छठ पूजा हमें बताती है कि आज भी हम अपनी पुरानी संस्कृति को संजोकर रख सकते हैं। महाभारत काल से लेकर अब तक छठ पूजा करने वालों की संख्या बढ़ी ही है, वो घटी नहीं है। बिहार में तो शायद ही ऐसा कोई घर होगा जिसमें की छठ पूजा नहीं की जाती है। जिनके घरों में किसी कारण वश छठ पूजा नहीं हो पाती वो अपने आस पास के लोगों के अनुष्ठानों में मदद करते हैं। माना जाता है कि किसी छठ पूजा करने वाले के यहां मदद करने से भी छठ पूजा जैसा ही फल मिलता है। हम कई बार दखते हैं कि छठ पूजा के लिये फलों की टोकरी कोई और उठा कर चला होता है या घाट पर कोई और आपकी मदद करता है।

छठ पूजा नियम

-प्रसाद बनाने के लिये जो बर्तन उपयोग होंगे वो पूरी तरह से साफ होने चाहिए
-व्रत रखने वाले को सिर्फ ज़मीन पर ही सोना होता है।
-मिट्टी के चुल्हे पर सूखी लकड़ी की आग जलाकर ही प्रसाद तैयार किया जाए।

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-प्याज और लहसुन से परहेज रहे
-शुद्ध घी का ही प्रयोग करें
-चढ़ते सूरज को अर्घ्य देते वक्त घुटनों से या कमर से उपर पानी हो।
-व्रत रखने वाले को हमेशा नए ही कपड़े पहनने हैं।
-कपड़ों में कोई सिलाई ना हो। महिलाएं साड़ी और पुरुष धोती पहनें।

छठ पूजा महत्व

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इस व्रत को कोई महिला तब तक करती है जब तक कि उसके घर में अगली पीढ़ी कि कोई विवाहिता इसे रखना शुरू ना कर दे। जो महिलाएं ये व्रत रखती हैं उन्हें  "परवैतिन" कहा जाता है। माना जाता है कि  "परवैतिन" एक संस्कृत शब्द से बना है जिसका मतलब होता है पर्व। हालांकि ये त्योहार मुख्यत: महिलाओं के लिये है, लेकिन कई पुरुष भी ये व्रत रखते हैं।
पांरपरिक लोक गीत और भजन गाए जाते हैं। घर पर भी भजन और घाट पर भी भजन गाए जाते हैं। सूर्य भगवान और छठी मइया का ध्यान किया जाता है। घाटों को पूरी तरह सजाया जाता है। हर जगह रोशनी और फूल होते हैं।

छठ पर्व की मान्यता

ये पर्व आस्था का एक जीता जागता उदाहरण है। सूर्य भगवान जो कि हमें रोज साक्षात दर्शन देते हैं उन्हें साक्षी मानकर पूजा अर्चना की जाती है। ये इतना कठित व्रत है, लेकिन व्रत रखने वाले में इतनी ऊर्जा आ जाती है कि उन्हें इसके बारे में पता भी नहीं चलता। माना जाता है कि सच्ची निष्ठा और साफ दिल के साथ व्रत रखा जाए तो जो कुछ भी मुराद मन में हो वो पूरी होती ही है।

छठ पूजा के नियम वीडियो में समझें



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