सभी देवताओं में वायु देव का विशेष स्थान है। वायु देव का हवा का देवता कहा जाता है। संसार में यदि मनुष्य जीवित है, सांस ले रहा है तो वो केवल वायु देव की वजह से है। हवा के कारण ही मनुष्य का जीवन संभव है। इसलिए वायु देव की महत्वता और बढ़ जाती है। वायु देव को विनाश का देवता भी माना जाता है यदि वायु देव चाहें तो एक पल में सृष्टि का विनाश कर सकते हैं। हवा बंद कर देने से मनुष्य, जीव-जंतु, पशु-पक्षी कोई भी सांस नहीं ले पाएगा। वायु देव को वैदिक युग से हिंदू धर्म में त्रिभुज देवताओं में से एक के रूप में सम्मानित किया जाता है। वायु देव का वेदो में कई बार वर्णन आता है। इन्हें भीम का पिता और हनुमान का आध्यात्मिक पिता माना जाता है। इन्हें वात देव अथवा पवन देव के नाम से भी जाना जाता है। कभी-कभी इन्हें प्राण देव भी कहा जाता है। वेदों में वायु को अंतरिक्ष का देवता माना गया है। वायु का मतलब हवा, पवन होता है। हालांकि वायु को किसी ने देखा नहीं, लेकिन एहसास तो सभी को होता है। जब हवा चलती है उसे सभी महसूस कर सकते हैं कि कोई हमारे चारों और है। इसलिए ही तो यदि वायु है तो जीवन है, जीवन है तो हम हैं। इन्द्र एवं वायु का सम्बन्ध बहुत ही समीपी है और इस प्रकार इन्द्र तथा वायु युगल देव का रूप धारण करते हैं । विद्युत एवं वायु वर्षाकालीन गर्जन एवं तूफ़ान में एक साथ होते हैं, इसलिए इन्द्र तथा वायु एक ही रथ में बैठते हैं। दोनों संयुक्त रुप से कार्य करते हैं।
वायु देवता

वायु देव का महत्व

वायु देव का जीवन में अत्याधिक महत्व है इनके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अगर वायु न हो तो धरती पर विनाश का तांडव मच जाएगा। सारी चीजें इधर से उधर हो जाएगीं। वायु देव को भगवान हनुमान का पिता भी माना जाता है क्योंकि जब बाल्यावस्था में हनुमान जी ने सूर्य को फल समझ कर खाने की चेष्टा की थी तो इन्द्र देव ने उन पर वज्र से प्रहार कर दिया था जिससे वो मुर्छित होकर धरती पर आ गिरे थे। इस बात से वायुदेव क्रोधित हो उठे थे। वो हनुमान जी को अपने पुत्र के समान समझते थे। इसलिए क्रोध में आकर उन्होंने धरती से सारी हवा ही समेट ली थी जिससे धरती पर हाहाकार मच गया था। सब कुछ समाप्त होने लगा था तब जाकर सभी देवताओं ने वायु देव से हाथ जोड़ प्रार्थना की और हनुमान को ठीक किया था इंद्र ने हनुमान को प्रसन्न होकर वरदान दिया तब कहीं जाकर उनका क्रोध दूर हुआ। ऋग्वेद में इंद्र के साथ ही वायु का उल्लेख एक देवता के रूप में है। वायुदेवता का जन्म विश्वपुरुष से हुआ था। ऋग्वेद में कहा गया है कि विश्वपुरुष की श्वास से वायुदेव उत्पन्न हुए।

वायु देव से जुड़ी कथा

वायु देव को गंधर्व का राजा भी कहा जाता है। वायु देव पर्वतों के राजा है। वह गति के देवता है। इस बात का उल्लेख हिंदू धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। एक पौराणिक कथा के रूप में, एक बार वायु ऋषि नारद ने उग्र मेरू, पवित्र पर्वत के शीर्ष को तोड़ने के लिए वायु देव को काफी उत्साहित किया। वायु देव ने बहुत कड़ी मेहनत की ताकि सुमेरु पर्वत को तोड़ सकें लेकिन वो जितना भी प्रयास करते गरुड़ देव अपने पंख फैलाकर पर्वत की रक्षा कर लेते थे। ऐसा करते-करते साल भर बित गया। आखिर कार लंबे संघर्ष के बाद गरुढ़ पर्वत की रक्षा करते-करते थक गए और नारद जी के उकसाने के स्वरुप वायु देव ने सुमेरु पर्वत के शिखर को तोड़कर समुद्र में फेंका डाला। सुमेरु पर्वत ने अपना पवित्र और पौराणिक शिखर खो दिया। यही सुमेरु शिखर का पर्वत बाद में श्रीलंका बना। ऋग्वेद में वायु देव के लिए स्तुति है कि ‘नमस्ते वायो, त्वमेव प्रत्यक्ष ब्रहमासि, त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि तन्मामवतु।

वायु देव का स्वरूप

वेदों के अनुसार वायु देव का स्वरूप रूप सुंदर और मनोहारी है। वायु देवता की खूबी यह है कि इनके सहस्त्र यानि हजार नेत्र हैं। वह एक अद्भुत प्रकाशमान रथ पर विराजमान होते हैं। इस रथ को हजार अश्वों का एक दल खींचता है। वायु देवता के अंश से उत्पन्न अनेक संतानों का वर्णन ग्रंथों में मिलता है। इनमें हनुमान, भीमसेन (पांच पांडवों में से एक), इला इन्हीं की संतान मानी गई हैं। वायु देवता की उपासना का बड़ा महत्व है। इनकी उपासना करने से संतान की प्राप्ति तो होती ही है। साथ ही उपासक को जीवन में यश भी प्राप्त होता है। ऋग्वेद में ऐसा भी कहा गया है कि ये शत्रुओं को भगाते हैं और निर्बलों की रक्षा करते हैं। मत्स्यपुराण में कृष्ण मृग पर सवार प्रतिमा पूजन का उल्लेख भी है।

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