भगवान कृष्ण हिंदुओं के सबसे प्रसिद्ध देवता हैं। भगवान कृष्ण की लीलाएं आज भी पूरे विश्व में प्रचलित है। कृष्ण ना केवल एक भगवान है बल्कि वो एक दोस्त, गुरु और एक सच्चे प्रेमी भी है। कृष्ण और राधा का प्रेम जितना पवित्र प्रेम आज तक किसी ने नहीं किया है लोग आज भी उनके प्रेम को आदर्श मानकर उनका अनुसरण करते हैं। भगवान कृष्ण भगवान विष्णु का आठवां अवतार माने जाते हैं। भगवान कृष्ण का जन्म त्रेतायुग में भाद्रपद अष्टमी के रोहिणी नक्षत्र में रात्रि 12 बजे हुआ था। श्री कृष्ण को जन्म देने वाले माता पिता, वासुदेव एवं देवकी हैं। किन्तु श्री कृष्ण के पालनहार नंदबाबा और माता यशोदा है। इसलिए कृष्ण को नंदलाल और वासुदेव भी कहा जाता है। श्री कृष्ण हिंदू धर्म के सबसे प्रचलित देवता हैं। घर-घर में श्री कृष्ण की पूजा-अर्चना की जाती है। श्री कृष्ण के कई रुपों को अनुसरण उनके भक्त करते हैं। चाहे श्री कृष्ण का बाल रुप हो जिसमें उन्होंने कई बाल लीलाएं की हैं, या फिर राधा और गोपियों के साथ उनका प्रेम प्रसंग है। महाभारत के युद्ध में गुरु बनकर अर्जुन के मार्गदर्शक हों या रुकमणी के पति के रुप में हो। कृष्ण के सभी रुप भक्तों में प्रचलित है। कृष्ण को कई नामों से संबोधित किया जाता है। बचपन में माखन चुराने के कारण उन्हें माखनचोर, नटखट कृष्णा कहा जाता था तो गोपियों को सताने के लिए उन्हें छलिया कहके संबोधित किया जाता था। भगवान कृष्ण को अर्जुन का मार्गदर्शन करने हेतु जगतगुरु भी कहा जाता है। गीता और महाभारत श्री कृष्ण से ही जुड़ें हुए हैं। कृष्ण साधारण व्यक्ति न होकर 'युग पुरुष' थे। उनके व्यक्तित्व में भारत को एक प्रतिभा सम्पन्न 'राजनीतिवेत्ता' ही नही, बल्कि एक महान् 'कर्मयोगी' और 'दार्शनिक' प्राप्त हुआ। श्री कृष्ण ने 124 सालों तक इस धरती पर अनेकों लीलाएं की अनेकों राक्षसों का अंत किया संसार को ज्ञान दिया। उनकी मृत्यु के पश्चात ही कलयुग का आरंभ हुआ। 124 वर्षों के जीवनकाल के बाद उन्होंने अपनी लीला समाप्त की। उनकी मृत्यु के तुरंत बाद ही कलियुग का आरंभ माना जाता है। भगवान कृष्ण को विशेष रूप से वैष्णव संप्रदाय द्वारा भगवान विष्णु का आठवां अवतार मानकर पूजा जाता है। भगवद् गीता में, ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने अर्जुन को कौरवों के खिलाफ लड़ाई जीतने के लिए निर्देशित किया था। कृष्ण की आमतौर पर पूजा उनकी प्रेमिका राधा के साथ पूजा की जाती है। इन दोनों की जोड़ी को अनंत प्रेम और शुद्धता का प्रतिक माना जाता है। कृष्ण से जुड़े कई त्योहार भारत में मनाए जाते है। विशेषकर होली और जन्माष्टमी को पूरे भारतवर्ष में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
भगवान कृष्ण

भगवान कृष्ण का जीवन परिचय

भगवान कृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा में भाद्रपद मास में कृष्ण पक्ष में अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में रात के 12 बजे वासुदेव और देवकी के आठवें पुत्र के रुप में हुआ था। श्रीमद भागवत के वर्णन अनुसार द्वापरयुग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज करते थे। उनका एक क्रुर पुत्र कंस था और उनकी एक बेटी देवकी थी। देवकी का विवाह वसुदेव के साथ हुआ था। कंस ने सत्ता के लालच में अपने पिता को कारगर में डाल दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन गया। कंस को जब पचा चला कि कंस की मृत्यु उनके भानजे, देवकी के 8वे संतान के हाथो होनी है तो उसने अपनी भहन और बहनोई देवकी और वासुदेव को कारावास में बंद कर दिया औक एक-एक करके उनकी संतानों को मारने लगा। किन्तु भगवान विष्णु स्वंय कृष्ण के रुप में देवकी के गर्भ से रात्रि में प्रकट हुए। कृष्ण का जन्म आधी रात को हुआ तब कारागृह के द्वार स्वतः ही खुल गए उस समय सभी सिपाही निंद्रा में थे। गोकुल के निवासी नन्द की पत्नी यशोदा की भी संतान का जन्म होने वाला था। वासुदेव अपने पुत्र को सूप में रखकर उसे गोकुल पहुंचाना उचित समझा और कारागार से निकल कर वह गोकुल में कृष्ण को नंदबाबा और यशोदा को दे आए। जिसके बाद देवकी और नंद बाबा ने उनका लालन पालन किया। आज भी कृष्ण को देवकी से ज्यादा यशोदा के पुत्र के रुप में जाना जाता है। आज भी कृष्ण का जन्मदिन जन्माष्टमी के नाम से भारत, नेपाल, अमेरिका सहित विश्वभर में मनाया जाता है। कई भारतीय ग्रंथों में कहा गया है कि पौराणिक कुरुक्षेत्र युद्ध (महाभारत के युद्ध ) में गांधारी के सभी सौ पुत्रो की मृत्यु हो जाती है। दुर्योधन की मृत्यु से पहले रात को, कृष्णा ने गांधारी को उनकी संवेदना प्रेषित की थी । गांधारी कृष्ण पर आरोप लगाती है की कृष्ण ने जानबूझ कर युद्ध को समाप्त नहीं किया, क्रोध और दुःख में उन्हें श्राप देती हैं कि उनके अपने यदु राजवंश में हर व्यक्ति उनके साथ ही नष्ट हो जाएगा। महाभारत के अनुसार, यादव के बीच एक त्यौहार में एक लड़ाई की शुरुवात हो जाती है, जिसमे सब एक-दूसरे की हत्या करते हैं। सो रहे कृष्ण को एक हिरण समझ कर , जरा नामक शिकारी तीर मारता है जो उन्हें घातक रूप से घायल करता है कृष्णा जरा को क्षमा करते है और देह त्याग देते हैं। 

भगवान कृष्ण का बाल रुपकृष्ण की बाल लीला

श्री कृष्ण की बाल लीला के किस्से आज भी बहुत प्रचलित हैं। कृष्ण ने अपने बचपन में कई कारनामें, कई शरारतें की हैं जिसे कृष्ण लीला कहा जाता है। भगवान कृष्ण की लालाएं इतनी प्रचलित हैं कि उनके परम भक्त सूरदास ने उन्हें अपने पदों के माध्यम से व्याख्याति किया है। कहते थे कि-
“मैं नहीं माखन खायो मैया । मैं नहीं माखन खायो । ख्याल परै ये सखा सबै मिली मेरैं मुख लपटायो ।। देखि तुही छींके पर भजन ऊँचे धरी लटकायो । हौं जु कहत नान्हें कर अपने मैं कैसे करि पायो ।। मुख दधि पोंछी बुध्दि एक किन्हीं दोना पीठी दुरायो । डारी सांटी मुसुकाइ जशोदा स्यामहिं कंठ लगायो ।। बाल बिनोद मोद मन मोह्यो भक्ति प्राप दिखायो । सूरदास जसुमति को यह सुख सिव बिरंचि नहिं पायो ।।”
अर्थात। श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं में माखन चोरी की लीला सुप्रसिध्द है वो माखन के प्रति इतने ज्यादा आकर्षित रहते थे कि अपने घर के साथ-साथ बाकी ग्वालियनों के घर के भी माखन चोरी-छुप्पे खा जाते थे औऱ अपने साथियों को खिलाते थे। जब एक बार उन्हें माता देवकी ने पकड़ लिया तो उन्होंने बड़े प्यार से माता को कहा कि मैने माखन नहीं खाया है। सब जूठ बोल रहें हैं। वो कहे रहे हैं कि माता तुम्हीं बताओं यह मटका इतना उंचा में कैसे उतार सकता हूंकन्हैया की इस चतुराई को देखकर यशोदा मन ही मन में मुस्कुराने लगी और कन्हैया को गले से लगा लिया ।
श्री कृष्ण जब छोटे थे तो एक बार माता ने उनका मुंह में झांका था उन्हें उनके मुख में सपूंर्ण संसार दिखाई देने लगा। श्री कृष्ण ने बचपन में ही कई राक्षसों का अंत किया। अपने मामा कंस द्वारा भेजे गए कई दानवों को कृष्ण ने बड़ी चतुराई से मार गिराया। एक बार कृष्ण अपनी माता से पूछते हैं कि माता मेरी चोटी कब बढ़ेगी।
मैया कबहुं बढ़ैगी चोटी।
किती बेर मोहि दूध पियत भइ यह अजहूं है छोटी॥
तू जो कहति बल की बेनी ज्यों ह्वै है लांबी मोटी।
काढ़त गुहत न्हवावत जैहै नागिन-सी भुई लोटी॥
काचो दूध पियावति पचि पचि देति न माखन रोटी।
सूरदास त्रिभुवन मनमोहन हरि हलधर की जोटी॥
यही नहीं श्री कृष्ण ने अपने बचपन में पुतना, बकासुर,शकटासुर जैसे कई दानवों को मार कर उनका उद्धार किया था। श्री कृष्ण ने वर्षा के देवता इन्द्र का घमंड तोड़ने के लिए गोवर्धन पर्वत को उपनी एख उंगली पर ही उठा लिया था। श्री कृष्ण और राधा का प्रेम भी किसी से छिपा नहीं कृष्ण कालें थे और राधा गोरी इस बात को लेकर भी वो अपनी माता से पूछते थे कि मां राधा क्यों गौरी है मैं क्यों काला हूं, बलदेव भैया कहते हैं कि मैं तुम्रा बेटा नहीं हूं, तुमने मुझे खरीदा है तुम सब गौरे हो। तभी तुम मुझे डांटती हो कृष्ण के इन मासूम सवालों को सुनकर यशोदा मुस्कुरा देती थी और कृष्ण से अधिक प्रेम करने लग जाती थी। राधा और अन्य गोपियों के साथ कृष्ण ने कई रासलीलाएं की थी। राधा के साथ झूला झूलना, बांसूरी बजाना उन्हें बहुत भाता था। एक बार तो उन्होंने गोपियों के वस्त्र भी चुरा लिए थे। कृष्ण की इन लीलाओं के कारण ही उन्हें रासरसिया, छलिया कहा जाता था।

श्री कृष्ण का वयस्क जीवन

जब श्री कृष्ण बडे हुए तो उन्हें ज्ञात हुआ कि उनके माता पिता देवकी और वासुदेव है जो उनके मामा की कैद में है इसलिए वह गोकुल छोड़कर मथुरा आ गए और यहां उन्होंने कंस का संहार किया। कृष्ण ने महाभारत के समय अर्जुन का साथ सारथी के रुप में गुरु बनकर दिया। महाभारत में चित्रित प्रसिद्ध कुरुक्षेत्र युद्ध में, अर्जुन कृष्ण को पांडवों की जीत चाहते थेय़ लेकिन वो स्वंय शस्त्र नहीं उठा सकते थे क्योंकि कोरवों की माता गंधारी उनकी बुआ थी। इसलिए उन्होंने सच्चाई का साथ देने के लिए गीता के संदेशों के जरिए अर्जुन और पांडवों का मार्गदर्शन किया और उन्हें जीत दिलाई। कुरुक्षेत्र के युद्ध में गांधारी के सभी 100 पुत्र मारे गए थे। जब कृष्णा उन्हें सांत्वना देने पहुंचे तो गांधारी ने क्रोध में आकर उन्हें श्राप दिया की अगले 36 वर्षों में उनके साथ साथ संपूर्ण यदुवंश का नाश हो जाएगा। कृष्णा देख रहे थे की यदुवंश स्वतः ही धीरे धीरे पतन की ओर अग्रसर हो रहा था अतः उन्होंने गांधारी की घोषणा के पूर्ण होते ही तथास्तु का वरदान दे दिया। कृष्ण की मृत्यु जरा नामक एक शिकारी के बाण से हुई थी जब उसके द्वारा चलाया हुआ तीर गलती से कृष्ण के तलवे में जा लगा था। ये देखकर उसने कृष्ण से माफ़ी मांगी तो कृष्ण ने बताया की ये उनके कर्मों का फल है। पिछले जन्म में उन्होंने राम के रूप में बाली पर पेड़ की ओट से बाण चलाया था। जरा दरअसल बाली का पुनर्जन्म था। जरा का जन्म ही कृष्ण से बदला लेने के लिए हुआ था। उनकी मृत्यु के साथ ही कलयुग का आंरभ माना जाता है।

कृष्ण का विवाह और 16 हजार रानियां

कहते हैं कि कृष्ण ने 16000 रानियों से विवाह किया था उनकी 16 हजार पत्नियां थी। महाभारत अनुसार कृष्ण ने रुक्मणि का हरण कर उनसे विवाह किया था। विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मणि भगवान कृष्ण से प्रेम करती थी और उनसे विवाह करना चाहती थी। रुक्मणि के पांच भाई थे- रुक्म, रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेस तथा रुक्ममाली। रुक्मणि सर्वगुण संपन्न तथा अति सुन्दरी थी। उसके माता-पिता उसका विवाह कृष्ण के साथ करना चाहते थे किंतु रुक्म चाहता था कि उसकी बहन का विवाह चेदिराज शिशुपाल के साथ हो। यह कारण था कि कृष्ण को रुक्मणि का हरण कर उनसे विवाह करना पड़ा। पांडवों के लाक्षागृह से कुशलतापूर्वक बच निकलने पर सात्यिकी आदि यदुवंशियों को साथ लेकर श्रीकृष्ण पांडवों से मिलने के लिए इंद्रप्रस्थ गए। युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, द्रौपदी और कुंती ने उनका आतिथ्यठ-पूजन किया। इस प्रवास के दौरान एक दिन अर्जुन को साथ लेकर भगवान कृष्ण वन विहार के लिए निकले। जिस वन में वे विहार कर रहे थे वहां पर सूर्य पुत्री कालिन्दी, श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने की कामना से तप कर रही थी। कालिन्दी की मनोकामना पूर्ण करने के लिए श्रीकृष्ण ने उसके साथ विवाह कर लिया।फिर वे एक दिन उज्जयिनी की राजकुमारी मित्रबिन्दा को स्वयंवर से वर लाए। उसके बाद कौशल के राजा नग्नजित के सात बैलों को एकसाथ नाथ कर उनकी कन्या सत्या से पाणिग्रहण किया। तत्पश्चात उनका कैकेय की राजकुमारी भद्रा से विवाह हुआ। भद्रदेश की राजकुमारी लक्ष्मणा भी कृष्ण को चाहती थी, लेकिन परिवार कृष्ण से विवाह के लिए राजी नहीं था तब लक्ष्मणा को श्रीकृष्ण अकेले ही हरकर ले आए। भगवान् कृष्ण की 16108 पत्नियाँ थी जिनमें 8 प्रमुख थी। रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, नाग्नजिती, कालिंदी, मित्रविन्दा, भद्रा, लक्ष्मणा इन्हें अस्टभार्य के नाम से भी जाना जाता है। इनमें प्रत्येक से कृष्ण के 10 पुत्र थे। कृष्ण ने नार्कासुर नामक दैत्य के पास से 16100 स्त्रियों को छुड़ाया था जिन्हें उसने जबरन अपने महल में बंदी बना रखा था। चूँकि वो सभी कृष्ण के साथ वापस लौटी थी किसी के परिवार ने उन्हें स्वीकार नहीं किया था। अतः उन सभी की लाज की रक्षा करने के लिए कृष्ण ने उनसे विवाह कर लिया था। कहा जाता है की कृष्ण के कभी उनके साथ सम्बन्ध नहीं रहे। कृष्ण के दिल मे सदा राधा के लिए ही प्रेम रहा। राधा से उन्होंने शादी नहीं की थी किन्तु फिर भी हर जगह राधा-कृष्ण कहा जाता है और उनकी सम्मानपूर्वक पूजा की जाती है।
भगवान कृष्ण

कृष्ण का स्वरुप

भगवान कृष्ण के विभिन्न स्वरुप रहे हैं। जिनकी पूजा की जाती है। कृष्ण का रंग कृष्ण यानि काला और नीला है। उनके चित्रों में उन्हें सदा पीले रंग के वस्त्र एवं मुकुट पर मोर पंख पहने देखा जाता है। उनका पैर सदा योगमुद्रा में एक के उपर एक होता है। हाथों में बांसुरी लिए अपने मुख से वो बजाते दिखते हैं। गाय, बछड़े एवं गोपालें उनके आगे-पीछे रहते हैं। कृष्ण को कई चित्रों में अर्जुन को महाभारत के समय ज्ञान देता हुआ भी दर्शाया जाता है। जिसमें वो गीता का संदेश दे रहे होते हैं। कृष्ण के बाल रुपों में उन्हें माखन खाते हुए दिखाया जाता है। जिसके घुंघराले बाल हैं, और बालों में मोरल पंख लगा है। हाथों और पैरों में सुसज्जित गहने और हाथ एवं मुंह पर माखन लगा हुआ है। कृष्ण का यह रुप सबसे लोकप्रिय है।

श्री कृष्ण चालीसा

॥दोहा॥
बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम।
अरुण अधर जनु बिम्बफल, नयन कमल अभिराम॥
पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज।
जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज॥
जय यदुनंदन जय जगवंदन।जय वसुदेव देवकी नन्दन॥
जय यशुदा सुत नन्द दुलारे। जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥
जय नटनागर, नाग नथइया॥ कृष्ण कन्हइया धेनु चरइया॥
पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो। आओ दीनन कष्ट निवारो॥
वंशी मधुर अधर धरि टेरौ। होवे पूर्ण विनय यह मेरौ॥
आओ हरि पुनि माखन चाखो। आज लाज भारत की राखो॥
गोल कपोल, चिबुक अरुणारे। मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥
राजित राजिव नयन विशाला। मोर मुकुट वैजन्तीमाला॥
कुंडल श्रवण, पीत पट आछे। कटि किंकिणी काछनी काछे॥
नील जलज सुन्दर तनु सोहे। छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥
मस्तक तिलक, अलक घुँघराले। आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥
करि पय पान, पूतनहि तार्यो। अका बका कागासुर मार्यो॥
मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला। भै शीतल लखतहिं नंदलाला॥
सुरपति जब ब्रज चढ़्यो रिसाई। मूसर धार वारि वर्षाई॥
लगत लगत व्रज चहन बहायो। गोवर्धन नख धारि बचायो॥
लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई। मुख मंह चौदह भुवन दिखाई॥
दुष्ट कंस अति उधम मचायो॥ कोटि कमल जब फूल मंगायो॥
नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें। चरण चिह्न दै निर्भय कीन्हें॥
करि गोपिन संग रास विलासा। सबकी पूरण करी अभिलाषा॥
केतिक महा असुर संहार्यो। कंसहि केस पकड़ि दै मार्यो॥
मातपिता की बन्दि छुड़ाई ।उग्रसेन कहँ राज दिलाई॥
महि से मृतक छहों सुत लायो। मातु देवकी शोक मिटायो॥
भौमासुर मुर दैत्य संहारी। लाये षट दश सहसकुमारी॥
दै भीमहिं तृण चीर सहारा। जरासिंधु राक्षस कहँ मारा॥
असुर बकासुर आदिक मार्यो। भक्तन के तब कष्ट निवार्यो॥
दीन सुदामा के दुःख टार्यो। तंदुल तीन मूंठ मुख डार्यो॥
प्रेम के साग विदुर घर माँगे।दर्योधन के मेवा त्यागे॥
लखी प्रेम की महिमा भारी।ऐसे श्याम दीन हितकारी॥
भारत के पारथ रथ हाँके।लिये चक्र कर नहिं बल थाके॥
निज गीता के ज्ञान सुनाए।भक्तन हृदय सुधा वर्षाए॥
मीरा थी ऐसी मतवाली।विष पी गई बजाकर ताली॥
राना भेजा साँप पिटारी।शालीग्राम बने बनवारी॥
निज माया तुम विधिहिं दिखायो।उर ते संशय सकल मिटायो॥
तब शत निन्दा करि तत्काला।जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥
जबहिं द्रौपदी टेर लगाई।दीनानाथ लाज अब जाई॥
तुरतहि वसन बने नंदलाला।बढ़े चीर भै अरि मुँह काला॥
अस अनाथ के नाथ कन्हइया। डूबत भंवर बचावइ नइया॥
सुन्दरदास आ उर धारी।दया दृष्टि कीजै बनवारी॥
नाथ सकल मम कुमति निवारो।क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥
खोलो पट अब दर्शन दीजै।बोलो कृष्ण कन्हइया की जै॥
॥दोहा॥
यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि।
अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥

श्री कृष्ण मूल मंत्र
ओम कृष्णाय नमः

श्री कृष्ण महा मंत्र
हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे
हरे कृष्णा हरे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा, हरे हरे।।

भगवान कृष्ण के 108 नाम

1 अचला : भगवान।
2 अच्युत : अचूक प्रभु, या जिसने कभी भूल ना की हो।
3 अद्भुतह : अद्भुत प्रभु।
4 आदिदेव : देवताओं के स्वामी।
5 अदित्या : देवी अदिति के पुत्र।
6 अजंमा : जिनकी शक्ति असीम और अनंत हो।
7 अजया : जीवन और मृत्यु के विजेता।
8 अक्षरा : अविनाशी प्रभु।
9 अम्रुत : अमृत जैसा स्वरूप वाले।
10 अनादिह : सर्वप्रथम हैं जो।
11 आनंद सागर : कृपा करने वाले
12 अनंता : अंतहीन देव
13 अनंतजित : हमेशा विजयी होने वाले।
14 अनया : जिनका कोई स्वामी न हो।
15 अनिरुध्दा : जिनका अवरोध न किया जा सके।
16 अपराजीत : जिन्हें हराया न जा सके।
17 अव्युक्ता : माणभ की तरह स्पष्ट।
18 बालगोपाल : भगवान कृष्ण का बाल रूप।
19 बलि : सर्व शक्तिमान।
20 चतुर्भुज : चार भुजाओं वाले प्रभु।
21 दानवेंद्रो : वरदान देने वाले।
22 दयालु : करुणा के भंडार।
23 दयानिधि : सब पर दया करने वाले।
24 देवाधिदेव : देवों के देव
25 देवकीनंदन : देवकी के लाल (पुत्र)।
26 देवेश : ईश्वरों के भी ईश्वर
27 धर्माध्यक्ष : धर्म के स्वामी
28 द्वारकाधीश : द्वारका के अधिपति।
29 गोपाल : ग्वालों के साथ खेलने वाले।
30 गोपालप्रिया : ग्वालों के प्रिय
31 गोविंदा : गाय, प्रकृति, भूमि को चाहने वाले।
32 ज्ञानेश्वर : ज्ञान के भगवान
33 हरि : प्रकृति के देवता।
34 हिरंयगर्भा : सबसे शक्तिशाली प्रजापति।
35 ऋषिकेश : सभी इंद्रियों के दाता।
36 जगद्गुरु : ब्रह्मांड के गुरु
37 जगदिशा : सभी के रक्षक
38 जगन्नाथ : ब्रह्मांड के ईश्वर।
39 जनार्धना : सभी को वरदान देने वाले।
40 जयंतह : सभी दुश्मनों को पराजित करने वाले।
41 ज्योतिरादित्या : जिनमें सूर्य की चमक है।
42 कमलनाथ : देवी लक्ष्मी की प्रभु
43 कमलनयन : जिनके कमल के समान नेत्र हैं।
44 कामसांतक : कंस का वध करने वाले।
45 कंजलोचन : जिनके कमल के समान नेत्र हैं।
46 केशव :
47 कृष्ण : सांवले रंग वाले।
48 लक्ष्मीकांत : देवी लक्ष्मी की प्रभु।
49 लोकाध्यक्ष : तीनों लोक के स्वामी।
50 मदन : प्रेम के प्रतीक।
51 माधव : ज्ञान के भंडार।
52 मधुसूदन : मधु- दानवों का वध करने वाले।
53 महेंद्र : इन्द्र के स्वामी।
54 मनमोहन : सबका मन मोह लेने वाले।
55 मनोहर : बहुत ही सुंदर रूप रंग वाले प्रभु।
56 मयूर : मुकुट पर मोर- पंख धारण करने वाले भगवान।
57 मोहन : सभी को आकर्षित करने वाले।
58 मुरली : बांसुरी बजाने वाले प्रभु।
59 मुरलीधर : मुरली धारण करने वाले।
60 मुरलीमनोहर : मुरली बजाकर मोहने वाले।
61 नंद्गोपाल : नंद बाबा के पुत्र।
62 नारायन : सबको शरण में लेने वाले।
63 निरंजन : सर्वोत्तम।
64 निर्गुण : जिनमें कोई अवगुण नहीं।
65 पद्महस्ता : जिनके कमल की तरह हाथ हैं।
66 पद्मनाभ : जिनकी कमल के आकार की नाभि हो।
67 परब्रह्मन : परम सत्य।
68 परमात्मा : सभी प्राणियों के प्रभु।
69 परमपुरुष : श्रेष्ठ व्यक्तित्व वाले।
70 पार्थसार्थी : अर्जुन के सारथी।
71 प्रजापती : सभी प्राणियों के नाथ।
72 पुंण्य : निर्मल व्यक्तित्व।
73 पुर्शोत्तम : उत्तम पुरुष।
74 रविलोचन : सूर्य जिनका नेत्र है।
75 सहस्राकाश : हजार आंख वाले प्रभु।
76 सहस्रजित : हजारों को जीतने वाले।
77 सहस्रपात : जिनके हजारों पैर हों।
78 साक्षी : समस्त देवों के गवाह।
79 सनातन : जिनका कभी अंत न हो।
80 सर्वजन : सब- कुछ जानने वाले।
81 सर्वपालक : सभी का पालन करने वाले।
82 सर्वेश्वर : समस्त देवों से ऊंचे।
83 सत्यवचन : सत्य कहने वाले।
84 सत्यव्त : श्रेष्ठ व्यक्तित्व वाले देव।
85 शंतह : शांत भाव वाले।
86 श्रेष्ट : महान।
87 श्रीकांत : अद्भुत सौंदर्य के स्वामी।
88 श्याम : जिनका रंग सांवला हो।
89 श्यामसुंदर : सांवले रंग में भी सुंदर दिखने वाले।
90 सुदर्शन : रूपवान।
91 सुमेध : सर्वज्ञानी।
92 सुरेशम : सभी जीव- जंतुओं के देव।
93 स्वर्गपति : स्वर्ग के राजा।
94 त्रिविक्रमा : तीनों लोकों के विजेता
95 उपेंद्र : इन्द्र के भाई।
96 वैकुंठनाथ : स्वर्ग के रहने वाले।
97 वर्धमानह : जिनका कोई आकार न हो।
98 वासुदेव : सभी जगह विद्यमान रहने वाले।
99 विष्णु : भगवान विष्णु के स्वरूप।
100 विश्वदक्शिनह : निपुण और कुशल।
101 विश्वकर्मा : ब्रह्मांड के निर्माता
102 विश्वमूर्ति : पूरे ब्रह्मांड का रूप।
103 विश्वरुपा : ब्रह्मांड- हित के लिए रूप धारण करने वाले।
104 विश्वात्मा : ब्रह्मांड की आत्मा।
105 वृषपर्व : धर्म के भगवान।
106 यदवेंद्रा : यादव वंश के मुखिया।
107 योगि : प्रमुख गुरु।
108 योगिनाम्पति : योगियों के स्वामी।

श्री कृष्ण आरती

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला ।
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला ।

गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली ।
लतन में ठाढ़े बनमाली;
भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक;
ललित छवि श्यामा प्यारी की ॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की…

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं ।
गगन सों सुमन रासि बरसै;
बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग;
अतुल रति गोप कुमारी की ॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की…

जहां ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा ।
स्मरन ते होत मोह भंगा;
बसी सिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच;
चरन छवि श्रीबनवारी की ॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की…

चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू ।
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू;
हंसत मृदु मंद,चांदनी चंद, कटत भव फंद;
टेर सुन दीन भिखारी की ॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की…
श्री कृष्ण
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