भारत के गुजरात राज्य के जूनागढ़ जिले स्थित पहाड़ियाँ गिरनार नाम से जानी जाती हैं। यह अहमदाबाद से 327 किलोमीटर की दूरी पर जूनागढ़ के 10 मील पूर्व भवनाथ में स्थित हैं। यह एक पवित्र स्थान है जो हिंदुओं और जैन धर्मावलम्बियों दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ है। इसी पर्वत के नीचे भावनाथ मंदिर में हर साल लगने वाला मेला ही भावनाथ मेला कहा जाता है| हरे-भरे गिर वन के बीच पर्वत-श्रृंखला धार्मिक गतिविधि के केंद्र के रूप में कार्य करती है। यह मेला हर साल हिन्दू पंचांग के माघ महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को शुरू होता है तथा महाशिवरात्रि को अपने चरम पर पहुंच कर समाप्त होता है| इसमें देश भर से, विशेष रूप से गुजरात तथा सीमावर्ती राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र, के हजारों श्रद्धालु भाग लेते हैं| गुजरात जिसे सौराष्ट्र भी कहते है में स्थित जूनागढ़ एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। गिरनार पहाड़ियों के निचले हिस्से में स्थित जूनागढ़ में कई प्राचीन मंदिर, महलों के अवशेष आदि मौजूद हैं। यहां पूर्व-हड़प्पा काल के स्थलों की खुदाई भी हुई है।

कहा जाता है कि जूनागढ़ का निर्माण नौवीं शताब्दी में हुआ था। नवाबी ठाठ-बाट, प्राचीन किलों, महलों और अन्य ऐतिहासिक जगहों के कारण यह जगह हमेशा से ही पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती रही है।

जूनागढ़ का इतिहास

जूनागढ़ में पूर्व हड़प्पा संस्कृति के भी निशान मिलते हैं जिनसे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि इसका निर्माण नौवीं शताब्दी में हुआ होगा। सम्राट अशोक और चंद्रगुप्त मौर्य के शासन काल के कई शिलालेख आज भी यहां देखने को मिलते हैं।

1730 में जूनागढ़ को स्वतंत्र रियासत घोषित करने का श्रेय मोहम्मद शेर खान बाबी को जाता है। आजादी के बाद जूनागढ़ को लेकर भारत और पाकिस्तान में काफी तनाव हुआ। जूनागढ़ के तत्कालीन नवाब मुहम्मद महबत खान तृतीय जूनागढ़ का पाकिस्तान में विलय चाहते थे लेकिन सरदार वल्लभभाई पटेल ने उन्हें ऐसा करने से रोक लिया। भारतीय सेना के हस्तक्षेप के बाद 25 फरवरी 1948 को जूनागढ़ रियासत का भारत में विलय हो गया।

भावनाथ मेले का महत्व

महाशिवरात्रि की चंद्रविहिन रात्रि (अमावस्या की रात) को, जब ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव ने प्रलय से जुड़ा तांडव नृत्य किया था, उक्त मेले में एक विशेष महापूजा का आयोजन होता है| आधी रात को शुरू होने वाली इस महापूजा से पूर्व नागा साधुओं की टोली सजी धजी हाथियों पर सवार होकर शंख बजाते हुए वहां पहुंचते हैं| माना जाता है कि नौ नाथों और 84 सिद्धों की भूमि गिरनार में इनके साथ ही भगवान शिव शिवरात्रि पर स्वयं विराजमान होते हैं| मेले में कई तरह के पारंपरिक गीत और नृत्य भी देखने को मिलते हैं| इस मेले में आने से पहले कई श्रद्धालु गिरनार पर्वत की परिक्रमा भी करते हैं|

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार जब भगवान शिव और माता पार्वती गिरनार पर्वत के ऊपर से आकाशमार्ग से गुजर रहे थे तभी उनका दिव्य वस्त्र नीचे मृगी कुंड में गिर गया| आज तक इस जगह पर नागा साधु महाशिवरात्रि के मौके पर निकलने वाली उनकी शोभायात्रा से पहले इसमें स्नान करते हैं|

जूनागढ़ कैसे पहुंचें ?

हवाई मार्ग - जूनागढ़ से सबसे नजदीकी हवाई अड्डा पोरबंदर और राजकोट हवाई अड्डा है।

रेल मार्ग - पोरबंदर, अहमदाबाद और अन्य कई शहरों से जूनागढ़ रेलवे स्टेशन तक पहुंचा जा सकता है।
 
सड़क मार्ग - जूनागढ़ गुजरात के राजकोट, पोरबंदर, अहमदाबाद आदि सभी बड़े शहरों से जुड़ा हुआ है।

जूनागढ़ का सबसे बड़ा त्यौहार भावनाथ मेला है। भावनाथ महादेव मंदिर में महाशिवरात्रि के दौरान मनाया जाने वाला यह पर्व पांच दिनों तक चलता है। जूनागढ़ घूमने के लिए सबसे उपयुक्त समय अक्टूबर से लेकर मार्च तक का माना जाता है। इस दौरान यहां का मौसम बेहद शांत और ठंडा रहता है।

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