हिन्दू मान्यताओं और ज्योतिष शास्त्रों में नवग्रहों की बहुत महत्वता है। इसके अनुसार एक व्यक्ति के संपूर्ण जीवन का आधार इन्ही नवग्रहों पर टिका होता है। यह नवग्रह वैज्ञानिक तौर पर आकाशिय नौ ग्रह हैं जो पृथ्वी के समान घूमते रहते हैं। किन्तु ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार नवग्रह व्यक्ति का संपूर्ण जीवन है। यह नौ ग्रह ही मिलकर व्यक्ति की दिशा और दशा तय करते हैं। हिन्दू मान्यतानुसार खगोलिय पिंड एवं सौर मंडल के यह नौ ग्रह नौं देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह नौ देवता भगवान के रुप में पूजे जाते हैं। यह भी कहा जाता है कि इन सभी ग्रहों की उत्पति भगवान शिव के रुद्र रुप यानि क्रोधित रुप से हुई है। सौर मंडल के यह नौ ग्रह सात दिनों का भी प्रतिनिधित्व करते हैं जिनके नाम है सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि। अन्य दो ग्रह राहू और केतु हैं जो दानव प्रवृति के हैं किन्तु समुद्र मंथन के समय निकले अमृत का धोखे से पान कर लेने के कारण इन्हें नवग्रहों के रुप में शामिल किया गया है। ज्योतिष अनुसार जातक की जन्मतिथि, जन्म स्थान एवं जन्म के समयानुसार उसकी कुंडली बनती है जिसमें 9 ग्रहों की दशा का विवरण होता है और उसी के अनुसार यह अनुमान लगाया जाता है कि जातक का भविष्य कैसा रहेगा। यदि जातक की कुंडली में किसी प्रकार का ग्रह दोष होता है तो वह उसे प्रभावित करता है। हमारे सौरमंडल में 9 ग्रह यानि सूर्यचंद्रमामंगलबुधगुरुशुक्र और शनिराहू और केतु माने गये हैं हालांकि राहु व केतु को विज्ञान के अनुसार ग्रह नहीं माना जाता लेकिन ज्योतिषशास्त्र के अनुसार ये बहुत ही प्रभावशाली ग्रह हैं इन्हें छाया ग्रह की संज्ञा भी दी जाती है। इन सभी ग्रहों के गुणों का समावेश प्रत्येक जातक में मिलता है। प्रत्येक व्यक्ति किसी ना किसी परेशानी से ग्रसित रहता है। कोई रोग उसे बाध्य करता है तो कोई समस्या उसकी राह का रोड़ा बनती है। जीवन के प्रत्येकत उतार-चढ़ाव के पीछे इन्हीं ग्रहों का खेल होता है। यदि कोई ग्रह कोई कुंडली के अच्छे भाग में हो तो वो शुभ फल देता है वहीं यदि वह निचले भाग में हो तो व्यक्ति को कई प्रकार के कष्ट सहने पड़ते हैं। प्रत्येक ग्रह का अपना ही महत्व होता है। यह ग्रह एक राशि से दूसरी राशि में प्रवृष्ट होते रहते हैं। जिसका असर व्यक्ति के जीवन पर राशि के अनुसार पड़ता है। अगर बिना बात-बात पर घर में कलह क्लेश हो, हर काम बनते-बनते बिगड़ जाते हैं, शत्रु अकारण परेशान कर रहे हों , सेहत साथ नहीं दे रही होती है, मान सम्मान में हानि हो रही होती है, बच्चे की बुद्धि का विकास नहीं हो रहा होता है तो यह सभ नवग्रह के दोष के लक्षण हैं। जिसका अर्थ है कोई ना कोई ग्रह विपरित दिशा में चल रहा है जो परेशानी का कारण हैं। इन नवग्रहों को प्रसन्न करने एवं इनके द्वारा दी जा रही परेशानी से मुक्ति प्राप्त करने के लिए इन नवग्रहों की पूजा, अर्चना की जाती है। दान-पूजा-पाठ, जप-तप के जरिए नवग्रहों को शांत किया जाता है। भारत में कई नवग्रहों के मंदिर हैं। तमाम उतार चढ़ावों को रोकने के लिये और क्रोधित ग्रह को शांत करने के लिये धार्मिक व पौराणिक ग्रंथों में नव ग्रह यानि जीवन को प्रभावित करने वाले समस्त 9 ग्रहों की पूजा करने का विधान है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार राशियां 12 होती हैं। प्रत्येक राशि में प्रत्येक ग्रह अपनी गति से प्रवेश करते हैं। इसे ग्रहों की चाल कहा जाता है एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करने पर भी अन्य राशियों पर उसका सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। प्रत्येक जातक में प्रत्येक ग्रह के गुण भी पाये जाते हैं। जैसे सूर्य से स्वास्थ्य, चंद्र से सफलता तो मंगल सम्रद्धि प्रदान करता है। इसी तरह से हर ग्रह के अपने सूचक हैं जो हमारे जीवन को कहीं ना कहीं प्रभावित करते हैं। नवग्रहों की शांति के लिए विशेष रुप से नवग्रह शांति पूजा का आयोजन किया जाता है। जिससे नवग्रह शांत होकर शुभ फल देते हैं।
सूर्य ग्रह

सूर्य

नवग्रहों का पहला ग्रह रवि यानि सूर्य होते हैं। यह सप्ताह के पहले दिन यानि रविवार को संबोधित करते हैं। भगवान सूर्य का मूल अंक 1 होता है जो गिनती का भी पहला अंक हैं। जिसके कारण रवि ग्रह की महत्वता अपने आप बढ़ जाती है। बाकी सभी ग्रह रवि की ही परिकर्मा करते हैं। सूर्य सभी ग्रहों का केंद्र है और पूरे नौ ग्रह अपनी कक्षा में चलते हें। ब्रह्मवैर्वत पुराण तो सूर्य को परमात्मा स्वरूप मानता है। प्रसिद्ध गायत्री मंत्र सूर्य परक ही है। सूर्योपनिषद में सूर्य को ही संपूर्ण जगत की उतपत्ति का एक मात्र कारण निरूपित किया गया है। और उन्ही को संपूर्ण जगत की आत्मा तथा ब्रह्म बताया गया है। सूर्योपनिषद की श्रुति के अनुसार संपूर्ण जगत की सृष्टि तथा उसका पालन सूर्य ही करते है। सूर्य ही संपूर्ण जगत की अंतरात्मा हैं। अत: कोई आश्चर्य नहीं कि वैदिक काल से ही भारत में सूर्योपासना का प्रचलन रहा है। सूर्य यानि रवि उन ग्रहों में से प्रमुख हैं जिन्हें प्रत्यक्ष रुप से देखा जा सकता है। सूर्य का अनुसरण शैव एवं वैष्णव मत के अनुयानि भी करते हैं। भारवर्ष में सूर्य पूजा का विशेष प्रावधान हैं। ज्योतिष में सूर्य को राजा की पदवी प्रदान की गयी है। ज्योतिष के अनुसार सूर्य आत्मा एवं पिता का प्रतिनिधित्व करता है। सूर्य द्वारा ही सभी ग्रहों को प्रकाश प्राप्त होता है और ग्रहों की इनसे दूरी या नजदीकी उन्हें अस्त भी कर देती है। सूर्य सृष्टि को चलाने वाले प्रत्यक्ष देवता का रूप हैं। कुंडली में सूर्य को पूर्वजों का प्रतिनिधि भी माना जाता है। सूर्य पर किसी भी कुंडली में एक या एक से अधिक बुरे ग्रहों का प्रभाव होने पर उस कुंडली में पितृ दोष का निर्माण हो जाता है। व्यक्ति की आजीविका में सूर्य सरकारी पद का प्रतिनिधित्व करता है। सूर्य प्रधान जातक कार्यक्षेत्र में कठोर अनुशासन अधिकारी, उच्च पद पर आसीन अधिकारी, प्रशासक, समय के साथ उन्नति करने वाला, निर्माता, कार्यो का निरीक्षण करने वाला बनता है। बारह राशियों में से सूर्य मेष, सिंह तथा धनु में स्थित होकर विशेष रूप से बलवान होता है तथा मेष राशि में सूर्य को उच्च का माना जाता है। मेष राशि के अतिरिक्त सूर्य सिंह राशि में स्थित होकर भी बली होते हैं। यदि जातक की कुंडली में सूर्य बलवान तथा किसी भी बुरे ग्रह के प्रभाव से रहित है तो जातक को जीवन में बहुत कुछ प्राप्त होता है और स्वास्थ्य उत्तम होता है। सूर्य बलवान होने से जातक शारीरिक तौर पर बहुत चुस्त-दुरुस्त होता है।

सूर्य ग्रह की उत्पति एवं असर

सूर्य यानि सौर देवता, आदित्यों में से एक हैं। इनके पति कश्यप और उनकी माता अदिति हैं। भगवान सूर्य बल के देवता हैं। इनके रथ को सात घोड़े खींचते हैं जो मनुष्य के सात चक्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। भगवान सूर्य का दिन रविवार है। सूर्य को वैष्णव द्वारा सूर्य नारायण कहा जाता है। शैव धर्मशास्त्र में, सूर्य को शिव के आठ रूपों में से एक कहा जाता है, जिसका नाम अष्टमूर्ति है। उन्हें सत्व गुण का माना जाता है और वे आत्मा, राजा, ऊंचे व्यक्तियों या पिता का प्रतिनिधित्व करते हैं। हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार, सूर्य की अधिक प्रसिद्ध संततियों में हैं शनि , यम और कर्ण हैं। माना जाता है कि गायत्री मंत्र या आदित्य हृदय मंत्र (आदित्यहृदयम) का जप भगवान सूर्य को प्रसन्न करता है। सूर्य के साथ जुड़ा अन्न है गेहूं है। इनके बाल और हाथ सोने के हैं। सूर्य देव के रथ को 7 घोड़े खींचते हैं। वेदों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। सूर्य से ही इस पृथ्वी पर जीवन है। सूर्य जिस दिशा में उगते हैं वो पूर्व की दिशा होती है और जहां से अस्त होते हैं वो पश्चिम की दिशा होती है। सूर्य के उदय होने से ही प्राणी जनों के लिए सवेरा होता है और ढलने से रात होती है। सूर्य का मनुष्य के जीवन में अत्य़ाधित महत्व है। कुंडली के प्रथम भाव में सूर्य शुभ फल देने वाला होता है। सूर्य को ग्रहों का राजा कहा गया है। पहला घर सूर्य का ही होता है, इसलिए सूर्य का इस घर में होना अत्यंत शभ फलदायक होता है। सूर्य के विपरित होने पर - सिर दर्द,बुखार, नेत्र विकार,मधुमेह,मोतीझारा,पित्त रोग,हैजा,हिचकी के रोग से व्यक्ति पीड़ित हो जाता है। सूर्य को प्रसन्न करने के लिए बिना किसी से पूंछे ही मंत्र जाप, रत्न या जडी बूटी का प्रयोग कर लेना चाहिये। इससे रोग हल्का होगा और ठीक होने लगेगा। सूर्य की राशि लग्न में हो, या सूर्य लग्न बली होकर लग्न भाव में अथवा व्यक्ति की जन्म राशि सूर्य की राशि हो, तो व्यक्ति की आंखे, शहद के रंग की आंखें, शीघ्र ही क्रोधित होने वाला, कमजोर दृ्ष्टि वाला, कद में औसत होता है। सूर्य शरीर में पित्त, वायु, हड्डियां, घुटने और नाभी का प्रतिनिधित्व करता है। सूर्य के कारण व्यक्ति को ह्रदय रोग, हड्डियों का टूटना, माइग्रेन, पीलिया, ज्वर, जलन, कटना, घाव, शरीर में सूजन, विषाक्त, चर्म रोग, कोढ, पित्तीय संरचना, कमजोर दृष्टि, पेट, दिमागी, गडबडी, भूख की कमी जैसे रोग प्रभावित कर सकते हैं। सूर्य देव की प्रसन्नता के लिए इन्हें नित्य अर्घ्य देना चाहिए।प्रतिदिन एक निश्चित संख्या में सूर्य मंत्र का जप करना चाहिए। सूर्य के लिए गेहूं, तांबा, रुबी, लाल वस्त्र, लाल फूल, चन्दन की लकडी, केसर आदि दान किये जा सकते है। सृष्टि में सबसे पहले सूर्यस्वरूप प्रकट हुए इसलिए इनका नाम आदित्य पड़ा। सूर्य का एक अन्य नाम सविता भी है। इन्हें दिनकर, रवि, आदित्य, भास्कर इत्यादि नाम से भी संबोधित किया जाता है।

सूर्य मंत्र

* मंत्र 'ॐ घृणि सूर्याय नम:' है।

सूर्य का वैदिक मंत्र

"ऊँ आसत्येनरजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतंच ।

हिरण्येन सविता रथेनादेवी यति भुवना विपश्यत ।।"

सूर्य गायत्री मंत्र

ऊँ आदित्याय विदमहे दिवाकराय धीमहि तन्न: सूर्य: प्रचोदयात।

सूर्य बीज मंत्र

ऊँ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: ऊँ भूभुर्व: स्व: ऊँ आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतम्मर्तंच। हिण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन ऊँ स्व: भुव: भू: ऊँ स: ह्रौं ह्रीं ह्रां ऊँ सूर्याय नम: ॥

सूर्य जप मंत्र

ऊँ ह्राँ ह्रीँ ह्रौँ स: सूर्याय नम:

सूर्य नवग्रह मंत्र

ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च।
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ।।


सूर्य 

चंद्रमा 

मंगल

बुध

गुरु 

शुक्र 

शनि 

राहू

केतु

 

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