वैदिक और पौराणिक व्यख्यानों के अनुसार भगवान सूर्य समस्त जीव-जगत के आत्मस्वरूप हैं। सूर्य देव हिंदू धर्म में पूजे जाने वाले सबसे प्राचिन देवताओं में से एक हैं। कहा जाता है कि धरती के निर्माण से भी पहले से सूर्य मौजूद हैं। माना जाता है कि भगवान सूर्य सबसे शक्तिशाली और सब पर नियंत्रण रखने वाले देवता हैं। सूर्य देव को क्रमशः शैव औऱ वैष्णव अनुयायियों द्वारा शिव और विष्णु का रुप माना जाता है। सूर्य देव हिन्दू धर्म के देवता हैं। सूर्य देव का वर्णन वेदों और पुराणों में भी किया गया है। सूर्य देव का वर्णन एक प्रत्यक्ष देव के रूप में कई जगह किया गया है। संसार में ऐसा कोई भी देव या भगवान नहीं है जिन्हें मनुष्य ने प्रत्यक्ष रुप से देखा हो किन्तु भगवान सूर्य ही एक ऐसे भगवान है जिन्हें मनुष्य रोज देख सकता है। भगवान सूर्यदेव को ही जगत की उत्पत्ति तथा अंत का कारण का कारण माना जाता है। अखिल सृष्टि के आदि कारण हैं। इन्हीं से सब की उत्पत्ति हुई है। शनि देव सूर्य देवता के पुत्र है। भगवान सूर्य को समर्पित कई व्रत व त्योहार भारत में मनाए जाते हैं। रविवार का दिन विशेष रुप से सूर्य देव को समर्पित है। रविवार के दिन सूर्य देव की पूजा करने से चारों फलों की प्राप्ति होती है। सूर्य देव को रवि भी कहा जाता है। भगवान सूर्य को समर्पित छठ और मकर संक्रांति का त्योहार पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। सूर्य को प्रत्येक राशि का स्वामी माना जाता है। उनके एक राशि से दूसरे राशि में आगमन की यात्रा को संक्रांति कहते हैं। वहीं छठ पूजा में विशेष रुप से सूर्य की अराधना की जाती ,है उन्हें अर्ध्य देकर मनवांछित फल प्राप्त किया जाता है।
सूर्य देव

सूर्य की उत्पति की कथा

पौराणिक सन्दर्भ में सूर्यदेव की उत्पत्ति के अनेक प्रसंग प्राप्त होते हैं। भगवान सूर्य की दो पत्नियां है। संज्ञा और छाया। संज्ञा से सूर्य देव की तीन संताने हुईं यमलोक के राजा यम, धरती के पहले मनुष्य मनु और यमुना, कहा जाता है कि सज्ञां ज्यादा दिन तक सूर्य का ताप नहीं सहन कर सकी थी। इसलिए वो अपनी परछाई छाया को उनके पास छोड़कर ध्यान करने चली गई थी। तब छांया से सूर्य देव के पुत्र के रुप में न्याय के देवता शनिदेव ने जन्म लिया था किन्तु सूर्य देव की कभी भी शनि के साथ बनी नहीं। सर्वाधिक प्रचलित मान्यता के अनुसार भगवान सूर्य महर्षि कश्यप के पुत्र हैं। वे महर्षि कश्यप की पत्नी अदिति के गर्भ से उत्पन्न हुए। अदिति के पुत्र होने के कारण ही उनका एक नाम आदित्य हुआ। पैतृक नाम के आधार पर वे कश्यप प्रसिद्ध हुए। एक बार दैत्य-दानवों ने मिलकर देवताओं को पराजित कर दिया। देवता घोर संकट में पड़कर इधर-उधर भटकने लगे। देव-माता अदिति इस हार से दु:खी होकर भगवान सूर्य की उपासना करने लगीं। भगवान सूर्य प्रसन्न होकर अदिति के समक्ष प्रकट हुए। उन्होंने अदिति से कहा- देवि! तुम चिन्ता का त्याग कर दो। मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करुंगा। कुछ समय के उपरान्त देवी अदिति गर्भवती हुईं। समय आने पर अदिति के गर्भ से भगवान सूर्य का प्राकट्य हुआ और बाद में वे देवताओं के नायक बने। उन्होंने देवशत्रु असुरों का संहार किया। भगवान सूर्य के परिवार की विस्तृत कथा भविष्य पुराण, मत्स्य पुराण, पद्म पुराण, ब्रह्म पुराण, मार्कण्डेय पुराण तथा साम्बपुराण में वर्णित है। मार्कंडेय पुराण के अनुसार पहले यह सम्पूर्ण जगत प्रकाश रहित था। उस समय कमलयोनि ब्रह्मा जी प्रकट हुए। उनके मुख से प्रथम शब्द ॐ निकला जो सूर्य का तेज रुपी सूक्ष्म रूप था। तत्पश्चात ब्रह्मा जी के चार मुखों से चार वेद प्रकट हुए जो ॐ के तेज में एकाकार हो गए। यह वैदिक तेज ही आदित्य है जो विश्व का अविनाशी कारण है। ये वेद स्वरूप सूर्य ही सृष्टि की उत्पत्ति,पालन व संहार के कारण हैं। ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर सूर्य ने अपने महातेज को समेट कर स्वल्प तेज को ही धारण किया। वैदिक और पौराणिक आख्यानों के अनुसार भगवान श्री सूर्य समस्त जीव-जगत के आत्मस्वरूप हैं। ये ही अखिल सृष्टि के आदि कारण हैं। इन्हीं से सब की उत्पत्ति हुई है। वैदिक सूक्तों, पुराणों तथा आगमादि ग्रन्थों में भगवान सूर्य की नित्य आराधना का निर्देश है। मन्त्र महोदधि तथा विद्यार्णव में भगवान सूर्य के दो प्रकार के मन्त्र मिलते हैं। प्रथम मन्त्र- ॐ घृणि सूर्य आदित्य ॐ तथा द्वितीय मन्त्र- ॐ ह्रीं घृणि सूर्य आदित्य: श्रीं ह्रीं मह्यं लक्ष्मीं प्रयच्छ है

सूर्य देव का स्वरुप

हिंदू शास्त्रों के मुताबिक, चक्र, शक्ति, पाश, अंकुश सूर्य देवता के प्रधान आयुध हैं। सूर्य के अधिदेवता शिव हैं और प्रत्यधि देवता अग्नि हैं। सूर्य देव की दो भुजाएं हैं, वे कमल के आसन पर विराजमान रहते हैं। सूर्य की तीन आंखे हैं। उनके दोनों हाथों में कमल सुशोभित रहते हैं। उनकी कान्ति कमल के भीतरी भाग की सी है और वे सात घोड़ों पर सात रस्सियों से जुड़े रथ पर आरुढ़ रहते हैं। यह सात घोड़े सात रंगो और सात दिनों का प्रतिक हैं। सूर्य देवता का एक नाम सविता भी है। सूर्य सिंह राशि के स्वामी हैं। इनकी महादशा 6वर्ष की होती है। रत्न माणिक्य है। सूर्य की प्रिय वस्तुएं सवत्सा गाय, गुड़, तांबा, सोना एवं लाल वस्त्र आदि हैं। सूर्य की धातु सोना व तांबा है। सूर्य की जप संख्या 7000 है।

सूर्य देव की पूजा और महत्व

सूर्य देव की पूजा करना बहुत आसान है। वह एक साधारण नमस्कार से भी वो प्रसन्न हो जाते हैं। कई लोग उन्हें जल अर्पित करते हैं। सूर्य देव को जल चढ़ाना शुभ माना जाता है। वैज्ञानिक रुप से भी सूर्य से हमे विटामिन डी का प्राप्ति होती है जो स्वास्थ्य के लिए बहुत आवश्यक हैं। रविवार के दिन सूर्य भगवान की पूजा का दिन माना जाता है। मान्यता है कि रविवार के दिन नियमित रूप से सूर्यदेव के नाम का उपवास कर उनकी आराधना की जाए उपासक की सारी द्ररिद्रता दूर हो जाती है। हिन्दू धर्म में पौराणिक कथाओं में सूर्य को ब्रह्मांड का केंद्र माना गया है। आदि काल से सूर्य की पूजा उपासना का प्रचलन है इसलिए सूर्य को आदिदेव के नाम से भी जाना जाता है। रोज सुबह स्नान करने के बाद भगवान सूर्य को जल अर्पित करने को बहुत ही पावन कार्य बताया गया है। कथाओं में कहा गया है कि सूर्य उपासना से इंसान बलिष्ठ होता है और उसमें सूर्य जैसा ही तेज आता है। खासकर रविवार के दिन व्रत रखना और नियम पूर्वक सूर्य की पूजा करना अध्यात्मिक जीवन के लिए बहुत ही लाभकारी बताया गया है। सूर्य की उपासना रविवार को सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त करने की मान्यता है। रविवार या अन्य दिन भी सुबह स्नान करने के बाद एक तांबे के पात्र में जल लेकर उसमें लाल फूल, अक्षत, चंदन इत्यादि डालकर पवित्रता के साथ सूर्य को अर्घ्य प्रदान करना चाहिए। साथ ही अर्ध्य देते समय ॐ ऐही सूर्यदेव सहस्त्रांशो तेजो राशि जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहणार्ध्य दिवाकर:।। ॐ सूर्याय नम:, ॐ आदित्याय नम:, ॐ नमो भास्कराय नम:। अर्घ्य समर्पयामि।। का जाप करना चाहिए। नियमित सूर्य पूजा करने से मनुष्य निडर और बलशाली बनता है। सूर्य पूजा से मनुष्य के बुरे विचारों जैसे- अहंकार, क्रोध, लोभ और कपट का नाश होता है भगवान सूर्य की उपासना करने से कठिन से कठिन कार्य में सफलता प्राप्त होती है औरआत्मबल में भी वृद्धि होती है। भगवान सूर्य सभी इच्छाएं पूर्ण करते हैं।

सूर्य देव का मूल मंत्र - ऊं सूर्यायः नमः
सूर्य नाम मंत्र – ऊँ घृणि सूर्याय नम:
सूर्य गायत्री मंत्र – ऊँ आदित्याय विदमहे दिवाकराय धीमहि तन्न: सूर्य: प्रचोदयात

श्री सूर्य अष्टकम

आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मभास्कर,
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोस्तुते ।।(1)
सप्ताश्व रध मारूढं प्रचण्डं कश्यपात्मजं,
श्वेत पद्मधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहं ।।(2)
लोहितं रधमारूढं सर्व लोक पितामहं,
महापाप हरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहं ।।(3)
त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्म विष्णु महेश्वरं,
महा पाप हरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहं ।।(4)
बृंहितं तेजसां पुञ्जं वायु माकाश मेवच,
प्रभुञ्च सर्व लोकानां तं सूर्यं प्रणमाम्यहं ।।(5)
बन्धूक पुष्प सङ्काशं हार कुण्डल भूषितं,
एक चक्रधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहं ।।(6)
विश्वेशं विश्व कर्तारं महा तेजः प्रदीपनं,
महा पाप हरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहं ।।(7)
तं सूर्यं जगतां नाधं ज्नान विज्नान मोक्षदं,
महा पाप हरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहं ।।(8)
सूर्याष्टकं पठेन्नित्यं ग्रहपीडा प्रणाशनं,
अपुत्रो लभते पुत्रं दरिद्रो धनवान् भवेत् ।।(9)
आमिषं मधुपानं च यः करोति रवेर्धिने,
सप्त जन्म भवेद्रोगी जन्म कर्म दरिद्रता ।।(10)
स्त्री तैल मधु मांसानि हस्त्यजेत्तु रवेर्धिने,
न व्याधि शोक दारिद्र्यं सूर्य लोकं स गच्छति ।।(11)
इति श्री शिवप्रोक्तं श्री सूर्याष्टकं सम्पूर्णं ....
सूर्य देवता
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