हिन्दू मान्यताओं में धन और वैभव की देवी माता लक्ष्मी को माना गया है। आज संसार में हर चीज की पूर्ति के लिए धन आवश्यक है। धन के अभाव के कारण कोई भी कार्य संपूर्ण नहीं हो सकता। प्रत्येक व्यक्ति धन वान बनने के लिए कार्यरत है। संपूर्ण संसार धन के पीछे ही भाग रहा है। ऐसे में धन की महत्वता तो अपने आप ही बढ़ जाती है। धन की इसी महत्वता को स्वीकारते हुए भारतवर्ष में माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। उन्हें धन की देवी कहा जाता है। कहते हैं कि जिन पर माता लक्ष्मी की कृपा होती है वो व्यक्ति कभी निर्धन नहीं होता, उसे कभी किसी चीज की कमी नहीं होती। माता लक्ष्मी सृष्टि के संचालक भगवान विष्णु की पत्नी है। वो हर घड़ी, हर समय अपने पति के साथ रहती हैं। शास्त्रों के अनुसार देवी लक्ष्मी का जन्म शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। जो कार्तिक मास में आती है। कार्तिक मास को माता लक्ष्मी से ही जोड़ कर देखा जाता है क्योंकि इसी महीने में माता लक्ष्मी की दीवाली के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। माता लक्ष्मी धन, सौभाग्य एवं वैभव की देवी होने के नाते उन्हें वैभव लक्ष्मी भी कहा जाता है। माता की पूजा कार्तिक मास की अमावस्या को विशेष रुप से की जाती है इसे धन तेरस और दीवाली भी कहा जाता है। धन तेरस के दिन व्यापारी वर्ग विशेष रुप से माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करते हैं। लक्ष्मी" शब्द संस्कृत शब्द लक्ष्मी से लिया गया है। 'लक्ष्मी' शब्द दो शब्दों के मेल से बना है- एक 'लक्ष्य' तथा दूसरा 'मी' अर्थात लक्ष्य तक ले जाने वाली देवी लक्ष्मी। माता लक्ष्मी को श्रीदेवी, कमला, धन्या, हरिवल्लभी, विष्णुप्रिया, दीपा, दीप्ता, पद्मप्रिया, पद्मसुन्दरी, पद्मावती, पद्मनाभप्रिया, पद्मिनी, चन्द्र सहोदरी, पुष्टि, वसुंधरा आदि नामों से भी संबोधित किया जाता है। देवी लक्ष्मी जीवन में सभी सांसारिक और आध्यात्मिक सफलता का सुझाव देती है। देवी लक्ष्मी भौतिक, आध्यात्मिक धन, विलासिता, प्रजनन, भाग्य, शुद्धता, सौंदर्य, शक्ति, उदारता के साथ अपने भक्तों को शुभकामनाएं प्रदान करती है।
माता लक्ष्मी

देवी लक्ष्मी का स्वरुप

माता लक्ष्मी सौंदर्य की देवी भी कही जाती है। देवी लक्ष्मी को सुनहरी अस्तर के किनारों वाली लाल साड़ी पहनाकर खूबसूरत सुनहरी महिला के रूप में दर्शाया जाता है, जो बहुत सारे गहने पहनकर कमल पर बैठी या खड़ी रहती है। है। शुभ लाल रंग गतिविधि का प्रतीक है और सुनहरी कढ़ाई समृद्धि को दर्शाता है। लक्ष्मी के चार हाथों में से प्रत्येक हाथ मानव जीवन के चार सिरों, धर्म (धार्मिकता), काम (इच्छाओं), अर्थ (धन), और मोक्ष (मुक्ति) जन्म और मृत्यु के चक्र को दर्शाता है। चार हथियार चार दिशाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। जो देवता की सर्वव्यापीता और सर्वोच्चता का प्रतीक हैं। उल्टा हाथ भौतिक संसार में गतिविधियों का प्रतिनिधित्व करते हैं और पीछे के हाथ पवित्र गतिविधियों को इंगित करते हैं। पीछे के दोनों हाथों में कमल की कली सौंदर्य, शुद्धता, आध्यात्मिकता और प्रजनन क्षमता के लिए है। उनका आसन कमल दिव्य सत्य की एक सीट है, यह दर्शाता है कि कमल की तरह पानी में रहते हुए भी निर्लेप रहना चाहिए। कभी भी धन से भ्रमित नहीं होना चाहिए और बस इसका आनंद लेना चाहिए। उनके हाथों से सोने के सिक्कों का निरंतर प्रवाह, दिखाता है कि वह धन के साथ लोगों को आशीर्वाद देती है। देवी के बगल में खड़े दो हाथी नाम और प्रसिद्धि का प्रतीक हैं। कभी-कभी कई चित्र देवी के बगल में खड़े चार हाथियों और सोने के बर्तनों से पानी छिड़कते हैं। जो ज्ञान और शुद्धता है और पानी के छिड़काव का मतलब धर्म, ज्ञान और शुद्धता द्वारा शासित निरंतर आत्म-समर्थन के आधार पर आध्यात्मिक और भौतिक समृद्धि का लाभ है। उनका वहान उल्लू, ज्ञान का प्रतीक है।

"श्री '' का महत्व

हिन्दू पौराणिक कथाओं में लक्ष्मी को दिया गया एक और नाम "श्री" है। यह शब्द धन या वित्त से संबंधित है। हिंदुओं को जब भी कोई नया काम शुरू होता है तो वो श्री की अनुसरण करते हैं। विशेष रूप से व्यवसाय से संबंधित दस्तावेजों के शीर्ष पर 'श्री' लिखते हैं। यह सम्मान, कृपा, समृद्धि, बहुतायत, अधिकार और शुभकामना का भी प्रतीक है। यही कारण है कि भारतीय आमतौर पर भगवान, या किसी भी सम्मानित व्यक्ति को संबोधित करने से पहले "श्री" बोलते हैं।

दीपावली पर देवी लक्ष्मी

लोग मानते हैं कि लक्ष्मी केवल वहीं रहती है जहां पुण्य, सत्य और करुणा है। वह एक साफ-सुथरी जगह पर रहती है। हिंदू गण लक्ष्मी जी की औपचारिक रूप से पूजा करते हैं। दिवाली पर परिवार के अच्छे स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं। दिवाली के दिन कई लोग दरवाजा खोल कर सोते हैं ऐसी मान्यता है कि माता लक्ष्मी इस दिन घरों में आती हैं और धन का आशीर्वाद देती है। इसलिए घरों में दिवाली के दिन माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना की जाती है। कई दिन पहले से ही लोग माता की पूजा और घर की साफ-सफाई में लग जाते हैं ताकि माता उनके घर आकर उन्हें आशीर्वाद प्रदान करें।

माता लक्ष्मी की जन्म कथा

भगवान विष्णु की पत्नी और धन की देवी माता लक्ष्मी के जन्म को लेकर कई कथाएं विद्धमान हैं। एक कथा के अनुसार महर्षि भृगु की पत्नी ख्याति के गर्भ से एक त्रिलोक सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई थी। वह समस्त शुभ लक्षणों से सुशोभित थी। इसलिये उसका नाम लक्ष्मी रखा गया। धीरे-धीरे बड़ी होने पर लक्ष्मी ने भगवान नारायण के गुण-प्रभाव का वर्णन सुना। इससे उनका हृदय भगवान में अनुरक्त हो गया। वे भगवान नारायण को पतिरूप में प्राप्त करने के लिये समुद्र तट पर घोर तपस्या करने लगीं। उन्हें तपस्या करते-करते एक हज़ार वर्ष बीत गये। उनकी परीक्षा लेने के लिये देवराज इन्द्र भगवान विष्णु का रूप धारण करके लक्ष्मी देवी के पास आये और उनसे वर माँगने के लिये कहा- लक्ष्मी जी ने उनसे विश्वरूप का दर्शन कराने के लिये कहा। इन्द्र वहाँ से लज्जित होकर लौट गये। अन्त में भगवती लक्ष्मी को कृतार्थ करने के लिये स्वयं भगवान विष्णु पधारे। भगवान ने देवी से वर माँगने के लिये कहा। उनकी प्रार्थना पर भगवान ने उन्हें विश्वरूप का दर्शन कराया। तदनन्तर लक्ष्मी जी की इच्छानुसार भगवान विष्णु ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।
एक और अन्य कथा के अनुसार एक बार महर्षि दुर्वासा घूमते-घूमते एक मनोहर वन में गये। वहाँ एक विद्याधरी सुन्दरी ने उन्हें दिव्य पुष्पों की एक माला भेंट की। माला लेकर उन्मत्त वेशधारी मुनि ने उसे अपने मस्तक पर डाल लिया और पुन: पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे। इसी समय दुर्वासा जी को देवराज इन्द्र दिखायी दिये। वे ऐरावत पर चढ़कर आ रहे थे। उनके साथ अन्य देवता भी थे। महर्षि दुर्वासा ने वह माला इन्द्र को दे दी। देवराज इन्द्र ने उसे लेकर ऐरावत के मस्तक पर डाल दिया। ऐरावत ने माला को सूँड़ से उतार लिया और अपने पैरों तले रौंद डाला। माला की दुर्दशा देखकर महर्षि दुर्वासा क्रोध से जल उठे और उन्होंने इन्द्र को श्री भ्रष्ट होने का शाप दे दिया। उस शाप के प्रभाव से इन्द्र श्री भ्रष्ट हो गये और सम्पूर्ण देवलोक पर असुरों का शासन हो गया। समस्त देवता असुरों से संत्रस्त होकर इधर-उधर भटकने लगे। ब्रह्मा जी की सलाह से सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गये। भगवान विष्णु ने उन लोगों को असुरों के साथ मिलकर क्षीरसागर को मथने की सलाह दी। भगवान की आज्ञा पाकर देवगणों ने दैत्यों से सन्धि करके अमृत-प्राप्ति के लिये समुद्र मंथन का कार्य आरम्भ किया। मन्दराचल की मथानी और वासुकि नाग की रस्सी बनी। भगवान विष्णु स्वयं कच्छपरूप धारण करके मन्दराचल के आधार बने। सागर-मंथन से सर्वप्रथम हलाहल नामक विष निकला। उस विष के तेज से तीनों लोकों में हाहाकार मच गई जिस पर भगवान शंकर ने विष का पान कर उसे कंठ में रोक लिया, तभी से वे ‘नीलकंठ’ कहलाए। विष के बाद कामधेनु उत्पन्न हुई तत्पश्चात उच्चै:श्रवा अश्व, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, शंख, केतु, धनु, धन्वंतरि, शशि और कुल मिलाकर चौदह रत्न सागर के अंदर से निकले थे। तदनंतर दशों दिशाओं को अपनी कांति से दैदीप्यमान करने वाली ‘श्री लक्ष्मीजी’ उत्पन्न हुईं। जब भगवती लक्ष्मी देवी प्रकट हुईं, तब वे खिले हुए श्वेत कमल के आसन पर विराजमान थीं। उनके श्री अंगों से दिव्य कान्ति निकल रही थी। उनके हाथ में कमल था। लक्ष्मी जी का दर्शन करके देवता और महर्षि गण प्रसन्न हो गये। उन्होंने वैदिक श्रीसूक्त का पाठ करके लक्ष्मी देवी का स्तवन किया। उनको देखकर कुछ समय के लिए मंथन कार्य रुक गया क्योंकि महालक्ष्मी की अद्भुत छटा को देख कर देवता और असुर दोनों ही होश खो बैठे। सभी देवता और दैत्य उन पर मोहित होकर उनकी प्राप्ति की इच्छा करने लगे। तभी देवराज इंद्र ने उनके लिए सुंदर आसन उपस्थित किया जिस पर भगवती विराजमान हो गईं। लक्ष्मी पूजन की सभी सामग्री एकत्रित कर ऋषियों ने विधिपूर्वक भगवती का अभिषेक कराया। उस अवसर पर देवताओं में अपार हर्ष फैला हुआ था। अप्सराएं नाच रही थीं, गंधर्व गायन कर रहे थे। विधिपूर्वक पूजन होने पर सागर ने भगवती को पीले वस्त्र और विश्वकर्मा ने कमल समॢपत किया। इसके पश्चात मांगलिक वस्त्र और आभूषणों से सुसज्जित होकर देवताओं और असुरों पर एक दिव्य दृष्टि डाली, परन्तु उनमें से उन्हें जीवन साथी के रूप में कोई योग्य वर दिखाई न पड़ा क्योंकि उन्हें तो श्री भगवान विष्णु की खोज थी। ज्यों ही हरि दिखाई पड़े, त्यों ही उन्होंने हाथों में पकड़ी कमलों की माला भगवान के गले में अर्पण कर दी। भगवान नारायण ने उन्हें अपने वाम अंग में स्थान ग्रहण कराया और उन्हें हृदय रूपी अचल पद दिया। तत्पश्चात फिर सागर-मंथन का कार्य शुरू हो गया। अनेक रत्नों की प्राप्ति के बाद अमृत कलश लिए भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए। देखते ही अमृत कलश को दानवों ने अपने कब्जे में कर लिया। देवता निराश होकर विष्णु भगवान के पास गए। भगवान हरि विश्व मोहिनी का रूप धारण कर वहां प्रकट हो गए। उनके रूप को देखकर दानव गण अति मोहित हो गए और अपनी सुध-बुध खो बैठे। तभी मोहिनी रूप धारी भगवान हरि ने दैत्यों को हाव-भाव एवं नेत्र कटाक्ष आदि संकेतों से संतुष्ट करते हुए समस्त अमृत देवताओं में बांट दिया और भगवती लक्ष्मी भगवान विष्णु के पास विराजित हो गईं।

माता लक्ष्मी की पूजा विधि

माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए माता लक्ष्मी की विधि पूर्वक पूजा करनी आवश्यक है। माता लक्ष्मी की पूजा व व्रत विशेष रुप से शुक्रवार को किया जात है किन्तु प्रत्येक दिन उनकी पूजा करने से विशेष कृपा की प्राप्ति होती है। पूजा सबसे पहले पूजा के जलपात्र से थोड़ा जल लेकर मूर्तियों के ऊपर छिड़कें इससे मूर्तियों का पवित्रकरण हो जायेगा, इसके पश्चात स्वयं को, पूजा सामग्री एवं अपने आसन को भी पवित्र करें। पवित्रीकरण के दौराण निम्न मंत्र का जाप करें-ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स: वाह्याभंतर: शुचि:।। इसके बाद जिस जगह पर आसन बिछा है उस जगह को भी पवित्र करें और मां पृथ्वी को प्रणाम करें। इस प्रक्रिया में निम्न मंत्र का उच्चारण करें। इसके बाद संकल्प लें। संकल्प लेने के बाद भगवान श्री गणेश व मां गौरी की पूजा करें। इसके बाद कलश पूजें। हाथ में थोड़ा जल लेकर आह्वान व पूजन मंत्रों का उच्चारण करें फिर पूजा सामग्री चढायें। फिर नवग्रहों की पूजा करें, इसके लिये हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर नवग्रह स्तोत्र बोलें। तत्पश्चात भगवती षोडश मातृकाओं का पूजन करें। माताओं की पूजा के बाद रक्षाबंधन करें। रक्षाबंधन के लिये मौलि लेकर भगवान गणपति पर चढाइये फिर अपने हाथ में बंधवा लीजिये और तिलक लगा लें। इसके बाद महालक्ष्मी की पूजा करें। माँ लक्ष्मी जी की पूजा के लिए वेदों में कई महत्वपूर्ण मन्त्र दिये गये हैं। इसके बाद माता लक्ष्मी की चालीसा पढ़ आरती कर आशीर्वाद ग्रहण करें। लक्ष्मी जी की पूजा करते वक़्त साफ़-सफाई का विशेष ध्यान दिया जाना चाहिये। दीपावली के अवसर पर मां लक्ष्मी की पूजा के बाद दीपक पूजन करें इसके लिये तिल के तेल के सात, ग्यारह, इक्कीस अथवा ज्यादा दीपक प्रज्जवलित कर एक थाली में रखकर पूजा करें।

माता लक्ष्मी का मूल मंत्र

ॐ श्री लक्ष्मीः नमः

माता लक्ष्मी के मंत्र

पृथ्विति मंत्रस्य मेरुपृष्ठः ग ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मोदेवता आसने विनियोगः॥
ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्‌॥
पृथिव्यै नमः आधारशक्तये नमः
एवं
धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसुः।
धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरुणं धनमस्तु ते।।
अश्वदायै गोदायै धनदायै महाधने।
धनं मे जुषतां देवि सर्वकामांश्च देहि मे।।
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ।।

श्री लक्ष्मी चालीसा

॥ दोहा॥
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास।
मनोकामना सिद्घ करि, परुवहु मेरी आस॥
॥ सोरठा॥
यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करुं।
सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥

॥ चौपाई ॥
सिन्धु सुता मैं सुमिरौ तोही।
ज्ञान बुद्घि विघा दो मोही ॥
तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरवहु आस हमारी॥
जय जय जगत जननि जगदम्बा। सबकी तुम ही हो अवलम्बा॥1॥
तुम ही हो सब घट घट वासी। विनती यही हमारी खासी॥
जगजननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥2॥
विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी॥
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥3॥
कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी। जगजननी विनती सुन मोरी॥
ज्ञान बुद्घि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥4॥
क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिन्धु में पायो॥
चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभु बनि दासी॥5॥
जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रुप बदल तहं सेवा कीन्हा॥
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥6॥
तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥
अपनाया तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥7॥
तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी। कहं लौ महिमा कहौं बखानी॥
मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन इच्छित वांछित फल पाई॥8॥
तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मनलाई॥
और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करै मन लाई॥9॥
ताको कोई कष्ट नोई। मन इच्छित पावै फल सोई॥
त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणी॥10॥
जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै। ध्यान लगाकर सुनै सुनावै॥
ताकौ कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥11॥
पुत्रहीन अरु संपति हीना। अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना॥
विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै॥12॥
पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥13॥
बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥
प्रतिदिन पाठ करै मन माही। उन सम कोइ जग में कहुं नाहीं॥14॥
बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥
करि विश्वास करै व्रत नेमा। होय सिद्घ उपजै उर प्रेमा॥15॥
जय जय जय लक्ष्मी भवानी। सब में व्यापित हो गुण खानी॥
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयालु कहुं नाहिं॥16॥
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजै॥
भूल चूक करि क्षमा हमारी। दर्शन दजै दशा निहारी॥17॥
बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी। तुमहि अछत दुःख सहते भारी॥
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्घि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥18॥
रुप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥
केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्घि मोहि नहिं अधिकाई॥19॥
॥ दोहा॥
त्राहि त्राहि दुख हारिणी, हरो वेगि सब त्रास।
जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नाश॥
रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर।
मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर॥

माता लक्ष्मी के नाम एवं अर्थ

1 प्रकृति = प्रकृति
2 विकृति = दो रूपी प्रकृति
3 विद्या = बुद्धिमत्ता
4 सर्वभूतहितप्रदा= ऐसा व्यक्ति जो संसार के सारे सुख दे सके
5 श्रद्धा = जिसकी पूजा होती है
6 विभूति = धन की देवी
7 सुरभि स्वर्गीय = देवी
8 परमात्मिका = सर्वव्यापी देवी
9 वाची = जिसके पास अमृत भाषण की तरह हो
10 पद्मालया = जो कमल पर रहती है
11 पद्मा = कमल
12 शुचि = पवित्रता की देवी
13 स्वाहा = शुभ
14 स्वधा = एस अव्यक्ति जो अशुभता को दूर करे
15 सुधा = अमृत की देवी
16 धन्या =आभार का अवतार
17 हिरण्मयीं = जिसकी दिखावट गोल्डन है
18 लक्ष्मी =धन और समृद्धि की देवी
19 नित्यपुष्ट = जिससे दिन पे दिन शक्ति मिलती है
20 विभा जिसका चेहरा दीप्तिमान है
21 अदिति = जिसकी चमक सूरज की तरह है
22 दीत्य =जो प्रार्थना का जवाब देता है
23 दीप्ता =लौ की तरह
24 वसुधा = पृथ्वी की देवी
25 वसुधारिणी = पृथ्वी की रक्षक
26 कमला = कमल
27 कांता = भगवान विष्णु की पत्नी
28 कामाक्षी = आकर्षक आंखवाली देवी
29 कमलसम्भवा = जो कमल मे से उपस्तित होती है
30 अनुग्रहप्रदा = जो शुभकामनाओ का आशीर्वाद देती है
31 बुद्धि = बुद्धि की देवी
32 अनघा = निष्पाप या शुद्ध की देवी
33 हरिवल्लभी = भगवान विष्णु की पत्नी
34 अशोक = दुःख को दूर करने वाली
35 अमृता = अमृत की देवी
36 दीपा = दितिमान दिखने वाली
37 लोकशोकविनाशिनी = सांसारिक मुसीबतों को निअक्लने वाली
38 धर्मनिलया = अनन्त कानून स्थापित करने वाली
39 करुणा = अनुकंपा देवी
40 लोकमट्री = ब्रह्माण्ड की देवि
41 पद्मप्रिया = कमल की प्रेमी
42 पद्महस्ता = जिसके हाथ कमल की तरह है
43 पद्माक्ष्य = जिसकी आँख कमल के जैसी है
44 पद्मसुन्दरी = कमल की तरह सुंदर
45 पद्मोद्भवा = कमल से उपस्तित होने वलि
46 पद्ममुखी = कमल के दीप्तिमान जैसी देवि
47 पद्मनाभप्रिया = पद्मनाभ की प्रेमिका - भगवान विष्णु
48 रमा = भगवान विष्णु को खुश करने वाले
49 पद्ममालाधरा = कमल की माला पहनने वाली
50 देवी = देवी
51 पद्मिनी = कमल की तरह
52 पद्मगन्धिनी = कमल की तरह खुशनु है जिसकी
53 पुण्यगन्धा = दिव्य सुगंधित देवी
54 सुप्रसन्ना = अनुकंपा देवी
55 प्रसादाभिमुखी = वरदान और इच्छाओं को अनुदान देने वाली
56 प्रभा = देवि जिसका दीप्तीमान सूरज की तरह हो
57 चंद्रवंदना = जिसका दीप्तिमान चन्द्र की तरह हो
58 चंदा = चन्द्र की तरह शांत
59 चन्द्रसहोदरी = चंद्रमा की बहन
60 चतुर्भुजा = चार सशस्त्र देवी
61 चन्द्ररूपा = चंद्रमा की तरह सुंदर
62 इंदिरा = सूर्य की तरह चमक
63 इन्दुशीतला = चाँद की तरह शुद्ध
64 अह्लादजननी = ख़ुशी देने वाली
65 पुष्टि = स्वास्थ्य की देवी
66 शिव = शुभ देवी
67 शिवाकारी = शुभ का अवतार
68 सत्या = सच्चाई
69 विमला = शुद्ध
70 विश्वजननी = ब्रह्माण्ड की देवि
71 पुष्टि = धन का स्वामी
72 दरिद्रियनशिनी = गरीबी को निकलने वाली
73 प्रीता पुष्करिणी = देवि ज्सिजी आँखें सुखदायक है
74 शांता = शांतिपूर्ण देवी
75 शुक्लमालबारा = सफ़द वस्त्र पेहेंने वलि
76 भास्करि = सूरज की तरह चमकदार
77 बिल्वनिलया = जो बिल्व पेड़ के निच्चे रहता है
78 वरारोहा = देवि जो इच्छाओ का दान देने वलि
79 यशस्विनी = प्रसिद्धि और भाग्य की देवी
80 वसुंधरा = धरती माता की बेटी
81 उदरंगा = जिसका शरीर सुंदर है
82 हरिनी = हिरण की तरह है जो
83 हेमामालिनी = जिसके पास स्वर्ण हार है
84 धनधान्यकी = स्वास्थ प्रदान करने वलि
85 सिद्धी = रक्षक
86 स्टरीनासौम्य = महिलाओं पर अच्छाई बरसाने वाली
87 शुभप्रभा = जो शुभता प्रदान करे
88 नृपवेशवगाथानंदा = महलों में रहता है जो
89 वरलक्ष्मी = समृद्धि की दाता
90 वसुप्रदा = धन को प्रदान करने वाली
91 शुभा = शुभ देवी
92 हिरण्यप्राका = सोने मे
93 समुद्रतनया = महासागर की बेटी
94 जया = विजय की देवी
95 मंगला = सबसे शुभ
96 देवी = देवता या देवी
97 विष्णुवक्षः = जिसके के साइन भगवान् विष्णु रहते है
98 विष्णुपत्नी = भगवान विष्णु की पत्नी
99 प्रसन्नाक्षी = जीवंत आंखवाले
100 नारायण समाश्रिता = जो भगवान् नारायण के चरण मेइन जान चाहता है
101 दरिद्रिया ध्वंसिनी = गरीबी समाप्त करने वाली
102 डेवलष्मी = देवी
103 सर्वपद्रवनिवर्णिनी = दुःख दूर करने वाली
104 नवदुर्गा = दुर्गा के सभी नौ रूप
105 महाकाली = काली देवी का एक रूप
106 ब्रह्मा-विष्णु-शिवात्मिका = ब्रह्मा विष्णु शिव के रूप में देवी
107 त्रिकालज्ञानसम्पन्ना = जिससे अतीत, वर्तमान और भविष्य के बारे में पता है
108 भुवनेश्वराय = ब्रह्माण्ड की देवि या देवता
माता लक्ष्मी की आरती

देवी लक्ष्मी
लक्ष्मी जी की आरती

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता ।
तुमको निसदिन सेवत हर-विष्णु-धाता ॥ॐ जय...
उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता ।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता ॥ॐ जय...
तुम पाताल-निरंजनि, सुख-सम्पत्ति-दाता ।
जोकोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि-धन पाता ॥ॐ जय...
तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता ।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनि, भवनिधि की त्राता ॥ॐ जय...
जिस घर तुम रहती, तहँ सब सद्गुण आता ।
सब सम्भव हो जाता, मन नहिं घबराता ॥ॐ जय...
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न हो पाता ।
खान-पान का वैभव सब तुमसे आता ॥ॐ जय...
शुभ-गुण-मंदिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता ।
रत्न चतुर्दश तुम बिन कोई नहिं पाता ॥ॐ जय...
महालक्ष्मीजी की आरती, जो कई नर गाता ।
उर आनन्द समाता, पाप शमन हो जाता ॥ॐ जय...

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