भारत के प्रमुख धर्मों में से एक ईसाई धर्म भी है। जिसका अनुसरण भारत सहित पूरे विश्व में लोग करते हैं। ईसाई धर्म के संस्थापक जीजस क्राइस्ट यानि ईसा मसीह कहे जाते हैं जिन्हें यीशु भी कहा जाता है। ईसाई धर्म के अनुसार, यीशु मसीह एक हिब्रू प्रचारक थे जिन्होंने ईसाई धर्म की नींव रखी। ईसाई धर्म का अनुसरण करने वाले लोग यीशु को अपने भगवान के रुप में पूजते हैं। यीशु का भगवान के बेटे के रुप में माना जाता है। ईसाई मान्यता है कि प्रभु यीशु मसीह मनुष्य के रूप में जन्म लेकर पृथ्वी पर उस धर्म की स्थापना करने के लिए आए जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़कर स्वर्ग के राज के लिए तैयार करता है। उन्हें ऐसे धर्म की स्थापना करने के लिए कई परीक्षाओं से गुजरना पड़ा जो एक-दूसरे को प्यार करने, माफ करने, शत्रुओं को, पड़ोसियों को भी प्यार करने की प्रेरणा देता है। इसके लिए उन्होंने अपना रक्त बहाया, यहां तक कि धर्म और न्याय की स्थापना करने तथा मनुष्य को पाप की दलदल से निकालने के लिए उन्हें दर्दनाक सलीबी मौत झेलनी पड़ी। ईसा का व्यक्तित्व प्रभावशाली होने के साथ ही अत्यंत आकर्षक था। ईसा 30 साल की उम्र तक मज़दूर का जीवन बिताने के बाद धर्मोपदेशक बने थे, अत: वह अपने को जनसाधारण के अत्यंत निकट पाते थे। जनता भी उनकी नम्रता और मिलनसारिता से आकर्षित होकर उनको घेरे रहती थी, यहाँ तक कि उनको कभी-कभी भोजन करने तक की फुरसत नहीं मिलती थी। यही कारण है कि ईसाई धर्म को मानने वालों की संख्या विश्व भर में बहुत अधिक है। ईसा मसीह से जुड़े कई त्योहार ईसाई धर्म में मनाए जाते हैं। ईसा के जन्म से संबधित क्रिसमस का त्योहार पूरे विश्व में जोर-शोर से मनाया जाता है। वहीं ईसा मसीह की मृत्यु से संबधित गुड फ्राइडे एवं ईस्टर के त्योहार को भी ईसाई धर्म में पूर्ण रुप से मनाया जाता है। ईसा मसीह ने अपने ज्ञान के जरिए मनुष्यों को जीवन का महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने अपनी मृत्यु के लिए जिम्मेदार लोगों के लिए भी क्षमा प्रार्थना की। यीशु ने मनुष्य के ह्रदय में प्रेम एंव एकता का सचांर किया। ईसाई धर्म को पूरे विश्व में व्यापक रुप से फैलाने का श्रेय भी जीजस क्राइस्ट यानि ईसा मसीह को जाता है।
जीसस क्राइस्ट

यीशु का जीवन

बाइबिल के अनुसार यीशु की माता का नाम मरियम था। माता मरियम गलीलिया प्रांत के नाज़रेथ गाँव की रहने वाली थीं। वो बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति की थीं। उनकी सगाई दाऊद के राजवंशी यूसुफ़ नामक बढ़ई से हुई थी। विवाह के पहले ही वह कुँवारी रहते हुए ही ईश्वरीय प्रभाव से गर्भवती हो गईं। ईश्वर की ओर से संकेत पाकर यूसुफ़ ने उन्हें पत्नीस्वरूप ग्रहण किया। विवाह संपन्न होने के बाद यूसुफ़ गलीलिया छोड़कर यहूदिया प्रांत के बेथलेहेम नामक नगरी में जाकर रहने लगे, वहाँ ईसा का जन्म हुआ। वहां के राजा हेरोद बहुत ही अत्याचारी था। जब यीशु का जन्म हुआ तो भविष्यवाणी करने वालों ने कहा कि आसमान का तारा यह संकेत कर रहा है कि धर्म का रक्षक आ गया है। राजा ने अपने अनुयियों को यीशु की खोजने के लिए भेजा। चमकते तारे को देखते हुए अनुयायिय़ों ने यीशु को ढूंढा और उनके तेज को देखते हुए उन्हें प्रणाम करके चले गए। जब राजा को पता चला कि यीशु जिंदा है तो उसने उनकी उम्र के सभी बच्चों को मारवा दिया। यीशु को राजा हेरोद के अत्याचार से बचाने के लिए यूसुफ़ मिस्र चले गए। हेरोद 4 ई.पू. में चल बसे अत: ईसा का जन्म संभवत: 6 ई.पू. में हुआ था। हेरोद के मरण के बाद यूसुफ़ लौटकर नाज़रेथ गाँव में बस गए। ईसा जब बारह वर्ष के हुए, तो यरुशलम में दो दिन रुककर पुजारियों से ज्ञान चर्चा करते रहे। सत्य को खोजने की वृत्ति उनमें बचपन से ही थी। 30 वर्ष की उम्र में उन्होंने यूहन्ना (जॉन) से दीक्षा ली। उन्होनें 40 दिन तक उपवास किया। दीक्षा के बाद वे लोगों को शिक्षा देने लगे। कुछ समय बाद ईसा ने यूसुफ़ का पेशा सीख लिया और लगभग 30 साल की उम्र तक उसी गाँव में रहकर वे बढ़ई का काम करते रहे।

यीशु का धर्म प्रचार एवं मृत्यु

जब यीशु ईसाई धर्म और ज्ञान का प्रचार कर रहे थे तब यहूदी जाति रोमन सम्राट् तिबेरियस के अधीन थी तथा यहूदिया प्रांत में पिलातस नामक रोमन राज्यपाल शासन करता था। ईसा यहूदियों के पर्व मनाने के लिए राजधानी जेरुसलेम के मंदिर में आया तो करते थे, किंतु वह यहूदी धर्म को अपूर्ण समझते थे। वह शास्त्रियों द्वारा प्रतिपादित जटिल कर्मकांड का विरोध करते थे और नैतिकता को ही धर्म का आधार मानकर उसी को अपेक्षाकृत अधिक महत्व देते थे। यह राजनीतिक परतंत्रता यहूदियों को बहुत अखरती थी। वे अपने धर्मग्रंथ में वर्णित मसीह की राह देख रहे थे क्योंकि उन्हें आशा थी कि वह मसीह उनको रोमियों की ग़ुलामी से मुक्त करेंगे। जब सन् 27 ई. में योहन बपतिस्ता यह संदेश लेकर बपतिस्मा देने लगे कि 'पछतावा करो, स्वर्ग का राज्य निकट है', तो यहूदियों में उत्साह की लहर दौड़ गई और वे आशा करने लगे कि मसीह शीघ्र ही आने वाला है। उस समय ईसा ने अपने औजार छोड़ दिए तथा योहन से बपतिस्मा ग्रहण करने के बाद अपने शिष्यों को वह चुनने लगे और उनके साथ समस्त देश का परिभ्रमण करते हुए उपदेश देने लगे। यह सर्वविदित था कि ईसा बचपन से अपना सारा जीवन नाज़रेथ में बिताकर बढ़ई का ही काम करते रहे। अत: उनके अचानक धर्मोपदेशक बनने पर लोगों को आश्चर्य हुआ। सब ने अनुभव किया कि ईसा अत्यंत सरल भाषा तथा प्राय: दैनिक जीवन के दृष्टांतों का सहारा लेकर अधिकारपूर्वक मौलिक धार्मिक शिक्षा दे रहे हैं। जनता इस शिक्षा पर मुग्ध हुई तथा रोगियों को ठीक करना, मुर्दो को जलाना आदि, उनके द्वारा किए गये चमत्कार देखकर जनता ने ईसा को नबी के रूप में स्वीकार किया। तब ईसा ने धीरे-धीरे यह प्रकट किया कि मैं ही मसीह, ईश्वर का पुत्र हूँ, स्वर्ग का राज्य स्थापित करने स्वर्ग से उतरा हूँ। यहूदी अपने को ईश्वर की चुनी हुई प्रजा समझते थे तथा बाइबिल में जो मसीह और स्वर्ग के राज्य की प्रतिज्ञा है उसका एक भौतिक एवं राष्ट्रीय अर्थ लगाते थे। ईसा ने उन्हें समझाया कि मसीह यहूदी जाति का नेता बनकर उसे रोमियों की ग़ुलामी से मुक्त करने नहीं प्रत्युत सब मनुष्यों को पाप से मुक्त करने आए हैं। स्वर्ग के राज्य पर यहूदियों का एकाधिकार नहीं है, मानव मात्र इसका सदस्य बन सकता है। वास्तव में स्वर्ग का राज्य ईसा पर विश्वास करने वालों का समुदाय है जो दुनिया के अंत तक उनके संदेश का प्रचार करता रहेगा। अपनी मृत्यु के बाद उस समुदाय के संगठन और शासन के लिए ईसा ने बारह शिष्यों को चुनकर उन्हें विशेष शिक्षण और अधिकार प्रदान किए। ईसा के प्रति यहूदी नेताओं में विरोध उत्पन्न हुआ। वे समझने लगे कि ईसा स्वर्ग का जो राज्य स्थापित करना चाहते हैं वह एक नया धर्म है जो यरुशलम के मंदिर से कोई संबंध नहीं रख सकता। अंततोगत्वा उन्होंने (संभवत: सन् 30 ई.में) ईसा को गिरफ़्तार कर लिया। यहूदियों की महासभा ने उनको इसलिए प्राणदंड दिया कि वह मसीह तथा ईश्वर का पुत्र होने का दावा करते हैं। रोमन राज्यपाल ने इस दंडाज्ञा का समर्थन किया और ईसा को क्रूस पर मरने का आदेश दिया। विरोधियों ने यीशु के हाथ पैर बांध कर उन्हें पकड़कर क्रूस पर लटका दिया। ईसा ने क्रूस पर लटकते समय ईश्वर से प्रार्थना की, 'हे प्रभु, क्रूस पर लटकाने वाले इन लोगों को क्षमा कर। वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। 6 घंटे तक लटकन के बाद ईसा की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद उनके अनुयायियों ने राज्यपाल की आज्ञा से उनको क्रूस से उतारकर दफ़ना दिया। दफ़न के तीसरे दिन ईसा की क़ब्र ख़ाली पाई गई, उसी दिन से, आस्थावानों का विश्वास है, वह पुर्नजीवित होकर अपने शिष्यों को दिखाई देने और उनके साथ वार्तालाप भी करने लगे। उस समय ईसा ने अपने शिष्यों को समस्त जातियों में जाकर अपने संदेश का प्रचार करने का आदेश दिया। पुनरुत्थान के 40 वें दिन ईसाई विश्वास के अनुसार, ईसा का स्वर्गारोहण हुआ।

ईसा के अनुसार धर्म का सार दो बातों में है-
1. मनुष्य का परमात्मा को अपना दयालु पिता समझकर समूचे हृदय से प्यार करना तथा उसी पर भरोसा रखना।
2. अन्य सभी मनुष्यों को भाई बहन मानकर किसी से भी बैर न रखना, अपने विरुद्ध किए हुए अपराध क्षमा करना तथा सच्चे हृदय से सबका कल्याण चाहना। जो यह भ्रातृप्रेम निबाहने में असमर्थ हो वह ईश्वरभक्त होने का दावा न करे, भगवद्भक्ति की कसौटी भ्रातृप्रेम ही है।

ईसा मसीह की शिक्षाएं

ईसा मसीह के प्रति ईसाई मान्यता है कि वह बच्चों को विशेष रूप से प्यार करते थे तथा उनको अपने पास बुला बुलाकर आशीर्वाद दिया करते थे। वह प्रकृति के सौंदर्य पर मुग्ध थे तथा अपने उपदेशों में पुष्पों, पक्षियों आदि का उपमान के रूप में प्राय: उल्लेख करते थे।: रोगियों को स्वास्थ्य प्रदान कर अपनी अलौकिक शक्ति को व्यक्त करते थे, ऐसा लोगों का विश्वास है। सहृदय और मिलनसार होते हुए भी वह नितांत अनासक्त और निर्लिप्त थे। आत्मसंयमी होते हुए भी उन्होंने कभी शरीर गलाने वाली घोर तपस्या नहीं की। वह पाप से घृणा करते थे, पापियों से नहीं। ईसा के दिल में सभी के लिए व्यापक रुप से प्रेम था। वो सभी को एक समान समझते थे उन्होंने कभी भी किसी के प्रति भेदभाव नहीं किया। यही कारण है कि ईसाई धर्म में यीशु को ही भगवान माना जाता है।

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