देवी पार्वती हिंदू पौराणिक कथाओं में लोकप्रिय देवी है। देवी पार्वती शक्ति के नौ रुपों का प्रतिनिधित्व करती हैं। देवी पार्वती के रुप में ही मां दुर्गा और मां काली का जन्म हुआ है। देवी पार्वती को गौरी भी कहा जाता है क्योंकि वो श्वेत रंग की, शांत देवी हैं। देवी पार्वती भगवान शिव की अर्धांगनि अर्थात पत्नी है। देवी पार्वती के पुत्र कार्तिकेय एवं भगवान गणेश हैं। देवी पार्वती की पुत्री का नाम अशोक सुंदरी है। देवी पार्वती भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर विराजती हैं। देवी पार्वती को हिंदू धर्म में सबसे पूज्यनीय देवी माना जाता है। देवी पार्वती को सुहाग की देवी भी माना जाता है। कुंवांरी एवं सुहागिन स्त्रियां अपने पति की दीर्घ आयु एवं मनचाहा वर प्राप्ति के लिए मां पार्वती की अराधना करती हैं। मान्यता है कि देवी पार्वती एक पतिव्रता नारी है। उन्होने अपने हर जन्म में केवल भगवान शिव का ही अनुसरण किया है। पार्वती के रुप में कठिन तपस्या करने के बाद भगवान शिव ने उनसे विवाह किया था। देवी पार्वती को सुख-समृद्धि की देवी भी माना जाती है। देवी पार्वती कई रुपों में विद्धमान है। देवी पार्वती के नौ रुपों की पूजा नवरात्रि में की जाती है। देवी पार्वती से जुड़े कई त्योहार भारतवर्ष में मनाए जाते हैं। इनमें मुख्य रुप से शिवरात्रि जिसमें माता पार्वती और शिव का विवाह हुआ था। देवी पार्वती की पूजा सावन मास में भी की जाती है। उन्हें अराध्य मानकर स्त्रियां हरियाली तीज एवं हरितालिका व्रत करती हैं। मान्यता है कि मां पार्वती की व्रत करने से सुहाग अच्छा रहता है। देवी पार्वती के जैसा सुहाग पाने एवं शिव की तरह पति पाने की कामना में स्त्रियां देवी पार्वती को प्रसन्न करती हैं। देवी पार्वती ही आघ शक्ति हैं। वो ही काली, गौरी, दुर्गा एवं सती हैं। पार्वती जी हिन्दू धर्म की देवी हैं। इन्हें आदि शक्ति भी कहा जाता है। देवी पार्वती बहुत दयालु और करुणामयी मानी जाती हैं इनकी आराधना से सभी मनोरथ पूर्ण होते है। माता पार्वती की अराधना करने से मनुष्यगण को पारस्परिक ज्ञान और शक्ति मिलती है। हिंदू साहित्य में उन्हें महान हिमालय पर्वत की बेटी और देवी गंगा की दिव्य बहन के रूप में वर्णित किया गया है। राजस्थान राज्य में गंणगौर पूजा के नाम से एक विशेष त्यौहार मनाया जाता है जो देवी पार्वती को समर्पित है। इस त्योहार में महिलाएं पार्वती या गौरी की पूजा करती हैं और अपने सुखी विवाहित जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं जबकि अविवाहित लड़कियां भगवान शिव जैसे पतियों के लिए प्रार्थना करती हैं। प्रजनन, वैवाहिक सौहार्द, पति-पत्नी के प्रति समर्पण, तपस्या और शक्ति पार्वती द्वारा प्रतीक विभिन्न गुण हैं। ये गुण हिंदू परंपरा में अत्यधिक मूल्यवान हैं।
देवी पार्वती

देवी पार्वती का स्वरुप


देवी पार्वती को अम्बा, गौरी, ललिता, काली उमा, दुर्गा, अंबिका, हैमावती आदि जैसे विभिन्न नामों से संदर्भित किया जाता है। अम्बा और अंबिका उन्हें सभी की दिव्य मां मानते हैं, ललिता अपनी आकर्षक सुंदरता का प्रतिनिधित्व करती है जबकि दुर्गा (पहुंच से परे देवी) और काली (विनाश की देवी) को उनके सबसे भयंकर और शक्तिशाली रूप माना जाता है। पुराणों के अनुसार माता पार्वती का मुख बहुत उज्ज्वल और तेजोमय है। मां का वर्ण या रंग गौरा है, इस कारण कई जगह इन्हें गौरी मां के नाम से भी जाना जाता है। इनके आठ हाथ हैं जिनमें इन्होंने त्रिशूल, पास, अंकुशा, शंख, चक्र, तलवार, कमल को धारण किए हुए हैं। इनका वाहन वृषभ है। यह सफेद वस्त्र धारण करें रहती हैं। अपने ममतामयी स्वभाव के कारण पार्वती जी को मां अम्बे भी कहा जाता है। हिन्दू धर्मानुसार पार्वती जी भगवान गणेश और कार्तिकेय की माता हैं।

देवी पार्वती की जन्म कथा

पौराणिक मान्यताओं अनुसार देवी पार्वती भगवान शिव की पत्नी सती का पुनर्जन्म है। वह पहाड़ों के स्वामी राजा हिमावन के लिए पैदा हुई थी और इसलिए कभी-कभी गिरीजपुत्री (पहाड़ों के राजा की बेटी) के रूप में जाना जाता है। गंभीर तपस्या और परीक्षाओं के बाद देवी पार्वती को भगवान शिव के साथ उनकी पत्नी के रूप में दोबारा जोड़ा गया। कहा जाता है कि पूर्व जन्म में देवी पार्वती राजा दक्ष की पुत्री ‘सती’ थी उनकी माता का नाम था प्रसूति था। यह प्रसूति स्वायंभुव मनु की तीसरी पुत्री थी। एक दिन मां सती ने कैलाशवासी शिव के दर्शन किए और वह उनके प्रेम में पड़ गई। लेकिन सती ने प्रजापति दक्ष की इच्छा के विरुद्ध भगवान शिव से विवाह कर लिया। दक्ष इस विवाह से संतुष्ट नहीं थे, क्योंकि सती ने अपनी मर्जी से एक ऐसे व्यक्ति से विवाह किया था जिसकी वेशभूषा और शक्ल दक्ष को कतई पसंद नहीं थी और जो अनार्य था। एक बार राजा दक्ष ने एक विराट यज्ञ का आयोजन किया लेकिन उन्होंने अपने दामाद और पुत्री को यज्ञ में निमंत्रण नहीं भेजा। पता लगने पर सती पति शिव से हठ करके अपने मायके बिना बुलाए चली गई। लेकिन दक्ष ने पुत्री के आने पर उपेक्षा का भाव प्रकट किया। सती ने देखा कि सबी देवी देवता आए हुए हैं उनको निमंत्रित किया गया है किन्तु शिव को नहीं बुलाया गया। इससे क्रोधित होकर सती ने अपने पिता दक्ष से पूछा किन्तु शिव के विषय में सती के सामने ही अपमानजनक बातें राजा दक्ष कहने लगे। अपने पति के विषय में अपमानजनक बातें सुनना हृदय विदारक और घोर अपमानजनक था। सती यह सब वह बर्दाश्त नहीं कर पाई और इस अपमान की कुंठावश उन्होंने वहीं यज्ञ कुंड में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए। सती को दर्द इस बात का भी था कि वह अपने पति के मना करने के बावजूद इस यज्ञ में चली आई थी और अपने दस शक्तिशाली (दस महाविद्या) रूप बताकर-डराकर पति शिव को इस बात के लिए विवश कर दिया था कि उन्हें सती को वहां जाने की आज्ञा देना पड़ी। पति के प्रति खुद के द्वारा किए गया ऐसा व्यवहार और पिता द्वारा पति का किया गया अपमान सती बर्दाश्त नहीं कर पाई और यज्ञ कुंड में कूद गई। यह खबर सुनते ही शिव ने वीरभद्र को भेजा, जिसने दक्ष का सिर काट दिया। इसके बाद दुखी होकर सती के शरीर को अपने सिर पर धारण कर शिव ने तांडव नृत्य किया। पृथ्वी समेत तीनों लोकों को व्याकुल देख कर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र द्वारा सती के शरीर के टुकड़े करने शुरू कर दिए। इस तरह सती के शरीर का जो हिस्सा और धारण किए आभूषण जहां-जहां गिरे वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आ गए। देवी भागवत में 108 शक्तिपीठों का जिक्र है, तो देवी गीता में 72 शक्तिपीठों का जिक्र मिलता है। देवी पुराण में 51 शक्तिपीठों की चर्चा की गई है। वर्तमान में भी 51 शक्तिपीठ ही पाए जाते हैं, लेकिन कुछ शक्तिपीठों का पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका में होने के कारण उनका अस्तित्व खतरें में है। दक्ष के बाद सती ने हिमालय के राजा हिमवान और रानी मैनावती के यहां जन्म लिया। मैनावती और हिमवान को कोई कन्या नहीं थी तो उन्होंने आदिशक्ति की प्रार्थना की। आदिशक्ति माता सती ने उन्हें उनके यहां कन्या के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। दोनों ने उस कन्या का नाम रखा पार्वती। पार्वती अर्थात पर्वतों की रानी। इसी को गिरिजा, शैलपुत्री और पहाड़ों वाली रानी कहा जाता है। माना जाता है कि जब सती के आत्मदाह के उपरांत विश्व शक्तिहीन हो गया। उस भयावह स्थिति से त्रस्त महात्माओं ने आदिशक्तिदेवी की आराधना की। तारक नामक दैत्य सबको परास्त कर त्रैलोक्य पर एकाधिकार जमा चुका था। ब्रह्मा ने उसे शक्ति भी दी थी और यह भी कहा था कि शिव के औरस पुत्र के हाथों मारा जाएगा।
शिव को शक्तिहीन और पत्नीहीन देखकर तारक आदि दैत्य प्रसन्न थे। देवतागण देवी की शरण में गए। देवी ने हिमालय (हिमवान) की एकांत साधना से प्रसन्न होकर देवताओं से कहा- ‘हिमवान के घर में मेरी शक्ति गौरी के रूप में जन्म लेगी। शिव उससे विवाह करके पुत्र को जन्म देंगे, जो तारक वध करेगा।’
भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए उन्होंने देवर्षि के कहने मां पार्वती वन में तपस्या करने चली गईं। भगवान शंकर ने पार्वती के प्रेम की परीक्षा लेने के लिए सप्तऋषियों को पार्वती के पास भेजा। सप्तऋषियों ने पार्वती के पास जाकर उन्हें हर तरह से यह समझाने का प्रयास किया कि शिव औघड़, अमंगल वेषभूषाधारी और जटाधारी है। तुम तो महान राजा की पुत्री हो तुम्हारे लिए वह योग्य वर नहीं है। उनके साथ विवाह करके तुम्हें कभी सुख की प्राप्ति नहीं होगी। तुम उनका ध्यान छोड़ दो। अनेक यत्न करने के बाद भी पार्वती अपने विचारों में दृढ़ रही। उनकी दृढ़ता को देखकर सप्तऋषि अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने पार्वती को सफल मनोरथ होने का आशीर्वाद दिया और वे पुन: शिवजी के पास वापस आ गए। सप्तऋषियों से पार्वती के अपने प्रति दृढ़ प्रेम का वृत्तान्त सुनकर भगवान शिव अत्यन्त प्रसन्न हुए और समझ गए कि पार्वती को अभी में अपने सती रूप का स्मरण है। सप्तऋषियों ने शिवजी और पार्वती के विवाह का लग्न मुहूर्त आदि निश्चित कर दिया। पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रुप में स्वीकार कर लिया।

माता पार्वती की पूजा विधि

देवी पार्वती की पूजा के लिए तांबे का पात्र, तांबे का लोटा, जल का कलश, दूध, देव मूर्ति को अर्पित किए जाने वाले वस्त्र व आभूषण। चावल, अष्टगंध, दीपक, तेल, रुई, धूपबत्ती। चंदन, धतूरा, आक के फूल, बिल्वपत्र जनेऊ। प्रसाद के लिए फल, दूध, मिठाई, नारियल, पंचामृत, सूखे मेवे, शक्कर, पान, दक्षिणा इत्यादि एकत्र करें। फिर मनोकामना का संकल्प लेकर सर्वप्रथम गणेश पूजन करें। गणेश जी को स्नान कराएं। वस्त्र अर्पित करें। गंध, पुष्प, अक्षत से पूजन करें।
अब देव मूर्ति में शिव-पार्वती पूजन करें। शिव-पार्वती को स्नान कराएं। स्नान पहले जल से फिर पंचामृत से और वापिस जल से स्नान कराएं। शिव-पार्वती को वस्त्र अर्पित करें। वस्त्रों के बाद फूलों के आभूषण पहनाएं। अब पुष्पमाला पहनाएं। अब तिलक करें। ‘‘ऊँ साम्ब शिवाय नमः’’ कहते हुए भगवान शिव को अष्टगंध का तिलक लगाएं।‘‘ऊँ गौर्ये नमः’’ कहते हुए माता पार्वती को कुमकुम का तिलक लगाएं। अब धूप व दीप अर्पित करें। फूल अर्पित करें। श्रद्धानुसार घी या तेल का दीपक लगाएं। आरती करें। आरती के पश्चात् परिक्रमा करें। अब नेवैद्य अर्पित करें। भगवान शिव और पार्वती का बिल्व पत्र से पूजन करें। कनेर के पुष्प अर्पित करें। गौरी शंकर के पूजन के समय‘‘ऊँ उमामहेश्वराभ्यां नमः’’मंत्र का जप करते रहें।

माता पार्वती के मंत्र

‘ऊँ उमामहेश्वराभ्यां नमः’’
‘ऊँ गौरये नमः

पार्वती जी के अन्य नाम

उमा
गौरी
अम्बिका
भवानी
सती
शिवा
महेश्वरी
सत्या
आर्या
भवानी

पार्वती चालीसा

॥ दोहा ॥
जय गिरी तनये डग्यगे शम्भू प्रिये गुणखानी
गणपति जननी पार्वती अम्बे ! शक्ति ! भवामिनी

॥ चालीसा॥
ब्रह्मा भेद न तुम्हरे पावे , पांच बदन नित तुमको ध्यावे
शशतमुखकाही न सकतयाष तेरो , सहसबदन श्रम करात घनेरो ।।1।।
तेरो पार न पाबत माता, स्थित रक्षा ले हिट सजाता
आधार प्रबाल सद्रसिह अरुणारेय , अति कमनीय नयन कजरारे ।।2।।
ललित लालट विलेपित केशर कुमकुम अक्षतशोभामनोहर
कनक बसन कञ्चुकि सजाये, कटी मेखला दिव्या लहराए ।।3।।
कंठ मदार हार की शोभा , जाहि देखि सहजहि मन लोभ
बालार्जुन अनंत चाभी धारी , आभूषण की शोभा प्यारी ।।4।।
नाना रत्न जड़ित सिंहासन , टॉपर राजित हरी चारुराणां
इन्द्रादिक परिवार पूजित , जग मृग नाग यज्ञा राव कूजित ।।5।।
श्री पार्वती चालीसा गिरकल्सिा,निवासिनी जय जय ,
कोटिकप्रभा विकासिनी जय जय ।।6।।
त्रिभुवन सकल , कुटुंब तिहारी , अनु -अनु महमतुम्हारी उजियारी
कांत हलाहल को चबिचायी , नीलकंठ की पदवी पायी ।।7।।
देव मगनके हितुसकिन्हो , विश्लेआपु तिन्ही अमिडिन्हो
ताकि , तुम पत्नी छविधारिणी , दुरित विदारिणीमंगलकारिणी ।।8।।
देखि परम सौंदर्य तिहारो , त्रिभुवन चकित बनावन हारो
भय भीता सो माता गंगा , लज्जा मई है सलिल तरंगा ।।9।।
सौत सामान शम्भू पहायी , विष्णुपदाब्जाचोड़ी सो धैयी
टेहिकोलकमल बदनमुर्झायो , लखीसत्वाशिवशिष चड्यू ।।10।।
नित्यानंदकरीवरदायिनी , अभयभक्तकरणित अंपायिनी।
अखिलपाप त्र्यतपनिकन्दनी , माही श्वरी , हिमालयनन्दिनी।।11।।
काशी पूरी सदा मन भाई सिद्ध पीठ तेहि आपु बनायीं।
भगवती प्रतिदिन भिक्षा दातृ ,कृपा प्रमोद सनेह विधात्री ।।12।।
रिपुक्षय कारिणी जय जय अम्बे , वाचा सिद्ध करी अबलाम्बे
गौरी उमा शंकरी काली , अन्नपूर्णा जग प्रति पाली ।।13।।
सब जान , की ईश्वरी भगवती , पति प्राणा परमेश्वरी सटी
तुमने कठिन तपस्या किणी , नारद सो जब शिक्षा लीनी।।14।।
अन्ना न नीर न वायु अहारा , अस्थिमात्रतरण भयुतुमहरा
पत्र दास को खाद्या भाऊ , उमा नाम तब तुमने पायौ ।।15।।
तब्निलोकी ऋषि साथ लगे दिग्गवान डिगी न हारे।
तब तब जय , जय ,उच्चारेउ ,सप्तऋषि , निज गेषसिद्धारेउ ।।16।।
सुर विधि विष्णु पास तब आये , वार देने के वचन सुननए।
मांगे उबा, और, पति, तिनसो, चाहत्ताज्गा , त्रिभुवन, निधि, जिन्सों ।।17।।
एवमस्तु कही रे दोउ गए , सफाई मनोरथ तुमने लए
करी विवाह शिव सो हे भामा ,पुनः कहाई है बामा।।18।।
जो पढ़िए जान यह चालीसा , धन जनसुख दीहये तेहि ईसा।।19।।

।।दोहा।।
कूट चन्द्रिका सुभग शिर जयति सुच खानी
पार्वती निज भक्त हिट रहाउ सदा वरदानी।

माता पार्वती
माता पार्वती की आरती

जय पार्वती माता जय पार्वती माता
ब्रह्म सनातन देवी शुभ फल कदा दाता।
जय पार्वती माता जय पार्वती माता।
अरिकुल पद्मा विनासनी जय सेवक त्राता
जग जीवन जगदम्बा हरिहर गुण गाता।
जय पार्वती माता जय पार्वती माता।
सिंह को वाहन साजे कुंडल है साथा
देव वधु जहं गावत नृत्य कर ताथा।
जय पार्वती माता जय पार्वती माता।
सतयुग शील सुसुन्दर नाम सती कहलाता
हेमांचल घर जन्मी सखियन रंगराता।
जय पार्वती माता जय पार्वती माता।
शुम्भ निशुम्भ विदारे हेमांचल स्याता
सहस भुजा तनु धरिके चक्र लियो हाथा।
जय पार्वती माता जय पार्वती माता।
सृष्टि् रूप तुही जननी शिव संग रंगराता
नंदी भृंगी बीन लाही सारा मदमाता।
जय पार्वती माता जय पार्वती माता।
देवन अरज करत हम चित को लाता
गावत दे दे ताली मन में रंगराता।
जय पार्वती माता जय पार्वती माता।
श्री प्रताप आरती मैया की जो कोई गाता
सदा सुखी रहता सुख संपति पाता।
जय पार्वती माता मैया जय पार्वती माता।

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