हिंदू धर्म के अनुसार गुरु से बड़ा कोई नहीं होता। स्वंय ईश्वर भी गुरु को श्रेष्ठ बतलाते हैं। गुरु का स्थान दुनिया में सर्वोच्च है। हिंदू पौराणिक मान्यताओं के के अनुसार वैदिक देवता बृहस्पति सभी देवताओं के गुरु है। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, वे देवताओं के गुरु हैं और दानवों के गुरु शुक्राचार्य के कट्टर विरोधी हैं। ये बृहस्पतिवार/गुरुवार के स्वामी माने जाते हैं। वो नवग्रहों के भी गुरु कहे जाते हैं। बृहस्पति को बृहत्काय,शांत,जितेन्द्रिय,बुद्धिमान,विद्वान मधुर वाणी से युक्त,नीति कुशल,वेदों के ज्ञाता गुणवान,रूपवान,एवम निर्मल अंतःकरण के कहा गया है| बृहस्पति सत्व गुणी हैं और ज्ञान और शिक्षण का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह धनु और मीन राशियों का स्वामी है|यह कर्क राशि में उच्च का तथा मकर में नीच का माना जाता है| धनु इसकी मूल त्रिकोण राशि भी है| बृहस्पति अपने स्थान से पांचवें ,सातवें और नवें स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखता है और इसकी दृष्टि को परम शुभकारक कहा गया है| जनम कुंडली में गुरु दूसरे ,पांचवें ,नवें ,दसवें और ग्यारहवें भाव का कारक होता है| गुरु की सूर्य,चन्द्र,मंगल से मैत्री,शनि से समता और बुध व शुक्र से शत्रुता है| यह स्व,मूल त्रिकोण व उच्च,मित्र राशि –नवांश में गुरूवार में ,वर्गोत्तम नवमांश में,उत्तरायण में ,दिन और रात के मध्य में,जन्मकुंडली के केन्द्र विशेषकर लग्न में बलवान व शुभकारक होता है| बृहस्पति को गुरु भी कहा जाता हैI बृहस्पति ग्रहों में सबसे बड़ा ग्रह है I यह पीले रंग का प्रतिनिधित्व करता हैI सभी भारद्वाज ब्राह्मण बृहस्पति के वंशज माने गए हैं। हिंदू ज्योतिष में गुरु धनु (धनुष) और मीना (मीन) पर शासन करते हैं, वह करका (कैंसर) और मकर (मकर) में उनके पतन में ऊंचे हैं। ज्यादातर ब्रितस्पति किसी भी ग्रह के लिए फायदेमंद है। सूर्य, चंद्रमा और मंगल को बृहस्पति के लिए अनुकूल माना जाता है, बुध के प्रति शत्रुतापूर्ण और शनि की ओर तटस्थ माना जाता है।
बृहस्पति ग्रह

बृहस्पति की उत्पति एवं स्वरुप

पुराणों के अनुसार ब्रह्मा जी के मानस पुत्र अंगिरा ऋषि का विवाह स्मृति से हुआ जिनसे सिनीवाली ,कुहू,राका ,अनुमति नाम कि कन्याएं एवम उतथ्य व जीव नामक पुत्र हुए |जीव बचपन से ही शांत एवम जितेन्द्रिय प्रकृति के थे| वे समस्त शास्त्रों तथा नीति के ज्ञाता हुए|अंगिरानंदन जीव ने प्रभास क्षेत्र में शिवलिंग कि स्थापना कि तथा शिव को प्रसन्न करने के लिए घोर तप किया| महादेव ने उनकी आराधना एवम तपस्या से प्रसन्न हो कर उन्हें साक्षात दर्शन दिए और कहा कि तुमने बृहत तप किया है अतः तुम बृहस्पति नाम से प्रसिद्ध हो कर देवताओं के गुरु बनों और उनका धर्म व नीति के अनुसार मार्गदर्शन करो|” इस प्रकार महादेव ने बृहस्पति को देवगुरु पद और नवग्रह मंडल में स्थान प्रदान किया| तभी से जीव, बृहस्पति और गुरु के नाम से विख्यात हुए| देव गुरु बृहस्पति को पीत रंग बेहद पंसद है। वे पीत वर्ण के हैं। उनके सिर पर स्वर्ण मुकुट व गले में सुंदर माला सुशोभित है। वे पीले वस्त्र धारण करते है और कमल के आसन पर विराजमान रहते हैं। उनके हाथों में क्रमश: दंड, रुद्राक्ष की माला, पात्र व वरमुद्रा सुशोभित रहती है। बृहस्पति देव देखने में अत्यन्त सुंदर हैं। इनका आवास स्वर्ण निर्मित है। यह विश्व के लिए वरणीय है। वे जिस भक्त पर प्रसन्न होते है, उसे बुद्धि-बल और धन-धान्य से सम्पन्न कर देते हैं। उसे सन्मार्ग पर चलाते हैं और विपत्ति आने पर उसकी रक्षा भी करते हैं। शरणागतवत्सलता इनमें कूट-कूट कर भरी है। इनका वाहन रथ है, जो सोने का बना है और अत्यन्त सुख साधनों से युक्त और सूर्य के समान ही भास्वर है। इसमें वायु के समान वेग वाले आठ घोड़े जुते हुए हैं। इनका सुवर्ण निर्मित दंड भी है। जिसका उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। देवगुरु की पहली पत्नी का नाम शुभा और दूसरी पत्नी का नाम तारा है। शुभा से सात कन्याएं उत्पन्न हुई हैं, जो भानुमति, राका, अर्चिष्मती, महामती, महिष्मती, सिनीवाली और हविष्मती हैं। उनकी पत्नी तारा के सात पुत्र और एक कन्या है। उनकी तीसरी पत्नी ममता से भरद्बाज औश्र कचन नाम के दो पुत्र हुए हैं। बृहस्पति के अधिदेवता इंद्र और प्रत्यधिदेवता ब्रह्मा हैं। पुराणों के अनुसार बृहस्पति पीत वर्ण के ,चतुर्भुज ,रुद्राक्ष की माला – कमंडल व वरमुद्रा धारण करने वाले हैं|

बृहस्पति का जीवन पर असर

वैदिक ज्योतिष में गुरु के तत्व को ईथर या आकाश तट्टा के रूप में माना जाता है। इस प्रकार यह किसी व्यक्ति के जीवन में विशालता, विकास और विस्तार को इंगित करता है। बृहस्पति भी कर्म, धर्म, दर्शन, ज्ञान और संतान से संबंधित मुद्दों को संतुलित करता है। शिक्षा, शिक्षण और ज्ञान के वितरण से संबंधित मामलों का विश्लेषण किसी व्यक्ति के जन्म चार्ट में बृहस्पति की स्थिति का अध्ययन करके किया जाता है। बृहस्पति के साथ मनुष्य अपने कुंडली में हावी होने के कारण वसा बढ़ सकते हैं क्योंकि जीवन प्रगति करता है और उनके साम्राज्य और समृद्धि बढ़ जाती है। बृहस्पति पैनक्रिया और पेट को प्रभावित करता है इस प्रकार मधुमेह सीधे बृहस्पति से संबंधित होता है। बृहस्पति की पूजा या प्राप्ति पापों को दूर करने में मदद करती है। बृहस्पति पुणारवसु, विशाखा और पुरा भद्रपद नक्षत्रों या चंद्र मकानों का स्वामी है। जिसका बृहस्पति बलवान होता है उसका परिवार समाज एवं हर क्षेत्र में प्रभाव रहता है। बृहस्पति बलवान होने पर, शत्रु भी सामना होते ही ठंडा हो जाता है। बृहस्पति प्रधान व्यक्ति को सामने देखकर हमारे हाथ अपने आप उन्हें नमस्कार करने के लिए उठ जाते हैं। बृहस्पति व्यक्ति कभी बोलने की शुरूआत पहले नही करते यह उसकी पहचान है। निर्बल बृहस्पति व्यक्ति का समाज एवं परिवार में प्रभाव नही रहता। ज्योतिष विद्या बृहस्पति की प्रतीक है। न्यायाधीश, वकील, मजिस्ट्रेट, ज्योतिषी, ब्राम्हण, बृहस्पति, धर्मगुरू, शिक्षक, सन्यासी, पिता, चाचा, नाटा व्यक्ति इत्यादि बृहस्पति के प्रतीक हैं तो ज्योतिष, कर्मकांड, शेयर बाजार, शिक्षा, शिक्षा से संबंधित किताबों का व्यवसाय, धार्मिक किताबों और चित्रों का व्यवसाय, वकालत, शिक्षा संस्थाओं का संचालन इत्यादि बृहस्पति के प्रतीक रूप व्यवसाय है। इनमें सफलता प्राप्त करने के लिए बृहस्पति प्रतीकों का उपयोग करना चाहिए। बैंक मैनेजर,कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर आदि बृहस्पति के प्रतीक है। फाइनेंस कंपनी, अर्थ मंत्रालय भी बृहस्पति के प्रतीक है। चना दाल, शक्कर, खांड, हल्दी, घी, नमक, बृहस्पति की प्रतीक रूप चीजें है। संस्कृत बृहस्पति की प्रतीक भाषा है। ईशान्य या उत्तर बृहस्पति की दिशाएं है। शरीर में जांघ बृहस्पति का प्रतीक है। मंदिर मस्जिद, गुरूद्वारा, चर्च बृहस्पति के प्रतीक है। बृहस्पति का रंग पीला है। घर की तिजोरी में बृहस्पति का वास है। बृहस्पति अर्थतंत्र का कारक है। ज्योतिषशास्त्र खजाने को बृहस्पति का प्रतीक मानता है। घर में रखे धर्मग्रंथ देखने से भी व्यक्ति के बृहस्पति का अंदाजा मिल जाता है। बृहस्पति के अशुभ होने पर शरीर में कफ, धातु एवं चर्बी (मोटापा) की वृद्धि होती है। अशुभ गुरु मधुमेह, गुर्दे का रोग, सूजन, मूर्च्छा, हर्निया, कान के रोग, स्मृति विकार, जिगर के रोग, पीलिया, फेफड़ों के रोग, मस्तिष्क की रक्तवाहिनियों के रोग, हृदय को धक्का पहुंचना, पेट खराब करता है। मोटापे के बहुत सारे कारणों में से एक कारण आपकी कुंडली में बृहस्पति ग्रह का गलत जगह पर बैठना भी हो सकता है

बृहस्पति शांति के उपाय

बृहस्पति ग्रह की शांति के लिए गुरु बृहस्पति की प्रतिमा या फोटो को पीले वस्त्र पर विराजित करें। इसके बाद पंचोपचार से पूजा करें। पूजन में केसरिया चंदन, पीले चावल, पीले फूल व भोग में पीले पकवान या फल अर्पित करें और सच्चे मन से प्रभु की आ गुरु से जुड़ी पीली वस्तुओं का दान करें। पीली वस्तु जैसे सोना, हल्दी, चने की दाल, आम (फल), केला आदि। रती करें। बृहस्पति से संबंधित रत्न का दान करना भी श्रेष्ठ होता है। दान करते समय आपको ध्यान रखना चाहिए कि दिन बृहस्पतिवार हो और सुबह का समय हो। दान किसी ब्राह्मण, गुरू अथवा पुरोहित को देना विशेष फलदायक होता है। बृहस्पतिवार के दिन व्रत रखना चाहिए। कमज़ोर बृहस्पति वाले व्यक्तियों को केला और पीले रंग की मिठाईयां गरीबों, पक्षियों विशेषकर कौओं को देना चाहिए। ब्राह्मणों एवं गरीबों को दही चावल खिलाना चाहिए। पीपल के जड़ को जल से सींचना चाहिए। गुरू, पुरोहित और शिक्षकों में बृहस्पति का निवास होता है अत: इनकी सेवा से भी बृहस्पति के दुष्प्रभाव में कमी आती है। ऐसे व्यक्ति को अपने माता-पिता, गुरुजन एवं अन्य पूजनीय व्यक्तियों के प्रति आदर भाव रखना चाहिए तथा महत्त्वपूर्ण समयों पर इनका चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेना चाहिए।

बृहस्पति से जुड़े त्तव हैं:

रंग: पीला
धातु: सोना
रत्न: पीला टॉपज और पीली नीलमणि
मौसम: शीतकालीन (बर्फ)
दिशा: उत्तर-पूर्व
तत्व: ईथर या अंतरिक्ष

बृहस्पति के दुसरे नाम

गुरु,बृहस्पति, देव-गुरु - देवताओं के गुरु, गणपति - समूह के नेता [ग्रहों], क्रूरा

बृहस्पति मंत्र

ऊॅ बृं बृहस्पये नम:

बृहस्पति नवग्रह मंत्र

'देववाना चा रशीनाम चा गुरुम कांचन सनीभाम
बुद्धेशुतम त्रिलोशम तम नामामी बृहस्पतिम '

बृहस्पति की शांति के लिए वैदिक मंत्र

ऊॅँ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्बिभाति क्रतुमज्जनेषु।
यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धोहि चित्रम्।।

बृहस्पति की शांति के लिए पौराणिक मंत्र

देवानां च ऋषीणां च गुरुं कांचनसंनिभम्।
बुद्धिभूतं त्रिलोकशं तं नमामि बहस्पतिम्।।

बीज मंत्र

ऊॅ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नम:

बृहस्पति गायत्री मंत्र

ॐ अंगिरोजाताय विद्महे,
वाचस्पते धीमहि,
तन्नो गुरु: प्रचोदयात।।

बृहस्पति स्तुति

जयति जयति जय श्री गुरू देवा। करौं सदा तुम्हारो प्रभु सेवा।
देवाचार्य देव गुरू ज्ञानी। इन्द्र पुरोहित विद्या दानी।।
वाचस्पति वागीश उदारा। जीव बृहस्पति नाम तुम्हारा।।
विद्या सिन्धु अंगिरा नामा। करहु सकल विधि पूरण कामा।।

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