हिन्दू मान्यतानुसार व्यक्ति के संपूर्ण जीवन को चलाने का आधार नवग्रह हैं। यह नवग्रह ही व्यक्ति की दिशा और दशा तय करते हैं। इन नवग्रहों में चंद्र यानि सोम ग्रह का विशेष महत्व है। हिन्दू धर्म में चंद्र ग्रह को चंद्र देवता के रूप में पूजा जाता है। सनातन धर्म के अनुसार चंद्रमा जल तत्व के देव हैं। चंद्रमा को भगवान शिव ने अपने सिर पर धारण किया है। सोमवार का दिन चंद्र देव का दिन होता है। शास्त्रों में भगवान शिव को चंद्रमा का स्वामी माना जाता है। अतः जो व्यक्ति भोलेनाथ की पूजा करते हैं उन्हें चंद्र देव का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है। चंद्रमा की महादशा दस वर्ष की होती है। श्रीमद्भागवत के अनुसार, चंद्र देव महर्षि अत्रि और अनुसूया के पुत्र हैं। चंद्रमा सोलह कलाओं से युक्त हैं। पौराणिक शास्त्रों में चंद्रमा को बुध का पिता कहा जाता है और दिशाओं में यह वायव्य दिशा के स्वामी होते है। वहीं दूसरी ओर खगोल शास्त्र में चंद्रमा को पृथ्वी ग्रह का उपग्रह माना गया है। जिस प्रकार धरती सूर्य के चक्कर लगाती है ठीक उसी प्रकार चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है। पृथ्वी पर स्थित जल में होने वाली हलचल चंद्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण होती है। सूर्य के बाद आसमान पर सबसे चमकीला चंद्रमा ही है। जब चंद्रमा परिक्रमा करते हुए सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है तो यह सूर्य को ढक जाता है। उस स्थिति को सूर्य ग्रहण कहते हैं। चंद्रमा सूर्य से ही प्रकाश ग्रहण करता है। जितने भी दूध वाले वृक्ष हैं सभी चन्द्र के कारण उत्पन्न हुए हैं। चन्द्र को पौधों का भी देवता कहा जाता है। चन्द्रमा बीज, औषधि, जल, मोती, दूध, अश्व और मन पर राज करता है। लोगों की बेचैनी और शांति का कारण भी चन्द्रमा है। चन्द्रमा माता का सूचक और मन का कारक है। कुंडली में चन्द्र के अशुभ होने पर मन और माता पर प्रभाव पड़ता है।
चंद्र/सोम ग्रह

चंद्र का स्वरुप

चंद्र को सोम के रूप में भी जाना जाता है और उन्हें वैदिक चंद्र देवता सोम के साथ पहचाना जाता है। उनके स्वरुप में उन्हें जवान, सुंदर, गौर, द्विबाहु के रूप में वर्णित किया गया है और उनके हाथों में एक मुगदर और एक कमल रहता है। वे हर रात पूरे आकाश में अपना रथ चांद के रुप में चलाते हैं, जिसे दस सफेद घोड़े या मृगों द्वारा खींचा जाता है। वह ओस से जुड़े हुए हैं और जनन क्षमता के देवताओं में से एक हैं। सोम के रूप में वे, दिन सोमवार के स्वामी हैं। वे सत्व गुण वाले हैं और मन, माता की रानी का प्रतिनिधित्व करते हैं।

चंद्र ग्रह की उत्पति

पुराणों अनुसार चंद्र नामक एक राजा थे जिन्होंने चंद्रवंश की स्थापना की थी। देव और दानवों द्वारा किए गए सागर मंथन से जो 14 रत्न निकले थे उनमें से एक चंद्रमा भी थे जिन्हें भगवान शंकर ने अपने सिर पर धारण कर लिया था। चंद्रदेव या राजा चंद्र की कहानी को पुराणों ने चंद्र ग्रह से जोड़कर वर्णित किया। चंद्र देवता हिंदू धर्म के अनेक देवताओं में से एक हैं उन्हें जल तत्त्व का देव कहा जाता है। यह देवता हमारे मन को शांत करने वाले माने जाते हैं। चंद्रमा के अधिदेवता अप्‌ और प्रत्यधिदेवता उमा देवी हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार चंद्रदेव महर्षि अत्रि और अनुसूया के पुत्र हैं। इनको सर्वमय कहा गया है। ये सोलह कलाओं से युक्त हैं। इन्हें अन्नमय, मनोमय, अमृतमय पुरुषस्वरूप भगवान कहा जाता है। प्रजापितामह ब्रह्मा ने चंद्र देवता को बीज, औषधि, जल तथा ब्राह्मणों का राजा बनाया। चंद्रमा का विवाह राजा दक्ष की सत्ताईस कन्याओं से हुआ। ये कन्याएं सत्ताईस नक्षत्रों के रूप में भी जानी जाती हैं, जैसे अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी आदि। चंद्रदेव की पत्नी रोहिणी से उनको एक पुत्र मिला जिनका नाम बुध है। चंद्र ग्रह ही सभी देवता, पितर, यक्ष, मनुष्य, भूत, पशु-पक्षी और वृक्ष आदि के प्राणों का आप्यायन करते हैं। चंद्रमा की महादशा दस वर्ष की होती है।

चंद्र का जीवन पर असर

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन पर चंद्र का शुभ एवं अशुभ प्रभाव अवश्य पड़ता है। चंद्र की महादाशा दस साल की होती है। चंद्र के अशुभ होने पर यदि घर में घोड़ा पाल रखा हो तो उसकी मृत्यु हो जाती है। किंतु आमतौर पर अब लोगों के यहां ये जानवर नहीं होते। इसलिए यदि मां बीमार हो जाए तो भी चंद्र दोष लगा होता है। जल का स्त्रोत, कुएं, तालाब या घर में पानी जमा करने वाले बर्तनों में पानी की कमी होने लगे या सुख जाए तो चंद्र का बुरा प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति की महसूस करने की क्षमता कम हो जाती है। वो मानसिक रोगों का शिकार हो जाता है। मन में नकरात्मक बातें घर करने लगती है। बार-बार आत्महत्या करने का विचार आने लगता है। चंद्र से प्रभावित होने पर मिर्गी का दौरा पड़ता है। व्यक्ति बार-बार बेहोश होने लगता है। पागलपन, फेफड़े संबंधी रोग, मासिक धर्म में अनियमितता आ जाती है। शरीर क्षीण हो जाता है। वहीं चंद्र के शुभ होने पर व्यक्ति रुपवान बनता है। चंद्र भावनाओं, संवेदनशीलता, नरमता, कल्पना, रानी और मां के लिए जिम्मेदार है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जिस व्यक्ति के लग्न भाव में चंद्रमा होता है, वह व्यक्ति देखने में सुंदर और आकर्षक होता है और स्वभाव से साहसी होता है। चंद्र ग्रह के प्रभाव से व्यक्ति अपने सिद्धांतों को महत्व देता है। व्यक्ति की यात्रा करने में रुचि होती है। लग्न भाव में स्थित चंद्रमा व्यक्ति को प्रबल कल्पनाशील व्यक्ति बनाता है। इसके साथ ही व्यक्ति अधिक संवेदनशील और भावुक होता है। यदि व्यक्ति के आर्थिक जीवन की बात करें तो धन संचय में उसे कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

चंद्र देव को प्रसन्न करने के उपाय

चंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए प्रतिदिन माता के पैर छूने चाहिए क्योंकि चंद्र मन और माता के भी देव हैं। शिव की भक्ति, उपासना करने से भी चंद्र देव खुश होते हैं। सोमवार का व्रत करना लाभकारी होता है। चंद्र देव को सफेद रंग अत्याधिक प्रिय हैं। इसलिए सफेद वस्त्रों, मोती, पुष्प, चीनी, बैल, दही, शंख इत्यादिल का दान करना चाहिए। पौधों में पानी देना चाहिए। घर में दूध वाले पौधे लगाने से भी चंद्र देव की कृपा बनी रहती है।

चंद्र से जुड़े तत्व

रंगः सफ़ेद
धातु: चांदी
रत्न: मोती और चंद्रमा
तत्व: पानी
दिशा: उत्तर-पश्चिम
मौसम: सर्दियों का
खाद्य अनाज: चावल
दिवस : सोमवार
अंग : दिल, बांया भाग
वस्तु : चांदी, मोती, दुध
स्वभाव : शीतल और शांत
नक्षत्र : रोहिणी, हस्त, श्रवण
वाहन : हिरण, श्वेत रंग के दस घोड़ों से चलने वाला हीरे जड़ीत तीन पहियों वाला रथ है।
राशि : नक्षत्रों और कर्क राशि के स्वामी चंद्रमा के मित्र सूर्य,बुध। राहु और केतु शत्रु है। मंगल, गुरु, शुक्र और शनि सम हैं। राहु के साथ होने से चंद्र ग्रहण होता है।

चंद्र के अन्य नाम

सोम, रजनीपति, रजनीश, शशि, कला, निधि, इंदू, शशांक

चन्द्रमा का नवग्रह मंत्र

ऊं नमो अर्हते भगवते श्रीमते चंद्रप्रभु तीर्थंकराय विजय यक्ष |
ज्वामलामालिनी यक्षी सहिताय ऊं आं क्रों ह्रीं ह्र: सोम महाग्रह |
मम दुष्ट‍ग्रह, रोग कष्टं निवारणं सर्व शान्तिं च कुरू कुरू हूं फट्

चन्द्र मंत्र

ॐ इमं देवा असपत्नं सुवध्यं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय।
इमममुष्य पुत्रममुष्ये पुत्रमस्यै विश एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा।।

मूल मंत्र

चंद्रमा – ॐ श्रां श्रीं श्रौं स: चंद्राय नमः

चंद्र का गायत्री मंत्र

ॐ क्षीर पुत्राय विद्महे अमृततत्वाय धीमहि !
तन्नो चन्द्र: प्रचोदयात !
ॐ पद्मद्वाजय विद्महे हेम रूपायै धीमहि !
तन्नो चन्द्र: प्रचोदयात !

चन्द्र स्तुति

शशि, मय, रजनीपति, स्वामी। चन्द्र, कलानिधि नमो नमामी।।
राकापति, हिमांशु, राकेशा। प्रणवत जन नित हरहु कलेशा।।
सोम, इन्दुश्, विधु, शान्ति सुधाकर। शीत रश्मि, औषधी, निशाकर।।
तुमहीं शोभित भाल महेशा। शरण-शरण जन हरहु कलेशा।।



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