हिन्दू मान्यतानुसार मनुष्यों जनों एवं देवी देवताओं में ज्ञान का प्रसार करने का श्रेय मां सरस्वती को जाता है। माता सरस्वती संगीत और ज्ञान की देवी है। सरस्वती को विद्या की देवी के रुप में पूजा जाता है। हिन्दू-देवियों में माता सरस्वती का विशेष स्थान है। मां सरस्वती मूर्ख को भी ज्ञानवान बना देती है। अंधों को भी ज्ञान की ज्योति से दर्शन करा देती हैं। बुद्धि के बल पर मनुष्यों को आगे बढाती है। यदि मां सरस्वती ना हों तो कोई भी व्यक्ति कभी सफल नहीं हो सकता। माता सरस्वती मनुष्य जनों में ज्ञान और बुद्धि का प्रकाश फैलाती है। माता सरस्वती को चारों वेदो की जननी भी कहा जाता है। संसार में संगीत का प्रसार करने का श्रेय भी माता सरस्वती को जाता है। सरस्वती कला की भी देवी है। माता सरस्वती को ही सारी कलाएं समर्पित होती हैं। देवी सरस्वती भगवान ब्रह्मा की पत्नी हैं। वह शुद्ध और उत्कृष्टता के सभी चीजों का प्रतीक है और इनके चार हाथ हैं जो मानव व्यक्तित्व के चार पहलुओं का प्रतिनिधित्व करते हैं जैसे कि मन, बुद्धि, अहंकार और सतर्कता। सरस्वती हिन्दू धर्म की प्रमुख देवियों में से एक हैं। सरस्वती का जन्म ब्रह्मा के मुँह से हुआ था प्रत्येक वर्ष माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी यानी बसंत पंचमी के दिन वाणी और विद्या की देवी सरस्वती की पूजा होती है। क्योंकि वेद और पुराणों में बताया गया है कि ज्ञान और वाणी की देवी मां सरस्वती इसी दिन प्रकट हुई थी। इसलिए इस तिथि को सरस्वती जन्मोत्सव भी कहा जाता है। वह वाणी की अधिष्ठात्री देवी है। इनका नामांतर 'शतरूपा' भी है। इसके इनकी उपासना करने से मूर्ख भी विद्वान् बन सकता है। माघ शुक्ल पंचमी को जिसे बसंत पंचमी भी कहा जाता है उस दिन माता सरस्वती की पूजा भव्यता के साथ पूरे भारत में की जाती है। खासकर बंगाल और बिहार में सरस्वती पूजा की खासी धूम रहती है। माता सरस्वती को वाणी, वाग्देवी, भारती, शारदा, वागेश्वरी शुक्लवर्ण, श्वेत वस्त्रधारिणी, वीणावादनतत्परा तथा श्वेतपद्मासना के नाम से भी जाना जाता है। माता सरस्वती की पूजा विशेषकर विद्यार्थी वर्ग करते है। सभी शिक्षक संस्थाओं, विद्यालयों में माता सरस्वती की प्रतिमा रखी जाती है उन्हें अराध्य मानकर शिक्षा ग्रहण की जाती है। संगीत आदि की कक्षाओं में भी माता सरस्वती का आशीर्वाद अवश्य लिया जाता है। सरस्वती माता को सत्य की देवी भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि सरस्वती माता का अनुसरण करने वाला व्यक्ति कभी झूठ नहीं बोलता।

देवी सरस्वती

सरस्वती का स्वरुप

देवी सरस्वती त्रिदेवियों का प्रतिक हैं। यह देवी लक्ष्मी और देवी पार्वती के साथ त्रिशक्ति को दर्शाती हैं। जिस तरह त्रिदेव ब्रह्मा विष्णु और महेश सृष्टि का संचालन करते हैं वैसे ही मां सरस्वती अन्य दो देवियों के साथ मिलकर स्त्री शक्ति का नेतृत्व करती हैं। देवी सरस्वती को शुद्ध सफेद कपड़े पहने एक खूबसूरत महिला के रूप में दर्शाया गया है , चित्रों में अक्सर बैठा या एक विशाल सफेद कमल पर खड़े दर्शाया गया जाता है। सफेद रंग, सच्चे ज्ञान की पवित्रता का प्रतीक है। हालांकि, वह पीले रंग से भी जुड़ी हुई है इसलिए सरसों के पौधे उन्हें समर्पित किये जाते है। मां सरस्वती के एक मुख, चार हाथ हैं। मुस्कान से उल्लास, दो हाथों में वीणा-भाव संचार एवं कलात्मकता की प्रतीक है। पुस्तक से ज्ञान और माला से ईशनिष्ठा-सात्त्विकता का बोध होता है। यह हाथ मानव व्यक्तित्व के चार पहलुओं का भी प्रतीक है मन, बुद्धि , सतर्कता, और अहंकार। दूसरी और यह चार हाथ 4 वेद, गद्य के लिए यजुर वेद , समां वेद के लिए संगीत , और दर्शन के लिए अथर्ववेद का प्रतिनिधित्व करते है। वाहन मयूर-सौन्दर्य एवं मधुर स्वर का प्रतीक है। इनका वाहन हंस माना जाता है और इनके हाथों में वीणा, वेद और माला होती है। भारत में कोई भी शैक्षणिक कार्य के पहले इनकी पूजा की जाती हैं। इन्हें जलदेवी के रूप में महत्ता देते हैं, एक नदी का नाम भी सरस्वती है। सरस्वती का पौराणिक इतिहास इन्हें उन धार्मिक कृत्यों से जोड़ता है, जो इन्हीं के नाम वाग्देवी के रूप में की जाती है तथा इनका संबंध बोलने व लिखने, शब्द की उत्पत्ति, दिव्यश्लोक विन्यास तथा संगीत से भी है।

सरस्वती की उत्पति

पुराणों में देवी सरस्वती के प्रकट होने की जो कथा है उसके अनुसार सृष्टि का निर्माण कार्य पूरा करने के बाद ब्रह्मा जी ने जब अपनी बनायी सृष्टि को देखा तो उन्हें लगा कि उनकी सृष्टि मृत शरीर की भांति शांत है इसमें न तो कोई स्वर है और न वाणी इसलिए उन्होनें अपने मुख से सरस्वती को अवतरित किया। किन्तु मां सरस्वती की भव्यता व सुंदरता को देखकर वो मोहित हो गए और उनसे विवाह करने का विचार करने लगे। ब्रह्मा सरस्वती की उत्पति के लिए जिम्मेदार थे, इसलिए देवी सरस्वती से शादी करने का उनका निर्णय शिव और विष्णु द्वारा स्वीकार नहीं किया गया। दोनों ने ब्रह्मा को अभिशाप देते हुए कहा कि अब से कोई भी भक्त भगवान के रूप में ब्रह्मा की पूजा नहीं करेगा। तब से ब्रह्म देव की पूजा नहीं की जाती है हालांकि ज्ञान की देवी के रूप में देवी सरस्वती की पूजा की जाती है।
वहीं अन्य कथा है कि सरस्वती पुराण के अनुसार सृष्टि की रचना करते समय ब्रह्मा ने सीधे अपने वीर्य से सरस्वती को जन्म दिया था। इसलिए ऐसा कहा जाता है कि सरस्वती की कोई मां नहीं केवल पिता, ब्रह्मा थे। सरस्वती को विद्या की देवी कहा जाता है, लेकिन विद्या की यह देवी बेहद खूबसूरत और आकर्षक थीं कि स्वयं ब्रह्मा भी सरस्वती के आकर्षण से खुद को बचाकर नहीं रख पाए और उन्हें अपनी अर्धांगिनी बनाने पर विचार करने लगे। सरस्वती ने अपने पिता की इस मनोभावना को भांपकर उनसे बचने के लिए चारो दिशाओं में छिपने का प्रयत्न किया लेकिन उनका हर प्रयत्न बेकार साबित हुआ। इसलिए विवश होकर उन्हें अपने पिता के साथ विवाह करना पड़ा। ब्रह्मा और सरस्वती करीब 100 वर्षों तक एक जंगल में पति-पत्नी की तरह रहे। इन दोनों का एक पुत्र भी हुआ जिसका नाम स्वयंभु मनु रखा गया था

मां सरस्वती की पूजा

माता सरस्वती की पूजा भारतीय उपमहाद्वीप, कई दक्षिण और पूर्वी एशियाई देशों में मध्ययुगीन काल से होती आ रही है। थाईलैंड, कंबोडिया, श्रीलंका और इंडोनेशिया जैसे देशों के स्थानीय साहित्य में भी देवी सरस्वती का संदर्भ है। देवी सरस्वती की पूजा करते समय सबसे पहले सरस्वती माता की प्रतिमा अथवा तस्वीर को सामने रखना चाहिए। इसके बाद कलश स्थापित करके गणेश जी तथा नवग्रह की विधिवत् पूजा करनी चाहिए। इसके बाद माता सरस्वती की पूजा करें। सरस्वती माता की पूजा करते समय उन्हें सबसे पहले आचमन और स्नान कराएं। इसके बाद माता को फूल, माला चढ़ाएं। सरस्वती माता को सिन्दूर, अन्य श्रृंगार की वस्तुएं भी अर्पित करनी चाहिए। वसंत पंचमी के दिन सरस्वती माता के चरणों पर गुलाल भी अर्पित किया जाता है। देवी सरस्वती श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, इसलिए उन्हें श्वेत वस्त्र पहनाएं। सरस्वती पूजन के अवसर पर माता सरस्वती को पीले रंग का फल चढ़ाएं। प्रसाद के रूप में मौसमी फलों के अलावा बूंदियां अर्पित करनी चाहिए। सरस्वती माता को मालपुए और खीर का भी भोग लगाया जाता है।

सरस्वती वंदना

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता,
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता,
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥१॥
शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं,
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌।
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌,
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥२॥

अर्थातः जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चन्द्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की हैं और जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर शङ्कर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही सम्पूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली माँ सरस्वती हमारी रक्षा करें। शुक्लवर्ण वाली, सम्पूर्ण चराचर जगत्‌ में व्याप्त, आदिशक्ति, परब्रह्म के विषय में किए गए विचार एवं चिन्तन के सार रूप परम उत्कर्ष को धारण करने वाली, सभी भयों से भयदान देने वाली, अज्ञान के अँधेरे को मिटाने वाली, हाथों में वीणा, पुस्तक और स्फटिक की माला धारण करने वाली और पद्मासन पर विराजमान्‌ बुद्धि प्रदान करने वाली, सर्वोच्च ऐश्वर्य से अलङ्कृत, भगवती शारदा की मैं वंदना करता/करती हूँ।

श्री सरस्वती चालीसा

॥दोहा॥
जनक जननि पद्मरज, निज मस्तक पर धरि।
बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि॥
पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमित अनंतु।
दुष्जनों के पाप को, मातु तु ही अब हन्तु॥

॥चालीसा॥
जय श्री सकल बुद्धि बलरासी।जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी॥
जय जय जय वीणाकर धारी।करती सदा सुहंस सवारी॥1
रूप चतुर्भुज धारी माता।सकल विश्व अन्दर विख्याता॥
जग में पाप बुद्धि जब होती।तब ही धर्म की फीकी ज्योति॥2
तब ही मातु का निज अवतारी।पाप हीन करती महतारी॥
वाल्मीकिजी थे हत्यारा।तव प्रसाद जानै संसारा॥3
रामचरित जो रचे बनाई।आदि कवि की पदवी पाई॥
कालिदास जो भये विख्याता।तेरी कृपा दृष्टि से माता॥4
तुलसी सूर आदि विद्वाना।भये और जो ज्ञानी नाना॥
तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा।केव कृपा आपकी अम्बा॥5
करहु कृपा सोइ मातु भवानी।दुखित दीन निज दासहि जानी॥
पुत्र करहिं अपराध बहूता।तेहि न धरई चित माता॥6
राखु लाज जननि अब मेरी।विनय करउं भांति बहु तेरी॥
मैं अनाथ तेरी अवलंबा।कृपा करउ जय जय जगदंबा॥7
मधुकैटभ जो अति बलवाना।बाहुयुद्ध विष्णु से ठाना॥
समर हजार पाँच में घोरा।फिर भी मुख उनसे नहीं मोरा॥8
मातु सहाय कीन्ह तेहि काला।बुद्धि विपरीत भई खलहाला॥
तेहि ते मृत्यु भई खल केरी।पुरवहु मातु मनोरथ मेरी॥9
चंड मुण्ड जो थे विख्याता।क्षण महु संहारे उन माता॥
रक्त बीज से समरथ पापी।सुरमुनि हदय धरा सब काँपी॥10
काटेउ सिर जिमि कदली खम्बा।बारबार बिन वउं जगदंबा॥
जगप्रसिद्ध जो शुंभनिशुंभा।क्षण में बाँधे ताहि तू अम्बा॥11
भरतमातु बुद्धि फेरेऊ जाई।रामचन्द्र बनवास कराई॥
एहिविधि रावण वध तू कीन्हा।सुर नरमुनि सबको सुख दीन्हा॥12
को समरथ तव यश गुन गाना।निगम अनादि अनंत बखाना॥
विष्णु रुद्र जस कहिन मारी।जिनकी हो तुम रक्षाकारी॥13
रक्त दन्तिका और शताक्षी।नाम अपार है दानव भक्षी॥
दुर्गम काज धरा पर कीन्हा।दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा॥14
दुर्ग आदि हरनी तू माता।कृपा करहु जब जब सुखदाता॥
नृप कोपित को मारन चाहे।कानन में घेरे मृग नाहे॥15
सागर मध्य पोत के भंजे।अति तूफान नहिं कोऊ संगे॥
भूत प्रेत बाधा या दुःख में।हो दरिद्र अथवा संकट में॥16
नाम जपे मंगल सब होई।संशय इसमें करई न कोई॥
पुत्रहीन जो आतुर भाई।सबै छांड़ि पूजें एहि भाई॥17
करै पाठ नित यह चालीसा।होय पुत्र सुन्दर गुण ईशा॥
धूपादिक नैवेद्य चढ़ावै।संकट रहित अवश्य हो जावै॥18
भक्ति मातु की करैं हमेशा। निकट न आवै ताहि कलेशा॥
बंदी पाठ करें सत बारा। बंदी पाश दूर हो सारा॥19
रामसागर बाँधि हेतु भवानी।कीजै कृपा दास निज जानी।20

॥दोहा॥
मातु सूर्य कान्ति तव, अन्धकार मम रूप।
डूबन से रक्षा करहु परूँ न मैं भव कूप॥
बलबुद्धि विद्या देहु मोहि, सुनहु सरस्वती मातु।
राम सागर अधम को आश्रय तू ही देदातु॥

सरस्वती मंत्र

देवी सरस्वती का मूल मंत्र निम्न है: ॐ ऐं सरस्वत्यै ऐं नमः।
संपूर्ण सरस्वती मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महासरस्वती देव्यै नमः।

देवी सरस्वती के 108 नाम

1 सरस्वती 21 महाभागा 41 वाग्देवी 61 सुभद्रा 81 मुण्डकायप्रहरणा 101 नीलभुजा
2 महाभद्रा 22 महोत्साहा 42 वसुधा 62 सुरपूजिता 82 धूम्रलोचनमर्दना 102 चतुर्वर्गफलप्रदा
3 महामाया 23 दिव्याङ्गा 43 तीव्रा 63 सुवासिनी 83 सर्वदेवस्तुता 103 चतुरानन साम्राज्या
4 वरप्रदा 24 सुरवन्दिता 44 महाभद्रा 64 सुनासा 84 सौम्या 104 रक्तमध्या
5 श्रीप्रदा 25 महाकाली 45 महाबला 65 विनिद्रा 85 सुरासुर नमस्कृता 105 निरञ्जना
6 पद्मनिलया 26 महापाशा 46 भोगदा 66 पद्मलोचना 86 कालरात्री 106 हंसासना
7 पद्माक्षी 27 महाकारा 47 भारती 67 विद्यारूपा 87 कलाधारा 107 नीलजङ्घा
8 पद्मवक्त्रगा 28 महाङ्कुशा 48 भामा 68 विशालाक्षी 88 रूपसौभाग्यदायिनी 108 ब्रह्मविष्णुशिवात्मिका
9 शिवानुजा 29 सीता 49 गोविन्दा 69 ब्रह्मजाया 89 वाग्देवी  
10 पुस्तकधृत 30 विमला 50 गोमती 70 महाफला 90 वरारोहा  
11 ज्ञानमुद्रा 31 विश्वा 51 शिवा 71 त्रयीमूर्ती 91 वाराही  
12 रमा 32 विद्युन्माला 52 जटिला 72 त्रिकालज्ञा 92 वारिजासना  
13 परा 33 वैष्णवी 53 विन्ध्यवासा 73 त्रिगुणा 93 चित्राम्बरा  
14 कामरूपा 34 चन्द्रिका 54 विन्ध्याचलविराजिता 74 शास्त्ररूपिणी 94 चित्रगन्धा  
15 महाविद्या 35 चन्द्रवदना 55 चण्डिका 75 शुम्भासुरप्रमथिनी 95 चित्रमाल्यविभूषिता  
16 महापातक नाशिनी 36 चन्द्रलेखाविभूषिता 56 वैष्णवी 76 शुभदा 96 कान्ता  
17 महाश्रया 37 सावित्री 57 ब्राह्मी 77 सर्वात्मिका 97 कामप्रदा  
18 मालिनी 38 सुरसा 58 ब्रह्मज्ञानैकसाधना 78 रक्तबीजनिहन्त्री 98 वन्द्या  
19 महाभोगा 39 देवी 59 सौदामिनी 79 चामुण्डा 99 विद्याधरसुपूजिता  
20 महाभुजा 40 दिव्यालङ्कारभूषिता 60 सुधामूर्ति 80 अम्बिका 100 श्वेतासना  


देवी सरस्वती
माता सरस्वती की आरती

जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता।
सदगुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥
जय सरस्वती माता॥
चन्द्रवदनि पद्मासिनि, द्युति मंगलकारी।
सोहे शुभ हंस सवारी, अतुल तेजधारी॥
जय सरस्वती माता॥
बाएं कर में वीणा, दाएं कर माला।
शीश मुकुट मणि सोहे, गल मोतियन माला॥
जय सरस्वती माता॥
देवी शरण जो आए, उनका उद्धार किया।
पैठी मंथरा दासी, रावण संहार किया॥
जय सरस्वती माता॥
विद्या ज्ञान प्रदायिनि, ज्ञान प्रकाश भरो।
मोह अज्ञान और तिमिर का, जग से नाश करो॥
जय सरस्वती माता॥
धूप दीप फल मेवा, माँ स्वीकार करो।
ज्ञानचक्षु दे माता, जग निस्तार करो॥
जय सरस्वती माता॥
माँ सरस्वती की आरती, जो कोई जन गावे।
हितकारी सुखकारी ज्ञान भक्ति पावे॥
जय सरस्वती माता॥
जय सरस्वती माता, जय जय सरस्वती माता।
सदगुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥
जय सरस्वती माता॥
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