दिन, 14 अप्रैल 1699 को दसवें गुरु गोविंद सिंहजी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। सिख इस त्योहार को सामूहिक जन्मदिवस के रूप में भी मनाते हैं। बैसाखी का त्यौहार लोगों में आपसी भाईचारे और प्रेम का संचार करता है। बैसाखी की धूम पूरे पंजाब में रहती है। उतरी भारत में इसे पंजाबी नववर्ष भी माना जाता है। यह वो समय होता है जब पूरे साल किसान मेहनत कर अपनी फसलों को उगाते हैं और बैसाखी के समय उसे काट कर एकत्र करते हैं। क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है यहां किसानों को अन्नदाता भगवान कहा जाता है। वही अन्नदाता अपने उगाए अन्न को देख खुश होकर यह त्योहार मनाता है औऱ भगवान का शुक्रिया अदा करता है। इस वर्ष बैसाखी का त्योहार 13 अप्रैल सोमवार को मनाया जाएगा।

बैसाखी उत्सव

बैसाखी का पर्व क्यों मनाया जाता है?

बैसाखी मनाने के पीछे सबसे पहली मान्यता यह रहीं है कि इस दिन सूर्य मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करता है। बैसाखी के दिन ही गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। साथ ही आज के दिन ही गुरू गोविंद सिंह ने अपने पांच प्यारे को अमृतपान करवाया था। बैसाखी के दिन ही शौर्य कैलेंडर को मानने वाले लोग नया साल मनाते हैं। क्योंकि शौर्य गणना के मुताबिक इस दिन नए साल का आरंभ होता है। उड़ीसा में इस दिन को नए साल का आगमन माना जाता है। सूर्य की स्थिति परिवर्तन के कारण इस दिन के बाद धूप तेज होने लगती है और गर्मी शुरू हो जाती है। इन गर्म किरणों से रबी की फसल पक जाती है। इसलिए किसानों के लिए ये एक उत्सव की तरह है। इसके साथ ही यह दिन मौसम में बदलाव का प्रतीक माना जाता है। अप्रैल के महीने में सर्दी पूरी तरह से खत्म हो जाती है और गर्मी का मौसम शुरू हो जाता है। मौसम के कुदरती बदलाव के कारण भी इस त्योहार को मनाया जाता है। इस त्योहार के दिन लोग गुरु सिख गुरु गोबिंद सिंह के मंदिर के लिए जाते है और समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं। बैसाखी एक किसानो के त्यौहार के रूप में पंजाब और हरियाणा राज्यों में बड़े कृषक समुदाय द्वारा मनाया जाता है। यह किसानों द्वारा भगवान को धन्यवाद देने का दिवस है।

बैसाखी का महत्व

बैसाखी का त्योहार विशेष रूप से भारत के उत्तरी हिस्से में, नए साल की शुरुआत का प्रतीक है। यह उन कुछ भारतीय त्यौहारों में से एक है जिनकी एक निश्चित तिथि है। पंजाब और हरियाणा के अलावा उत्तर भारत में भी बैसाखी के पर्व की बड़ी मान्यहता है। देश के दूसरे हिस्सों में भी बैसाखी को अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। बैसाखी एक कृषि पर्व है। पंजाब में जब रबी की फसल पककर तैयार हो जाती है जब बैसाखी मनाई जाती है। वहीं, असम में भी इस दौरान किसान फसल काटकर निश्चिंत हो जाते हैं और त्यो हार मनाते हैं। असम में इस त्योनहार को बिहू कहा जाता है। वहीं, बंगाल में भी इसे पोइला बैसाख कहते हैं। पोइला बैसाख बंगालियों का नया साल है। केरल में यह त्योबहार विशु कहलाता है। तमिल में इस पर्व को पुथंडु, जिसे पुथुरूषम या तमिल नववर्ष भी कहा जाता है, यह तमिल कैलेंडर, चिथीराई माह का पहला दिन होता है। बिहार में इसे जुर्शीतल के रुप में मनाया जाता है जब सत्तु यानि चने के आटे को खाते हैं। बैसाखी के दिन ही सूर्य मेष राशि में संक्रमण करता है इसलिए इसे मेष संक्रांति भी कहते हैं।

बैसाखी का इतिहास

बैसाखी का पर्व वैसे तो फसलों की कटाई का पर्व है किन्तु इसी दिन सिखों के दसवें गुरु गुर गोबिंद सिंह जी ने सिखों के लिए खालसा पंथ की स्थापना की थी। कहा जाता है कि 1669 में बासाखी के दिन, उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की और सिख धर्म के पहले नौ गुरुओं को प्रोत्साहन दिया। क्योंकि इसी समय औरगंजेब का अत्याचार बहुत बढ़ रहा था जिसे रोकने के लिए और शांति का संचार करने के लिए गुरु गोबिंद सिंह ने अपने शिष्यों को बुलाया और कहा कि मेरे लिए अपना सिर कौन दे सकता है। उनके ऐसा कहने पर पांच अलग-अलग जाति से उनके शिष्य आगे आए। गोबिंद सिंह एक-एक कर के आगे आए शिष्यों को अपने साथ अंदर ले गए और बाहर खून की धारा बहने लगी। लोगों को लगा कि गुरुजी ने शिष्य का सर कलम कर दिया है। किन्तु पांचों शिष्यों को अंदर ले जाने के बाद वो जिंदा उनको लेकर बाहर आए और बताया कि वो अपने शिष्यों की परीक्षा ले रहे थे। उन्होंने शिष्यों की जगह जानवरों की बली दी है। इसलिए अपने शिष्यों को परीक्षा में उतीर्ण पाकर उन्होंने उन्हें अमृतपान कराया और खालसा पंथ की स्थापना की साथ ही उनके नाम के साथ सिख को जोड़ा जो अपने बाल बढ़ाएगें और सवांरने के लिए कंघी पास रखेंगे साथ ही आत्मरक्षा के लिए उन्हें कृपाण दिया। इनका उद्देशय था जरुरतमंदों की मदद करना और अत्याचार को समाप्त करना। तभी से सिखों की पवित्र पुस्तक, ग्रंथ साहिब को जुलूस में शामिल किया जाता है जिसका नेतृत्व पंज प्यार (पांच वरिष्ठ सिख) करते हैं जो उन पांच शिष्यों का प्रतीक हैं। इस दिन भारत की सभी पवित्र नदियों से जल इकट्ठा किया जाता है और फिर उसे स्वर्ण मंदिर के सरोवर में डाल दिया जाता है।

कैसे मनाते हैं बैसाखी उत्सव

बैसाखी के त्योहार के दिन लोगों में अलग ही उत्साह और उमंग होती है। नई उर्जा के साथ वो इस दिन की शुरुआत करते हैं। भक्त सुबह-सुबह आसपास की पवित्र नदियों में डुबकी लगाकर स्नान करते हैं। इस दिन है सूर्य राशि चक्र के पहले राशि मेष में प्रवेश करता है। यह नए साल का प्रतीक है। इस दिन पंजाब का परंपरागत नृत्य भांगड़ा और गिद्दा किया जाता है। क्योंकि यह फसल काटने और उसके पकने का उत्सव बै इशलिए शाम को आग के आसपास इकट्ठे होकर लोग नई फसल की खुशियाँ मनाते हैं। पूरे देश में श्रद्धालु गुरुद्वारों में अरदास के लिए इकट्ठे होते हैं। सुबह 4 बजे गुरु ग्रंथ साहिब को समारोहपूर्वक कक्ष से बाहर लाया जाता है। दूध और जल से प्रतीकात्मक स्नान करवाने के बाद गुरु ग्रंथ साहिब को तख्त पर बैठाया जाता है। इसके बाद पंच प्यारे 'पंचबानी' गाते हैं। दिन में अरदास के बाद गुरु को कड़ा प्रसाद का भोग लगाया जाता है। प्रसाद लेने के बाद सब लोग लंगर' में शामिल होते हैं। दिनभर गुरु गोविंदसिंह और पंच प्यारों के सम्मान में शबद् और कीर्तन गाए जाते हैं। खेतों में लहलहती फसों को देख पंजाबी लोक नृत्य किया जाता है। पुरुष एवं महिलाएं पंजाबी पारंपरिक वस्त्र पहन कर लोक नृत्य भांगड़ा और गिद्धा करते हैं। लोक गीत गाकर पूरा समा गूंजयमान हो जाता है। सिखों के द्वारा इस दिन पवित्र किताब , 'ग्रंथ साहिब', 'पंज प्यारस' जो गुरुद्वारों में कीर्तन और 'ग्रंथ साहिब' का भी आयोजन करते है, जो मूल नेताओं का प्रतीक हैं। उनके द्वारा और उनके नेतृत्व में एक जुलूस निकला जाता है लोग अपने घर को साफ करते है और फूल, रंगोली और रोशनी के साथ को सजाते है। इस त्योहार के दिन पर मेले का भी आयोजित किया जाता है और लोंगो के द्वारा भांगड़ा नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है। इस दिन पर हर कोई नए पोशाक पहनते हैं। मेले में खरीदारी और खाने के कई स्टालों लगे होते है ढोल की तान पर हर समूहों के द्वारा लोक नृत्य का प्रदर्शन भी किया जाता है। इस त्योहार के दिन लोग खीर, मक्की दी रोटी सरसों का साग , गजक तिल भी बनाते है। इस दिन भगवान का शुक्रिया अदा कर पूरा परिवार और रिश्तेदार इत्यादि एक साथ भोजन ग्रहण करते हैं। और भगवान से प्रार्थना करते हैं कि इन लहलहती फसलों की तरह ही उनके जीवन में उत्साह और उमंग बना रहें।

बैसाखी उत्सव
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