चैत्र का महीना देवी पूजन के लिए सबसे पवित्र महीना माना जाता है। हिन्दू मान्यतानुसार देवी के 108 रुप होते हैं। यह 108 रुप देवी पार्वती के आग में जलने के पश्चात उनके अंगों के जितने टुकड़े हुए वो सभी देवी का स्वरुप बन गए। इन्हीं देवियों में प्रमुख देवी है मां दुर्गा। जिनके नौ रुप काफी ज्यादा पूजनीय माने जाते है। चैत्र नवरात्रि देवी के इन्हीं नौं रुपों की पूजा के स्वरुप मनाई जाती है। देवी भागवत पुराण के अनुसार पूरे वर्ष में चार नवरात्र होते हैं। दो गुप्त नवरात्र माघ और आषाढ़, तीसरे शारदीय और चौथे चैत्र नवरात्र होते हैं। अमूमन लोग गुप्त नवरात्र के बारे में कम ही जानते हैं। साल में दो बार होने वाले शारदीय और चैत्र नवरात्र के बारे में ज्यादातर लोगों की जानकारी होती है। देवी दुर्गा के नौ स्वरुप भक्तों को कृत-कृत कर देते हैं। माता घर-घर में विराजमान होती है। चैत्र और आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक पड़ने वाले नवरात्र काफी लोकप्रिय हैं। बसंत ऋतु में होने के कारण चैत्र नवरात्र को वासंती नवरात्र तो शरद ऋतु में आने वाले आश्विन मास के नवरात्र को शारदीय नवरात्र भी कहा जाता है। चैत्र नवरात्र से हिंदू नववर्ष भी शुरू होता है इसलिए इनका धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से विशेष महत्व है। चैत्र नवरात्र को बंसत ऋतु का आगमन भी माना जाता हा चैत्र नवरात्र की नवमी को ही भगवान राम ने जन्म लिया था जिसे राम नवमी कहते हैं। इसलिए चैत्र नवरात्रों का महत्व और ज्यादा बढ़ जाता है। इस बार चैत्र नवरात्रि 6 अप्रैल शनिवार से शुरु होकर 14 अप्रैल रविवार तक मनाई जाएगी।

चैत्र नवरात्रि

कैसे करते हैं नवरात्र की पूजा

नवरात्रि को नौ दिनों नौ देवियों की पूजा की जाती है। प्रत्येक देवी का अलग-अलग महत्व होता है। देवी की पूजा से पहले नवरात्र के प्रथम दिन स्नान आदि क्रियाओं से निवृत होकर घर की साफ-सफाई की जाती है। देवी का आसन साफ-सुथरी जगह में लगाया जाता है। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार किसी भी पूजा से पहले गणेशजी की आराधना करते हैं। जिसके बाद चौकी लगाकर उस पर लाल कपड़ा बिछाया जाता है। जिसके बाद सर्वप्रथम कलश स्थापनी की जाती है। कलश को भगवान विष्णु का रुप माना गया है। इसलिए लोग देवी की पूजा से पहले कलश का पूजन करते हैं। पूजा स्थान पर कलश की स्थापना करने से पहले उस जगह को गंगा जल से शुद्ध किया जाता है और फिर पूजा में सभी देवी -देवताओं को आमंत्रित किया जाता है। कलश को पांच तरह के पत्तों से सजाया जाता है अगर पांच तरह के पत्ते ना हों को आम के पत्तों का भी उतना ही महत्व माना जाता है। जिसके बाद कलश में हल्दी की गांठ, सुपारी, पान, अक्षत, दूर्वा, आदि रखी जाती है। कलश को स्थापित करने के लिए उसके नीचे बालू या मिट्टी की वेदी बनाई जाती है और उसमें जौ बोये जाते हैं। जौ बोने की विधि धन-धान्य देने वाली देवी अन्नपूर्णा को खुश करने के लिए की जाती है। माँ दुर्गा की फोटो या मूर्ति को पूजा स्थल के बीचों-बीच स्थापित करते है और माँ का श्रृंगार रोली ,चावल, सिंदूर, माला, फूल, चुनरी, साड़ी, आभूषण और सुहाग से करते हैं। पूजा स्थल में एक अखंड दीप जलाया जाता है जिसे व्रत के आखिरी दिन तक जलाया जाना चाहिए। कलश स्थापना करने के बाद, दुर्गा चालीसा का पाठ करते हैं मां को प्रसाद को भोग लगाते हैं। जिसके बाद गणेश जी और मां दुर्गा की आरती करते है जिसके बाद नौ दिनों का व्रत शुरू हो जाता है। माता में श्रद्धा और मनवांछित फल की प्राप्ति के लिए बहुत-से लोग पूरे नौ दिन तक उपवास भी रखते हैं। इस बीच कई लोग मांस-मच्छी के साथ-साथ लहसून-प्याज का भी खाने में प्रयोग नहीं करते। शुद्ध रुप से देवी की अपासना करते हैं। जिसके बाद अष्टमी या नवमी के दिन नौ कन्याओं को जिन्हें माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों के समान माना जाता है, श्रद्धा से भोजन कराई जाती है और दक्षिणा आदि दी जाती है। जिसे कन्या जमाना भी कहा जाता है। चैत्र नवरात्रि में लोग लगातार नौ दिनों तक देवी की पूजा और उपवास करते हैं और दसवें दिन कन्या पूजन करने के पश्चात् उपवास खोलते हैं। साथ ही मां से आशीर्वाद मांगते हैं कि वो ऐसे ही उनके घर फिर पधारें और सभी की रक्षा कर सुख-शाति, समृद्धि दें।

नौं देवियों के रुप और उनका महत्व

शैलपुत्री - इसका अर्थ- पहाड़ों की पुत्री होता है। नवरात्रि के प्रथम दिन मां शैलपुत्री की पूजा होती है। क्योंकि माँ दुर्गा पर्वतों के राजा, हिमालय के यहाँ पैदा हुई थीं, इसी वजह से उन्हे पर्वत की पुत्री यानि “शैलपुत्री” कहा जाता है।

ब्रह्मचारिणी- इसका अर्थ- ब्रह्मचारीणी। नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा होता है। इसका तात्पर्य है कि तप का पालन करने वाली या फिर तप का आचरण करने वाली। ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यंत भव्य है। इसके बाएं हाथ में कमण्डल और दाएं हाथ में जप की माला रहती है। मां दुर्गा का यह स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनंत फल प्रदान करने वाला है। इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है।

चंद्रघंटा - इसका अर्थ- चाँद की तरह चमकने वाली। नवरात्रि के तीसरे दिन इनकी पूजा कू जाती हा। माता के इस रूप में उनके मस्तक पर घण्टे के आकार का अर्धचन्द्र अंकित है। इसी वजह से माँ दुर्गा का नाम चंद्रघण्टा भी है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। इनका वाहन सिंह है।

कूष्माण्डा - इसका अर्थ- पूरा जगत उनके पैर में है। कुष्मांडा की पूजा नवरात्रि के चौथे दिन की जाती है। कुष्मांठा से तात्पर्य है ‘कू’ का अर्थ होता है- छोटा। ‘इश’ का अर्थ- ऊर्जा एवं ‘अंडा’ का अर्थ- गोलाकार। इन्हें अगर मिलाया जाए तो इनका यही अर्थ है, कि संसार की छोटी से छोटी चीज़ में विशाल रूप लेने की क्षमता होती है। मां की उपासना मनुष्य को स्वाभाविक रूप से भवसागर से पार उतारने के लिए सुगम और श्रेयस्कर मार्ग है। माता कूष्माण्डा की उपासना मनुष्य को आधिव्याधियों से विमुक्त करके उसे सुख, समृद्धि और उन्नति की ओर ले जाती है।

स्कंदमाता - इसका अर्थ- कार्तिक स्वामी की माता। स्कंदमाता की पूजा नवरात्रि के पांचवे दिन की जाती है। भगवान शिव और पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का एक अन्य नाम स्कन्द भी है। अतः भगवान स्कन्द अर्थात कार्तिकेय की माता होने के कारण मां दुर्गा के इस रूप को स्कन्दमाता के नाम से भी लोग जानते हैं। इनका वर्ण शुभ्र है। ये कमल के आसन पर विराजमान हैं। इसलिए इन्हें पद्मासन देवी भी कहा जाता है। इनका वाहन भी सिंह है।

कात्यायनी - इसका अर्थ- कात्यायन आश्रम में जन्मि। कात्यायनी माता की पूजा नवरात्रि के छठे दिन की जाती है। एक कथा के अनुसार महर्षि कात्यायन की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर उनके वरदान स्वरूप माँ दुर्गा उनके यहाँ पुत्री के रूप में पैदा हुई थीं। चूंकि महर्षि कात्यायन ने ही सबसे पहले माँ दुर्गा के इस रूप की पूजा की थी, अतः महर्षि कात्यायन की पुत्री होने के कारण माँ दुर्गा कात्यायनी के नाम से भी जानी जाती हैं। इस दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित रहता है। योग साधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत ही महत्वपूर्ण स्थान है। इस चक्र में स्थित मन वाला साधक मां कात्यायनी के चरणों में अपना सब कुछ न्यौछावर कर देता है।

कालरात्रि - इसका अर्थ- काल का नाश करने वली। मां कालरात्रि की पूजा नवरात्रि के सांतवे दिन की जाती है। मां दुर्गा के इस रूप को अत्यंत भयानक माना जाता है, यह सर्वदा शुभ फल ही देता है, जिस वजह से इन्हें शुभकारी भी कहते हैं। माँ का यह रूप प्रकृति के प्रकोप के कारण ही उपजा है। इस दिन साधक का मन सहस्त्रार चक्र में स्थित रहता है। उसके लिए ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों के द्वार खुलने लगते हैं। इस चक्र में स्थित साधक का मन पूर्णतः मां कालरात्रि के स्वरूप में अवस्थित रहता है। मां कालरात्रि दुष्टों का विनाश और ग्रह बाधाओं को दूर करने वाली हैं। जिससे साधक भयमुक्त हो जाता है।

महागौरी - इसका अर्थ- सफेद रंग वाली मां। मां महागौरी की पूजा नवरात्रि के आठवें दिन होती है। माँ दुर्गा का यह आठवां रूप उनके सभी नौ रूपों में सबसे सुंदर है। इनका यह रूप बहुत ही कोमल, करुणा से परिपूर्ण और आशीर्वाद देता हुआ रूप है, जो हर एक इच्छा पूरी करता है। इनकी शक्ति अमोघ और फलदायिनी है। इनकी उपासना से भक्तों के सभी कलुष धुल जाते हैं।

सिद्धिदात्री - इसका अर्थ- सर्व सिद्धि देने वाली। मां सिद्धिदात्री की पूजा नवरात्र के अंतिम दिन यानि नवमी को की जाती है। माँ दुर्गा का यह नौंवा और आखिरी रूप मनुष्य को समस्त सिद्धियों से परिपूर्ण करता है। इनकी उपासना करने से उनके भक्तों की कोई भी इच्छा पूर्ण हो सकती है। माँ का यह रूप आपके जीवन में कोई भी विचार आने से पूर्व ही आपके सारे काम को पूरा कर सकता है।

चैत्र नवरात्रि का महत्व

चैत्र नवरात्रि का बड़ा महत्व होता है। वैसे तो देवी पूजन से सब मनोकामनाएं पूर्ण हो जीत है किन्तु ज्योतितष की दृष्टि से चैत्र नवरात्र महत्वपूर्म है क्योंकि इस नवरात्र के दौरान सूर्य का राशि परिवर्तन होता है। सूर्य 12 राशिियों में भ्रमण पूरा करते हैं और फिूर से अगला चक्र पूरा करने के लिरए पहली राशि मेष में प्रवेश करते हैं। सूर्य और मंगल की राशिू मेष दोनों ही अग्निे तत्व वाले हैं इसलिाए इनके संयोग से गर्मी की शुरुआत होती है। चैत्र नवरात्र से नववर्ष के पंचांग की गणना शुरू होती है। इसी दिंन से वर्ष के राजा, मंत्री, सेनापतिक, वर्षा, कृषिइ के स्वामी ग्रह का निार्धारण होता है और वर्ष में अन्न, धन, व्यापार और सुख शांति का आंकलन कि या जाता है। नवरात्र में देवी और नवग्रहों की पूजा का कारण यह भी है किर ग्रहों की स्थिुतिर पूरे वर्ष अनुकूल रहे और जीवन में खुशहाली बनी रहे। चैत्र नवरात्र की तो धार्मि्क दृष्टिक से इसका खास महत्व है क्योंकिु चैत्र नवरात्र के पहले दि न आदितशक्ति प्रकट हुई थी और देवी के कहने पर ब्रह्मा जी को सृष्टिा निहर्माण का काम शुरु किवया था।चैत्र शुक्ल प्रति पदा से हिेन्दू नववर्ष शुरु होता है। वैज्ञानि‌क दृष्टि से भी नवरात्र का अपना महत्व है। नवरात्र के दौरान व्रत और हवन पूजन स्वास्थ्य के लि्ए बहुत ही बढ़िहया है। इसका कारण यह है किस चारों नवरात्र ऋतुओं के संधिनकाल में होते हैं यानी इस समय मौसम में बदलाव होता है जिकससे शारीरिक और मानसिऋक बल की कमी आती है। शरीर और मन को पुष्ट और स्वस्थ बनाकर नए मौसम के लि ए तैयार करने के लिीए व्रत किनया जाता है।

कन्या पूजन विधि

नवरात्रि कन्या पूजन के बिना अधूरी मानी जाती है। यदि नवरात्रि का पूजन किया है, अपवास किया है और कन्या पूजन नहीं किया तो सब व्यर्थ होता है। कन्या को नवरात्रि में मां का स्वरुप माना जाता है। मान्यता है कि माता स्वंय कन्या का रुप धारण कर के भक्तों के घर जाती है और उन्हें आशीर्वाद प्रदान करती है। इस दृष्टि से कन्या पूजन अत्यंत लाभकारी होता है। कन्या पूजन ज्यादातर अष्टमी और नवमी को किया जाता है। कन्या पूजन के लिए सर्वप्रथम कन्याओं का चरण (पैर) थाली में जल में डालकर उसको धोएं। मान्य ता है कि ऐसा करने से पापों का शमन होता है। फिर उनको तिलक लगाकर पंक्तिबद्ध बैठाएं। हाथ में मोली बांधें और उनके चरणों में पुष्प अर्पित करें। इसके पश्चात नई थाली में कन्याएओं को पूड़ी, हलवा, चना इत्यादि भोजन श्रद्धा पूर्वक परोसें। फिर मिष्ठान, केला और प्रसाद देकर कुछ पैसे और वस्त्र का दान करें। जब कन्याफएं भोजन कर लें तो उन्हेंा शक्तिस्वरूपा देवी मानकर पुनः उनकी आरती करें और उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें। ऐसा करने से नवरात्रि के व्रत का लाभदायिक फल प्राप्त होता है।
चैत्र नवरात्रि कन्या पूजन
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