हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, लक्ष्मी भाग्य की देवी हैं तो कुबेर धन के देवता है। कुबेर को धन, वैभव, सुख, समृद्धि का देवता माना जाता है। कहा जाता है कि जो लोग कुबेर की पूजा करते हैं उनके पास कभी धन की कमी नहीं होती। परंपरागत तौर पर कुबेर की पूजा भारत में अच्छे व्यापार के लिए व्यापारी समुदाय विशेष रुप से करते हैं। भगवान कुबेर की पूजा विशेषकर दीवाली के दिन की जाती है। इनकी पूजा रात में करने का विधान हैं। कुबेर धरती पर धन की रक्षा भी करते हैं। यह धन के देवता होने के साथ यक्षों के भी देवता हैं। पृथ्वी के भीतर छिपे खजाने की देख-रेख करने की जिम्मेदारी कुबेर पर ही है। भगवान कुबेर की पूजा ज्यादातर यंत्र के रूप में होती है। उनकी प्रतिमा यंत्र के रुप में स्थापित की जाती है। यह शक्तिशाली यंत्र किसी की भी किस्मत को बदल कर सुख-समृद्धि ला सकता है। भारत के प्रमुख तीन धर्मों हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म के अनुयायी कुबेर की पूजा करते हैं। कुबरे का वर्णन धार्मिक गंर्थों में बखूबी मिलता है। भगवान कुबरे सदा माता लक्ष्मी के साथ पूजे जाते हैं। यह उन्हीं के साथ रहते हैं। कुबरे को भारत के प्राचीन देवताओं में से एक माना जाता है। जो स्वयं यक्ष जैसे देश के संरक्षक हैं। भगवान कुबेर की दिशा उत्तरी है। उनकी पूजा अक्सर उत्तक दिशा में की जाती है। पौराणिक दृढ़ विश्वास है कि भगवान कुबेर भगवान ब्रह्मा के पुत्र हैं और अल्कापुरी के शासक हैं। भगवान कुबेर को रावण का सौतेला भाई भी माना जाता है। कुबेर को इसाखा भी कहा जाता है क्योंकि वह भगवान शिव के उपासक हैं और उनके सबसे करीब है। प्राचीन ग्रंथों में धन लाभ के लिए भगवान कुबेर की साधना का समर्थन किया गया है। भगवान कुबेर की पूजा से सभी भौतिकवादी सुविधाएं प्राप्त होती हैं। इनकी उपासना करने वाले भक्त को कभी धन की कमी नहीं होती। भगवान कुबेर प्रसन्न होकर शीघ्र आशीर्वाद प्रदान करते हैं। भगवान कुबेर की पूजा सबसे लघु और शीघ्र होती है।
भगवान कुबेर

कुबेर का स्वरुप और उनका महत्व

ग्रंथों के अनुसार कुबेरदेव का उदर यानी पेट बड़ा है। इनके शरीर का रंग पीला है। ये किरीट, मुकुट आदि आभूषण धारण करते हैं। एक हाथ में गदा तो दूसरा हाथ धन देने वाली मुद्रा में रहता है। इनका वाहन पुष्पक विमान है। इन्हें मनुष्यों के द्वारा पालकी पर विराजित दिखाया जाता है। कुबेर राजाओं के अधिपति तथा धन के स्वामी हैं। वे देवताओं के धनाध्यक्ष के रूप मे जाने जाते हैं। इसीलिए इन्हें राजाधिराज भी कहा जाता है। गंधमादन पर्वत पर स्थित संपत्ति का चौथा भाग इनके नियंत्रण में है। उसमें से सोलहवां भाग ही मानवों को दिया गया है। कुबेर नौ-निधियों के अधिपति जो हैं। ये निधियां हैं- पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुंद, कुंद, नील, और वर्चस। ऐसा कहते हैं कि इनमें से एक निधि भी अनंत वैभव देने वाली है। कुबेर देवाधिदेव शिव के मित्र हैं। इसलिए जो इनकी उपासना करता है, उसकी आपत्तियों के समय रक्षा भी होती है। प्राय: सभी यज्ञ-यागादि, पूजा-उत्सवों तथा दस दिक्पालों के रूप में भी कुबेर की पूजा होती है। ये उत्तराधिपति हैं यानी उत्तर दिशा के अधिपति हैं।

कुबेर का जीवन परिचय

भगवान कुबेर पूर्व जन्म में कुबेर गुणनिधि नामक वेदज्ञ ब्राह्मण थे। गुणनिधि बड़े धर्मात्मा थे, परंतु कुसंगति में पड़कर धीरे-धीरे मति भ्रम के कारण गुणनिधि के सारें अच्छे गुण अवगुणों में परिवर्तित गयें। गुणनिधि के इस अवगुणों से उनके पिता अज्ञात थे परंतु उनकी माता इस सभी कार्यो से भली प्रकार से परिचित थी परंतु उन्होने पुत्र मोह के कारण यह बात अपने पति को नहीं बताई। जिसके फल स्वरुप गुणनिधि ने अपनी सारी पैतृक संपति का नाश कर दिया। एक दिन किसी प्रकार गुणनिधि के पिता को उनके दुष्कर्मो का पता चला। गुणनिधि पिता के क्रोध एवं भय से घर छोड़कर भाग कर शिव मंदिर में जा छिपे थे। उस दिन शिवरात्री थी इसलिये शिव मंदिर में शिव भक्त शिवरात्रि का पूजन और प्रसाद के साथ शिव पूजा का विधि-विधान कर रहे थे। घर से भागने एवं वन में भटकने के कारण गुणनिधि पूरे दिन भूख-प्यास से परेशान था, इस कारण प्रसाद आदि खाद्य वस्तुओं को देखने पर गुणनिधि कि भूख और ज्यादा बढ़ गई। रात्रि काल में शिव भक्तों के सो जाने के पश्चयात गुणनिधि बार बार दीपक जलाकर प्रसाद ढूंढने की कोशिश करने लगे। वो बार बार दीपक जलाते और हवा के झोंके के कारण वो बुझ जाता। भोलेभंडारी शिव को लगा कि वो उनका परम भक्त है और उन्होंने गुणनिधि को प्रसन्न होकर अगले जन्म में धन का राजा बनने का आशीर्वाद दे दिया। शास्त्र पुराणों में कुबेर के पिता विश्रवा एवं पितामह प्रजापति पुलस्त्य होने का उल्लेख मिलता हैं। कुबेर कि पत्नी का नाम भद्रा हैं। कुबेर के दो पुत्र नाल कुबेर और मणीग्रीव। कैलाश पर स्थित अलकापुरी राज्य में निवास करते हैं। कुबेर कि सभा में सर्वोच्च रत्न जडि़त सिंहासन पर महाराज कुबेर विराजते हैं। रंभा, उर्वशी, मेनका, मिश्र केशी आदि अप्सराएं किन्नर, यज्ञ और गंधर्वगण तथा ब्रह्मर्षि देवर्षि तथा ऋषिगण उनकी सभा में विराजते हैं। कुबेर कि सेवा में यक्ष एवं राक्षस हर समय उपस्थित रहते हैं। कुबेर ने नर्मदा के कावेरी तट पर सौ वर्षो तक घोर तपस्या कि जिससे प्रसन्न होकर शिवजी ने कुबेर को यक्षों का अधिश्वर बना दिया है। कुबेर ने जिस स्थान पर तपस्या कि उस स्थान का नाम कुबेर तीर्थ पड़ा, जहां कुबेर को अनेक वरदान प्राप्त हुवे। रूद्र के साथ मित्रता, धन का स्वामित्व, दिक्पालत्व एवं नल कुबेर नामक पुत्र आदि वर प्राप्त होते ही धन एवं नव निधियों का स्वामीत्व कुबेर को प्राप्त हुवां। उस स्थान पर आकर मरूद्गणों ने कुबेर का अभिषेक किया, पुष्पक विमान भेट देकर कुबेर को यक्षों का राजा बना दिया। उस स्थान पर राज्यश्री के रूप में साक्षात महालक्ष्मी नित्य वास करती हैं। राजाधिराज धनाध्यक्ष कुबेर अपनी सभा में बैठकर अपने वैभव(धन) एवं निधियों का दान करते हैं। इसलिए कुबेर कि पूजा-अर्चना से उनकी प्रसन्नता प्राप्त कर मनुष्य धन प्राप्त कर लेता हैं। धन त्रयोदशी एवं दीपावली पर कुबेर विशेष पूजा-अर्चना कि जाती हैं जो शीघ्र फल प्रदान करने वाली मानी जाती हैं।

रावण के भाई कुबेर

धर्म ग्रंथों के अनुसार रावण के दो सगे भाई कुंभकर्ण और विभीषण के अलावा उनके एक सौतेले भाई कुबेर थे। रामायण के अनुसार महर्षि पुलस्त्य ब्रह्माजी के मानस पुत्र थे। उनका विवाह राजा तृणबिंदु की पुत्री से हुआ था। महर्षि पुलस्त्य के पुत्र का नाम विश्रवा था। वह भी अपने पिता के समान सत्यवादी व जितेंद्रीय था। विश्रवा के इन गुणों को देखते हुए महामुनि भरद्वाज ने अपनी कन्या इड़विड़ा का विवाह उनके साथ कर दिया। महर्षि विश्रवा के पुत्र का नाम वैश्रवण रखा गया। वैश्रवण का ही एक नाम कुबेर है। महर्षि विश्रवा की एक अन्य पत्नी का नाम कैकसी था। वह राक्षसकुल की थी। कैकसी के गर्भ से ही रावण, कुंभकर्ण व विभीषण का जन्म हुआ था। इस प्रकार रावण कुबेर का सौतेला भाई हुआ। रामायण के अनुसार कुबेर को उनके पिता मुनि विश्रवा ने रहने के लिए लंका प्रदान की। ब्रह्माजी कुबेरदेव की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें उत्तर दिशा का स्वामी व धनाध्यक्ष बनाया था। साथ ही मन की गति से चलने वाला पुष्पक विमान भी दिया था। अपने पिता के कहने पर कुबेरदेव ने सोने की लंका अपने भाई रावण को दे दी और कैलाश पर्वत पर अलकापुरी बसाई। रावण जब विश्व विजय पर निकला तो उसने अलकापुरी पर भी आक्रमण किया। रावण और कुबेरदेव के बीच भयंकर युद्ध हुआ, लेकिन ब्रह्माजी के वरदान के कारण कुबेरदेव रावण से पराजित हो गए। रावण ने बलपूर्वक कुबेर से ब्रह्माजी द्वारा दिया हुआ पुष्पक विमान भी छिन लिया था। तब शिवजी की उपासना कुबेर ने की भगवान शिव ने कुबेर की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें धन का देवता बना दिया।

कुबेर के अन्य नाम

कुबेरदेव को वैसे तो वैश्रवण के नाम से जाना जाता है। इन्हें एड़विड़ और एकाक्षपिंगल भी कहा जाता है। माता का नाम इड़विड़ा होने के कारण इनका एड़विड़ नाम पड़ा। कहते हैं माता पार्वती की ओर देखने के कारण कुबेर की दाहिनी आंख पीली पड़ गई इसीलिए इनका एक नाम एकाक्षपिंगाल भी पड़ा।

भगवान कुबेर की पूजा विधि

कुबेर की उपासना से माया यानी धन की प्राप्ति होती है। धनत्रयोदशी तथा दीपावली के दिन इनका खासतौर से पूजन किया जाता है। इसके अलावा फाल्गुन त्रयोदशी से साल भर हर माह शुक्ल त्रयोदशी को कुबेर व्रत करने का विधान है। भगवान कुबेर की पूजा के लिए पीला कपड़ा या चटाई, चावल, धूप, वर्मिलॉन, लकड़ी की मेज, कुछ फल, तेल दीपक, क्रिस्टल रोज़री, कॉपर कुबेर यंत्र, आम जंगल, घी, हवन या यज्ञ मंच का आयोजन किया जाता है। फिर कुबेर साधना अनुष्ठान अमावस्या के दिन या किसी भी रविवार की सुबह, सूर्योदय से पहले प्रभावी रुप में किया जाता है। भक्त को ठंडे पानी से स्नान करने के बाद साफ पीले कपड़े पहनना चाहिए और पीले रंग की चटाई पर बैठना या उत्तर का सामना करना चाहिए। एक लकड़ी के पट्टा लें और पीले कपड़े से ढकें। स्टील प्लेट पर कुमकुम से एक स्वास्तिक बनाएं। घी और धूप की छड़ें दीपक को हल्का करें। पट्टा पर चावल का एक चक्की बनाओ और उस पर कुबेर यंत्र रखें। यंत्र के चारों ओर चार अलग-अलग प्रकार के फल रखेंने चाहिए। फिर भगवान गणपति की प्रार्थना करते हुए - "ओम गाम गणपतय नमः" ग्यारह बार जाप करना चाहिए। इसके बाद भगवान कुबेर के रूप में ध्यान करना। इसके बाद क्रिस्टल रोज़री के साथ निम्नलिखित मंत्र के 8 पुरुष करें। "ओम यक्षय कुबेरा धन धर्म्यापतिपति अक्षय निधि समृद्धिम दे देहराय स्वामी।" इसके बाद, ऊपर मंत्र का जप करते हुए यज्ञ अग्नि में घी के साथ 108 दायित्व दें। साधना को पूरा करने के बाद, पीले कपड़े में फलों को छोड़कर सभी पूजा लेखों को बांधें और इसे अपने लॉकर में रखें दें। भगवान कुबेर को प्रसन्न करने के लिए उत्तर दिशा में तांबे से भरा कलश रख कर उस पर पानी वाला नारियल रखें। इससे सकारात्मकता का संचार होगा। घर-दुकान की उत्तर दिशा में तीन सिक्के लाल रंग के कपड़े में बांधकर छुपा कर रख दें। ध्यान रखें इन पर किसी की दृष्टि नहीं पड़नी चाहिए। प्रतिदिन कुबेर दिशा में पानी वाला नारियल रख कर उस पर हल्दी कुमकुम लगाएं। पुराने नारियल को चलते पानी में बहा दें।

श्री कुबेर यंत्रकुबेर यंत्र


इस यंत्र को घर के मंदिर, पैसा, बक्सा, अलमारी, तिजोरी और उन कार्यालयों में रखते है जहां वित्तीय लेनदेन किए जाते हैं। यंत्र इस तरह से बनाया जाता है कियह किसी भी तरफ से जोड़ने पर 72 हो जाता है-
उदाहरण: - 27 + 20 + 20 + 23 = 72,25 + 24 + 23 = 72 23 + 28 + 21 = 72।
27 20 25
22 24 26
23 28 21।

कुबेर महा मंत्र

कुबेरा का मंत्र धन के प्रवाह और धन जमा करने की क्षमता बढ़ाने में मदद करता है। कुबेर मंत्र है-

"ओम यक्ष्याय कुबेर्या वैष्णवनाय धनधानादी पद्यय धन-धन्या समृद्धिंग मी देही दपया स्वाहा"।
अर्थात: यक्षों के स्वामी कुबेरा, हमें धन और समृद्धि के साथ आशीर्वाद करें।

कुबेर क्लीं मंत्र

मंत्र- ॐ श्रीं, ॐ ह्रीं श्रीं, ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय: नम:।

कुबेर तीर्थ स्थल

कुबेर ने जिन स्थानों पर तपस्या की थी, वे स्थान कुबेर तीर्थ के नाम से जाने जाते हैं। नर्मदा और कावेरी नदी के तट पर कुबेर ने तप किया था। हरियाणा के कुरुक्षेत्र में स्थित भद्रकाली मंदिर के निकट सरस्वती नदी के तट पर कुबेर तीर्थ हैं। कहते हैं यहां कुबेर ने यज्ञ किए थे।
 


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