हिन्दू मान्यतानुसार नौ ग्रह हैं जिन्हें नवग्रह कहा जाता है। इनमें से सात ग्रहों की पूजा देव के रुप में होती है इनके नाम से सप्ताह के दिन भी निर्धारित है। किन्तु राहु और केतु दो ऐसे ग्रह हैं जो देव नहीं हैं। यह एक ही व्यक्ति के दो रुप है। अमृतमंथन के बाद एक असुर ने देवताओं का रुप धारण कर अमृतपान कर लिया था जिसके कारण भगवान विष्णु ने उसके दो टुकड़े कर दिए थे। इन दो टुकड़ों को राहू-मुख और केतु-धड़ के रुप में जाना जाता है। केतु का मनुष्य जनो के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। कहने को तो केतु एक धड़ है जिसके पास आंख, नाक, कान, मुंह कुछ नहीं है किन्तु फिर भी वो मनुष्य जनों के जीवन में महत्व रखता है। केतु वास्तव में ग्रह नहीं है बल्कि एक छाया है जो सूर्य एवं चंद्र ग्रह पर ग्रहण लगाता है। केतु का अपना कोई रुप नहीं है। यह वास्तव में सटीक बिंदु है जहां चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के साथ सामान्य राशि चक्र देशांतर के संरेखण में स्थित रहता है। राहू से केतु हमेशा 180 डिग्री अलग दिशा में चलता है। ज्योतिष शास्त्र में केतु अशुभ तथा छाया ग्रह के रूप में जाना जाता है कहा जाता है की जब केतु की महादशा या अन्तर्दशा आती है तो व्यक्ति को कोई न कोई परेशानी अवश्य आती है। यह व्यक्ति के जीवन-क्षेत्र तथा समस्त सृष्टि को यह प्रभावित करता है। राहु की अपेक्षा केतु विशेष सौम्य तथा व्यक्ति के लिए हितकारी हैं। विशेष परिस्थितियों में केतु व्यक्ति को यश के शिखर पर पहुँचा देता है। केतु का मंडल ध्वजाकार माना गया है। कदाचित यही कारण है कि यह आकाश में लहराती ध्वजा के समान दिखाई देता है। इसका माप केवल छः अँगुल है। केतु कुछ मनुष्यों के लिये ख्याति पाने में अत्यंत सहायक रहता है। माना जाता है कि केतु के शुभ रहने पर यह एक पल में व्यक्ति को करोड़पती बना देती है। केतु को प्रायः सिर पर कोई रत्न या तारा लिये हुए दिखाया जाता है, जिससे रहस्यमयी प्रकाश निकल रहा होता है।
केतु

केतु की उत्पति कथा

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, सभी देवताओं द्वारा अमर अमृत पीने के अवसर पर राहु को भगवान विष्णु ने सूर्य और चंद्रमा की शिकायतों पर दंडित किया था। केतु एक रूप में स्वरभानु नामक असुर के सिर का धड़ है। जब असुर और देवताओं ने मिलकर समुद्र मंथन किया तो उसमे से अमृत निकला। किन्तु देवताओं को अमृत पिलाने के लिए और असुरों से अमृत बचाने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लिया। जब वो स्त्री का रुप धारण कर देवताओं को अमृतपान करा रहे थे तभी केतु देवताओं का रुप धारण कर देवताओं की पंक्ति में बैठ गया और अमृत पान करने लगा। तभी सूर्य एवं चंद्रमा ने उसे संदिग्ध जान भगवान विष्णु के उसके बारे में बता दिया। भगवान विष्णु ने क्रोधित होकर अपने सुदर्शन चक्र से केतु का गला काट दिया। चूंकि अमृत का पान वो गले तक कर चूका था तो वो सिर के रुप में जीवित रह गया और धड़ अलग होकर केतु के रुप में बन गया। तदनन्तर तपस्या करने से इन्हे भी ग्रहो में सम्मिलित कर लिया गया। जिसके बाद से सूर्य एंवं चंद्रमा से बदला लेन के हेतु राहु एवं केतु इन पर ग्रहण लगाते हैं। जो सूर्य एवं चंद्र ग्रहण के नाम से प्रचलित है।

केतु का स्वरुप

केतु को आमतौर पर हिंदू धर्म में "छाया" ग्रह के रूप में जाना जाता है और अक्सर एक रहस्य प्रकाश को दर्शाते हुए उसके सिर पर एक मणि या स्टार के साथ चित्रित किया जाता है। केतु को "मोक्ष-करका" या आध्यात्मिकता को प्रभावित करने वाले ग्रह के रूप में भी जाना जाता है। केतु की दो भुजाएँ हैं। वे अपने सिर पर मुकुट तथा शरीर पर काला वस्त्र धारण करते हैं। केतु का शरीर धूम्रवर्ण तथा मुख विकृत है। वे अपने एक हाथ में गदा और दूसरे में वरमुद्रा धारण किए रहते हैं। केतु का वाहन गिद्ध है। यह सूर्य एवं चंद्र को अपना शत्रु मान ग्रहण लगाता है। केतु एक नरक ग्रह है और किसी भी राशि चक्र पर शासन नहीं करता है, लेकिन मीन को अपने घर के रूप में पहचानता है। केतु को वृश्चिक में सम्मानित किया जाता है और वृषभ में घबरा जाता है। यह धनुष, मीन, कन्या और मिथुन में मजबूत है। केतु बुध, शुक्र, शनि और राहु के साथ खूबसूरती से चला जाता है। केतु बृहस्पति के तटस्थ है जबकि मंगल, सूर्य और चंद्रमा इसके दुश्मन हैं।

केतु का जीवन पर असर

केतु का मनुष्य जनों के जीवन पर खासा एसर पड़ता है। यदि मनुष्यों की कुंडली के अनुसार केतु सही नहीं है तो वो मनुष्य को अशुभ फल देकर पीडित करता है। मनुष्य के बुरे कर्म भी केतु को अशुभ करते हैं यदि कोई मनुष्य अपने पुरखों का मजाक उड़ाता है या उनका श्राद्धकर्म सही से नहीं करता तो केतु अशुभ हो जाता है। घर में पूजा पाठ ना करने से, गणेश, दुर्गा, हनुमान का अपमान करने से भी केतु अशुभ हो जाता है। झूछ बोलना, गृहकलेश करना, तंत्र, मंत्र जादू, टोने मे रहना केतु को क्रोधित करता है। केतु के खराब बोने से बुद्दि भ्रष्ट हो जाती है। व्यक्ति तांत्रिक क्रियाएं करने लगता है। भूत-प्रेत में विश्वास कर जादू-टोने करने लगता है। मन में नकरात्मक विचार आने लगते हैं। पैर, कान, रीढ़, घुटने, लिंग, किडनी और जोड़ के रोग परेशान करने लगते हैं। मन में हमेशा किसी अनहोनी की आशंका बनी रहती है। नींद से व्यक्ति बार-बार जागने लगता है। बैचेनी बनी रहती है। केतु के खराब होने पर संतान उत्पति में बाधा आती है। पेशाब की बीमारी हो जाती है। शरीर कमजोर हो जाता है। बाल झड़ने लगते हैं।
वहीं यदि केतु शुभ होता है तो व्यक्ति को राजा बना देता है। केतु के शुभ होने से मकान, दुकान या वाहन पर ध्वज के समान व्यक्ति की प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि रहती है। केतु का शुभ होना अर्थात पद, प्रतिष्ठा और संतानों का सुख। ऐसे व्यक्ति की कई संतानें रहती हैं। केतु ही ऐसा ग्रह है।जो नव ग्रहो में भक्ति प्रधान देवता है। भक्ति, ज्ञान, वैराग्य का कारक ही केतु ग्रह है।यदि किसी भी मनुष्य की कुण्डली मे केतु ग्रह शुभ स्थिति में है।तो केतु ग्रह ऐसे जातक को भक्ति मार्ग, ज्ञान, वैराग्य, धर्मं, दान त्यागी बनाता है। किसी भी धर्म का प्रचारक, सन्तशिरोमणी, कथा वाचक, व्यास भगवान, धर्म शिक्षक, धर्मं शास्त्र-पुराण-किसी की भी धर्म की शिक्षा लेने वाला, दीन हीन की सेवा करने वाला, दानी होता है। कोई संस्था, विद्यालय,गरीब विद्याथियो को विद्या अध्ययन करवाने वाला होता है।हमेशा धर्म के कार्य करने करवाने में अपना समय जीवन व्यतीत करते है केतु शुभ है तो व्यक्ति में पूर्वाभास की क्षमता होता। ऐसे व्यक्ति कुल को तारने वाला होता है।

केतु की शांति के उपाय

केतु को शांत करने एवं उसे खुश करने के लिए घर मं देवी दुर्हा, हनुमान एवं श्री गणेश की अराधना करनी चाहिएष मनुष्यों को अच्छे कर्म करने चाहिए, कान छिदवाने से भी केतु शुभ होता है। घर में लड़ाई-झगड़ा नहीं होना चाहिए। कुत्तों को रोटी खिलानी चाहिए। केतु को शुभ करने के लिए अपने खाने में से कपिला गाय, कुत्ते, कौवे को हिस्सा दें। पक्षियों को बाजरा खिलाएं। चींटियों के लिए भोजन की व्यवस्था करें। तिल, जौ किसी हनुमान मंदिर में दान करें। गरीबों को भोजन कराएं। ऐसा करने से केतु प्रसन्न होकर शुभ फल देता है।

केतु से जुड़े तत्व

स्थान – वन
दिशा – नैऋत्य कोण
रत्न – नीलमणी
दृष्टि – नीचे देखते है। सप्तम के साथ साथ नवम दृष्टि भी मानी जाती है।
जाति – चांडाल
रंग – चितकबरा
दिन – मंगलवार
काल – तीन महीना
गुण- तामस
वस्त्र – रंगबिरंगा
पात्र – मिटटी का

केतु मूल मंत्र

"ओम केम केतवे नमः"

केतु नवग्रह मंत्र

ऊं नमो अर्हते भगवते श्रीमते पार्श्वस तीर्थंकराय धरेन्द्र यक्ष पद्मावतीयक्षी सहिताय |
ऊं आं क्रों ह्रीं ह्र: केतुमहाग्रह मम दुष्टनग्रह, रोग कष्टीनिवारणं सर्व शान्तिं च कुरू कुरू हूं फट् || ||

केतु बीज मंत्र

ऊं स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं स: केतवे नम: ||

केतु मंत्र

ॐ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे।
समुषद्भिरजायथा:।।

पौराणिक मन्त्र

“पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम्।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम्।।”

केतु गायत्री मंत्र

“ऊँ धूम्रवर्णाय विद्महे कपोतवाहनाय धीमहि तन्नं: केतु: प्रचोदयात।”

केतु स्तुति

जय जय केतु कठिन दुखहारी। निज जन हेतु सुमंगलकारी।।
ध्वजयुत रूण्ड रूप विकराला। घोर रौद्रतन अधमन काला।।
शिखी तारिका ग्रह बलवाना। महा प्रताप न तेज ठिकाना।।
वान मीन महा शुभकारी। दीजै शान्ति दया उरधारी।।

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