हिन्दू मान्यताओं एवं शास्त्रों अनुसार राहु का व्यक्ति के जीवन पर बहुत गहरा असर पड़ता है। ज्योतिष शास्त्र में बताए गए नौ ग्रहों में से एक राहु है। जो सबसे प्रबल माना जाता है। चूंकी राहु कोई निश्चित ग्रह नहीं है यह केवल एक छाया है जो सूर्य एवं चंद्र पर अपना असर डालती है। राहु को अन्य ग्रहों की तरह देवताओं की उपाधी नहीं दी गई है क्योंकि वो एक असुर है जो देवताओं का रुप धारण कर अमृतपान में शामिल हुआ था और अमृत ग्रहण किया था। भगवान विष्णु के क्रोध स्वरुप उसके शरीर के दो टुकड़े हो गए जो राहु और केतु के नाम से विभक्त हैं। राहु के नाम से कोई दिन भी सुनिश्चित नहीं है किन्तु प्रत्येक दिन में राहु काल की घड़ी आती है जो 25 मिनट की होती है यह घड़ी अशुभ मानी जाती है जिसमें कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। मनुष्यों की कुंडली में भी राहु की स्थिति का गहरा प्रभाव पड़ता है। खगोलिय पिंड में राहु को नोड माना जाता है राहु की स्थिति भारतीय ज्योतिष के अनुसार राहु और केतु सूर्य एवं चंद्र के परिक्रमा पथों के आपस में काटने के दो बिन्दुओं के द्योतक हैं जो पृथ्वी के सापेक्ष एक दुसरे के उल्टी दिशा में 180 डिग्री पर स्थित रहते हैं। चुकी ये ग्रह कोई खगोलीय पिंड नहीं हैं, इन्हें छाया ग्रह कहा जाता है। सूर्य और चंद्र के ब्रह्मांड में अपने-अपने पथ पर चलने के अनुसार ही राहु और केतु की स्थिति भी बदलती रहती है। राहु पूर्व जन्मों के कर्म बंधन को दर्शाता है। राहु जिस ग्रह के साथ युति में होता है वैसा ही कर्मबंधन अर्थात दोष होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार राहु शीर्ष है। शरीर की अन्य इंद्रियों के अभाव के चलते इसमें अच्छे-बुरे का ज्ञान नहीं होता है, इसलिए इसे यह धर्म के विपरीत कार्य करता है। आत्मा व परमात्मा के विषय में इसकी रूचि नहीं है, इसके उलट यह माया का दास है। सामान्य रूप से लोगों में यह मान्यता है कि राहु हमेशा ही जातक को खराब फल देता है। यह वास्तव में सटीक बिंदु है जहां चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के साथ संरेखण में है। सामान्य राशि चक्र देशांतर में यही कारण है कि राहु को हिंदू ज्योतिष में राक्षस का मुखिया माना जाता है। हिन्दू ज्योतिष के अनुसार असुर स्वरभानु का कटा हुआ सिर है, जो ग्रहण के समय सूर्य और चंद्रमा का ग्रहण करता है। इसे कलात्मक रूप में बिना धड़ वाले सर्प के रूप में दिखाया जाता है, जो रथ पर आरूढ़ है और रथ आठ श्याम वर्णी घोड़ों द्वारा खींचा जा रहा है। राहु का अपना एक काल होता है।
राहु

राहु की उत्पति

राहु की उत्पति के सबंध में पौराणिक कथा प्रचलित है। धार्मिक दृष्टि से राहु ग्रह का बडा़ महत्व है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब समुद्र मंथन से अमृत का कलश निकला तो अमृतपान के लिए देवताओं और असुरों के बीच झगड़ा होने लगा। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया और देवताओं और असुरों की दो अलग-अलग पंक्तियों में बिठाया। असुर मोहिनी की सुंदर काया के मोह में आकर सबकुछ भूल गए और उधर, मोहिनी चालाकी से देवताओं को अमृतपान कराने लगी। इस बीच स्वर्भानु नामक असुर वेश बदलकर देवताओं की पंक्ति में आकर बैठ गया और अमृत के घूँट पीने लगा। तभी सूर्य एवं चंद्रमा ने भगवान विष्णु को उसके राक्षस होने के बारे में बताया। इस पर विष्णु जी ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया और वह दो भागों में बँट गया। परंतु तब तक उसका मुख अमृतपान कर चुका था। उसका सिर अमर हो चुका था। यही सिर राहु और धड़ केतु ग्रह बना। सूर्य और चंद्रमा के बताए जाने के कारण राहु उनका शत्रु बन गया है। ज्योतिष में ये दो भाग राहु (सिर) और केतु (धड़) नामक ग्रह से जाने जाते हैं।इसी कारण राहु और केतु इनसे द्वेष रखता है। इसी द्वेष के चलते वह सूर्य और चंद्र को ग्रहण करने का प्रयास करता है। ग्रहण करने के पश्चात सूर्य राहु से और चंद्र केतु से,उसके कटे गले से निकल आते हैं और मुक्त हो जाते हैं।

राहु का स्वरुप

राहु को सांप का मुख कहा गया है। वे सिर पर मुकुट पहने, गले में माला तथा शरीर पर काले रंग के वस्त्र धारण करते हैं। इनके हाथों में तलवार, ढाल, त्रिशूल, और वरमुद्रा होती है। राहु सिंह के आसन पर विराजमान रहते हैं। मत्सयपुराण के अनुसार राहु का रथ अंधकार रुप है। इसे कवच आदि से सजाए हुए काले रंग के आठ घोड़े खींचते हैं। राहु की माता काना सिंहिका है। वो विप्रचिति की पत्नी तथा हिरण्यकशिपु की पुत्री थी। माता के नाम से राहु को सैंहिकेय भी कहा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार राहु का मुख भंयकर है।

राहु का जीवन पर असर

हिन्दू ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार राहु व्यक्ति के जीवन में बहुत प्रभाव डालता है। इसे प्रायः अशुभ कर्मों से जोड़ कर ही देखा जाता है। ज्योतिषी मानते हैं कि राहु शूद्र, चोरों, चुड़ैल, जादूगर, जहर, सांप, जेल, कब्रिस्तान, जासूस, अपराधियों, आतंकवादियों आदि को दर्शाता है। राहु कन्या राशि में बलवान होता है। राहु की खुद की कोई राशि नहीं होती, इसलिए वह जिस भी स्थान में होता है उस स्थान के अधिपति जैसा ही फल देता है। यदि राहु अकेला ही केंद्र या त्रिकोण में बैठा हो और वह केंद्र या त्रिकोण के स्वामी के साथ युति करता है तो योगकारक बनता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार राहु 3, 6 व 11वें भाव में बलवान बनता है। राहु उन्हीं व्यक्तियों को अपना निशाना बनाता है जो शुभ कर्म नही करते। माता-पिता एवं गुरु का अपमान करने वालों को राहु परेशान करते है। तांत्रिक कर्म करने वाले एवं उनमें रुचि रखने वाले लोग राहु के क्रोध का शिकार बनते हैं। शराब पीना, पराई स्त्री पर नजर रखना, झूठ बोलना, काल्पनिक बातें करना, कटु वचन बोलना, ब्याज का धंधा करना, जुआ खेलना इत्यादि कर्म करने वाले व्यक्ति राहु की कू-दृष्टि का शिकार बनाते हैं। राहु के अशुभ होने पर कई तरह की परेशानियां उत्पन्न हो जाती है। जीवन में शत्रुओं की बढ़ोंतरी हो जाती है। घर-परिवार में लड़ाई-झगड़ा बढ़ जाता है। तालमेल की कमी हो जाती है। वाहन दुर्घटना, शारिरिक एवं मानसिक, आर्थिक नुकसान होता है। व्यक्ति को कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने पड़ जाते हैं। मानसिक संतुलन खराब हो जाता है। पागलखाने तक जाने की नौबत आ जाती है। व्यक्ति की तरक्की रुक जाती है। व्यक्ति भोग-विलास में लिप्त हो जाता है। जिससे कई रोग उत्पन्न हो जाते है। बवासीर, उदर रोग, मानसिक रोग, बाल झड़ना, नाखुन टूट कर गिरना, सिर दर्द इत्यादि बढ़ जाता है। कई बार तो व्यक्ति की आकस्मिक मृत्यु भी हो जाती है।
वहीं राहु के शुभ होने पर व्यक्ति धनवान बन जाता है। ज्योतिष के अनुसार जिस व्यक्ति की जन्म कुंडली में स्थित लग्न भाव में राहु होता है वह व्यक्ति सुंदर और आकृषक व्यक्तित्व वाला होता है। व्यक्ति साहसिक कार्यों से पीछे नहीं हटता है। लग्न का राहु व्यक्ति को समाज में प्रभावशाली बनाता है। हालाँकि इसके प्रभाव बहुत हद तक लग्न में स्थित राशि पर निर्भर करता है। हालाँकि ज्योतिष के अनुसार ऐसा माना जाता है कि लग्न का राहु व्यक्ति के वैवाहिक जीवन के लिए अनुकूल नहीं होता है। ज्योतिष में राहु ग्रह को लेकर ऐसा कहा जाता है कि यदि राहु किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में शुभ हो तो वह उसकी किस्मत चमका सकता है। कुंडली में मजबूत राहु व्यक्ति को प्रखर बुद्धि का बनाता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति अपने धर्म का पालन करता है और समाज में उसे मान-सम्मान और यश प्राप्त होती है। व्यक्ति दौलतमंद होगा। कल्पना शक्ति तेज होगी। रहस्यमय या धार्मिक बातों में रुचि लेगा। राहु के अच्छा होने से व्यक्ति में श्रेष्ठ साहित्यकार, दार्शनिक, वैज्ञानिक या फिर रहस्यमय विद्याओं के गुणों का विकास होता है। इसका दूसरा पक्ष यह कि इसके अच्छा होने से राजयोग भी फलित हो सकता है। आमतौर पर पुलिस या प्रशासन में इसके लोग ज्यादा होते हैं।

राहु शांति उपाय

राहु को शांत करने एवं उसका शुभ फल प्राप्त करने के लिए भगवान हनुमान या माता सरस्वती की पूजा करनी चाहिए। प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करने से भी राहु कमजोर पड़ता है। ससुराल पक्ष से अच्छे संबध रखने चाहिए। गोमेद धारण करना चाहिए। गरीबों को दान-पुण्य करना चाहिए। हनुमान मंदिर में दान देना चाहिए। बाल बांधकर रखने चाहिए। तामसी चीजों से दूर रहना चाहिए। पराई स्त्री, पाराए धन की तरफ आकर्षित नहीं होना चाहिए। राहु की दशा होने पर कुष्ट से पीड़ित व्यक्ति की सहायता करनी चाहिए। गरीब व्यक्ति की कन्या की शादी करनी चाहिए। तांबे के बर्तन में गुड, गेहूं भरकर बहते जल में प्रवाहित करें। इससे भी राहु ग्रह थोड़ा शांत रहता है। राहु के प्रकोप से बचने के लिए भोजन में लहसुन, प्याज और मसूर न लें। इससे भी राहु ग्रह के दोष में अंतर पड़ता है।

राहु से जुड़े तत्व

ईष्ट देवीः सरस्वती
रंगः नीला, काला
नक्षत्रः आद्रा, स्वाती, शतभिषा
पशुः कांटेदार जंगली चूहास हाथी, बिल्ली , सांप
वस्तुः नीलम, गोमेद, कोयला
दिशाः नैऋत्य कोण
गुणः तम
धातुः सीसा
रत्न - गोमेद

राहु का वैदिक मंत्र

ॐ कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृध: सखा। कया शचिष्ठया वृता।।

राहु का तांत्रिक मंत्र

ॐ रां राहवे नमः

राहु का बीज मंत्र

ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः

राहु मंत्र

"ओम धूम राम रहाव नमः"

राहु का नवग्रह मंत्र

"अर्धाकायम महावीरम चन्द्रद्थ्य विमार्डनम
सिंहिगढ़भा संभूथ थम राहम प्राणायाम्यम "

राहु गायत्री मंत्र

ॐ नाकाध्वजाय विद्महे पद्माहस्ताय धीमहि !
तन्नो राहू: प्रचोदयात !
ॐ शिरोरूपाय विद्महे अमृतेशाय धीमहि !
तन्न: राहू: प्रचोदयात !

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