दुनिया में बहुत कम लोग होते हैं जो दूसरों के लिए जीते हैं। आज के युग में हर कोई केवल और केवल अपने बारे में सोचता है। केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए दूसरे को हानि पहुंचाने तक को तैयार रहता है। दूसरों का दर्द, उनका दुख, उनकी तकलीफ समझने वाले लोग इस दुनिया में बहुत ही कम होते हैं। हर किसी को केवल खुद से मतलब रहता है। जहां एक और समाज स्वार्थी बन कर दूसरों का जीवन भी कष्टकर कर रहा है वहीं इस धरती पर एक ऐसी महिला ने जन्म लिया जिसने अपना संपूर्ण जीवन एक पराए देश और पराए लोगों के जीवन में समर्पित कर दिया। वो महिला है मदर टेरेसा। मदर टेरेसा का नाम लेते ही हमारे मन में उनके प्रति सम्मान की भावना जागृत हो जाती है। मदर टेरेसा ने इस स्वार्थी समाज के सामने एक ऐसी छवि को प्रस्तुत किया जिसने मानवता को नया आयाम दिया। मदर टेरेसा का एक दूसरे देश और दूसरे लागों के प्रति अपार प्रेम एवं दया की भावना ने उन्हें महान बना दिया। जहां लोग एक देश में रहकर देशवासियों यहां तक की अपने घरवालों की देख-रेख नहीं करते वहीं मदर टेरेसा ने समाज के हर तबके की निस्वार्थ भाव से सेवा कर लोगों को प्रेम एवं मानवता का नया संदेश दिया। मदर टेरेसा के द्वारा दी गई सेवा के ही स्वरुप आज तक लोगों को ह्रदय में उनकी छवी विकसित है। समाज में रहकर समाज के लोगों की सेवा करना, दीन-दुखियों की मदद करना एवं रोगियों का इलाज करना ही मदर टेरेसा का परम धर्म है। जिस तरह एक मां अपने बच्चे की सेवा करती है उसकी देखभाल करती है उसी तरह मदर टेरेसा सभी लोगों को अपना बच्चा जान उनकी सेवा करती थी। मदर टेरेसा के द्वारा उपचार किए गए कई रोगियों को नया जीनवदान मिला है। मदर टेरेसा ने अपने प्यार और सहानाभूति के जरिए लोगों में जिंदगी जीने की नई उमंग एवं जीवन के सही अर्थ का संचार किया है। मदर टेरेसा का जन्म 27 अगस्त, 1910 को हुआ था। वो मूल रुप से यूगोस्लाविया की थी। किन्तु भारत में अन्य मिशनरियों के साथ मानवतावादी सेवाओं को प्रस्तुत करने के लिए वो यहां आई थीं और यहीं की होके रह गई थीं। जब देश ब्रिटिश दासता के गहरे दिनों का सामना कर रहा था उस समय। जब उन्होंने पहली बार 1929 में भारत में प्रवेश किया था और उस समय भारतीयों की दुखी स्थिति से इतनी ज्यादा चली गई कि उन्होंने बीमार और गरीबों की सेवा के लिए अपनी सारी ज़िंदगी समर्पित करने का फैसला किया। बाद में महिला ने अपनी कम सेवाओं से भारत के कई जरूरतमंद लोगों की मदद की और प्यार से हर किसी को मदर टेरेसा के रूप में संदर्भित किया गया। मदर टेरेसा को एंजेल ऑफ मर्सी के रूप में जाना जाता है। यही कारण है कि भारतवर्ष सहित पूरे विश्व में मदर टेरेसा को विश्व की मां के रुप में संबोधित किया जाता है। उन्हें मां की उपाधी से नवाजा गया है।
मदर टेरेसा

मदर टेरेसा का जीवन परिचय

मदर टेरेसा एक ऐसी महान आत्मा थीं जिनका ह्रदय संसार के तमाम दीन-दरिद्र, बीमार, असहाय और गरीबों के लिए धड़कता था और इसी कारण उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन उनके सेवा और भलाई में लगा दिया। उनका असली नाम ‘अगनेस गोंझा बोयाजिजू’ था। मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त, 1910 को स्कॉप्जे (अब मसेदोनिया में) में हुआ। उनके पिता निकोला बोयाजू एक साधारण व्यवसायी थे। अलबेनियन भाषा में गोंझा का अर्थ फूल की कली होता है। जब वह मात्र आठ साल की थीं तभी उनके पिता परलोक सिधार गए, जिसके बाद उनके लालन-पालन की सारी जिम्मेदारी उनकी माता द्राना बोयाजू के ऊपर आ गयी। वह पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं। उनके जन्म के समय उनकी बड़ी बहन की उम्र 7 साल और भाई की उम्र 2 साल थी, बाकी दो बच्चे बचपन में ही गुजर गए थे। वह एक सुन्दर, अध्ययनशील एवं परिश्रमी लड़की थीं। पढाई के साथ-साथ, गाना उन्हें बेहद पसंद था। वह और उनकी बहन पास के गिरजाघर में मुख्य गायिका थीं। ऐसा माना जाता है की जब वह मात्र बारह साल की थीं तभी उन्हें ये अनुभव हो गया था कि वो अपना सारा जीवन मानव सेवा में लगायेंगी और 18 साल की उम्र में उन्होंने ‘सिस्टर्स ऑफ़ लोरेटो’ में शामिल होने का फैसला ले लिया। तत्पश्चात वह आयरलैंड गयीं जहाँ उन्होंने अंग्रेजी भाषा सीखी। ताकि वो भारत में बच्चो को पढ़ा सकें। सिस्टर टेरेसा आयरलैंड से 6 जनवरी, 1929 को कोलकाता में ‘लोरेटो कॉन्वेंट’ पंहुचीं। वह एक अनुशासित शिक्षिका थीं और विद्यार्थी उनसे बहुत स्नेह करते थे। वर्ष 1944 में वह हेडमिस्ट्रेस बन गईं। उनका मन शिक्षण में पूरी तरह रम गया था पर उनके आस-पास फैली गरीबी, दरिद्रता और लाचारी उनके मन को बहुत अशांत करती थी। 1943 के अकाल में शहर में बड़ी संख्या में मौते हुईं और लोग गरीबी से बेहाल हो गए। 1946 के हिन्दू-मुस्लिम दंगों ने तो कोलकाता शहर की स्थिति और भयावह बना दी। कोलकाता के सेंट मैरीज हाईस्कूल में पढ़ाने के दौरान एक दिन कॉन्वेंट की दीवारों के बाहर फैली दरिद्रता देख वे विचलित हो गईं। वह पीड़ा उनसे बर्दाश्त नहीं हुई और कच्ची बस्तियों में जाकर सेवा कार्य करने लगीं। वर्ष 1946 में उन्होंने गरीबों, असहायों, बीमारों और लाचारों की जीवनपर्यांत मदद करने का मन बना लिया। इसके बाद मदर टेरेसा ने पटना के होली फॅमिली हॉस्पिटल से आवश्यक नर्सिग ट्रेनिंग पूरी की और 1948 में वापस कोलकाता आ गईं और वहां से पहली बार तालतला गई, जहां वह गरीब बुजुर्गो की देखभाल करने वाली संस्था के साथ रहीं। उन्होंने मरीजों के घावों को धोया, उनकी मरहमपट्टी की और उनको दवाइयां दीं। इस दौरान 1948 में उन्होंने वहां के बच्चों को पढ़ाने के लिए एक स्कूल खोला और तत्पश्चात 'मिशनरीज ऑफ चैरिटी' की स्थापना की। 'सच्ची लगन और मेहनत से किया गया काम कभी निष्फल नहीं होता', यह कहावत मदर टेरेसा के साथ सच साबित हुई।

मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी

मदर टेरेसा के अनुसार मानव सेवा का कार्य शुरूआती दौर बहुत कठिन था। वह लोरेटो छोड़ चुकी थीं इसलिए उनके पास कोई आमदनी नहीं थी – उनको अपना पेट भरने तक के लिए दूसरों की मदद लेनी पड़ी। जीवन के इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर उनके मन में बहुत उथल-पथल हुई, अकेलेपन का एहसास हुआ और लोरेटो की सुख-सुविधायों में वापस लौट जाने का खयाल भी आया लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। 7 अक्टूबर 1950 को उन्हें वैटिकन से ‘मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी’ की स्थापना की अनुमति मिल गयी। इस संस्था का उद्देश्य भूखों, निर्वस्त्र, बेघर, लंगड़े-लूले, अंधों, चर्म रोग से ग्रसित और ऐसे लोगों की सहायता करना था जिनके लिए समाज में कोई जगह नहीं थी। मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी’ का आरम्भ मात्र 13 लोगों के साथ हुआ था पर मदर टेरेसा की मृत्यु के समय (1997) 4 हजार से भी ज्यादा ‘सिस्टर्स’ दुनियाभर में असहाय, बेसहारा, शरणार्थी, अंधे, बूढ़े, गरीब, बेघर, शराबी, एड्स के मरीज और प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित लोगों की सेवा कर रही हैं मदर टेरेसा ने ‘निर्मल हृदय’ और ‘निर्मला शिशु भवन’ के नाम से आश्रम खोले । ‘निर्मल हृदय’ का ध्येय असाध्य बीमारी से पीड़ित रोगियों व गरीबों का सेवा करना था जिन्हें समाज ने बाहर निकाल दिया हो। निर्मला शिशु भवन’ की स्थापना अनाथ और बेघर बच्चों की सहायता के लिए हुई। 13 मार्च 1997 को उन्होंने ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ के मुखिया का पद छोड़ दिया और 5 सितम्बर, 1997 को उनकी मौत हो गई। मानव सेवा और ग़रीबों की देखभाल करने वाली मदर टेरेसा को पोप जॉन पाल द्वितीय ने 19 अक्टूबर, 2003 को रोम में “धन्य” घोषित किया।

मदर टेरिसा का सम्मान एवं पुरस्कार

मदर टेरेसा को मानवता की सेवा के लिए अनेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त हुए। भारत सरकार ने उन्हें पहले पद्मश्री (1962) और बाद में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ (1980) से अलंकृत किया। संयुक्त राज्य अमेरिका ने उन्हें वर्ष 1985 में मेडल आफ़ फ्रीडम 1985 से नवाजा। मानव कल्याण के लिए किये गए कार्यों की वजह से मदर टेरेसा को 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला। उन्हें यह पुरस्कार ग़रीबों और असहायों की सहायता करने के लिए दिया गया था। मदर तेरस ने नोबेल पुरस्कार की 192,000 डॉलर की धन-राशि को गरीबों के लिए एक फंड के तौर पर इस्तेमाल करने का निर्णय लिया।

मदर टेरेसा की आलोचनाएं

जहां अच्छा कार्य होता है वहां अलोचना करने वाले भी कई लोग खड़े हो जाते हैं। मदर टेरेसा के काम के प्रति भी कई लोगों ने आपत्ति जताई। कई व्यक्तियों, जैसे क्रिस्टोफ़र हिचेन्स, माइकल परेंटी, अरूप चटर्जी (विश्व हिन्दू परिषद) द्वारा की गई आलोचना शामिल हैं, जो उनके काम (धर्मान्तरण) के विशेष तरीके के विरुद्ध थे। इसके अलावा कई चिकित्सा पत्रिकाओं में भी उनकी धर्मशालाओं में दी जाने वाली चिकित्सा सुरक्षा के मानकों की आलोचना की गई और अपारदर्शी प्रकृति के बारे में सवाल उठाए गए, जिसमें दान का धन खर्च किया जाता था। उनकी सेवा एवं उनके ट्स्ट पर भी कई तरह के सवाल खड़े किए गए। किन्तु लोगों के ह्रदय में मदर टेरेसा के प्रित साफ एवं सम्मानित छवी आज भी बरकरार है। मदर टेरेसा ने अपने पूरे जीवन को मानव जाति की सेवा में अपने बारे में सोचने के बिना समर्पित किया। उसे कई समस्याओं का सामना करना पड़ा और एक कमरे में रहना पड़ा लेकिन उसकी उच्च आत्माओं ने कई घर कम लोगों की मदद की। उनकी हर कार्रवाई को करुणा, गरिमा और सहानुभूति के तीन स्तंभों द्वारा चिह्नित किया गया था।

मदर टेरेसा के अनमोल वचन

मदर टेरेसा का स्वरूप नीले रंग के पाड़ की साड़ी,पूरी आस्तीन का ब्लाउज,गले में लटका क्रास चिन्ह। भारतीय वेषभूषा में उनके इस सरल व प्रेम से ओत-प्रोत व्यक्तित्व कोई नहीं भूल सकता। मदर टेरेसा दलितों एवं पीडितों की सेवा में किसी प्रकार की पक्षपाती नहीं है। उन्होनें सद्भाव बढाने के लिए संसार का दौरा किया है। उनकी मान्यता है कि 'प्यार की भूख रोटी की भूख से कहीं बडी है।' उनके मिशन से प्रेरणा लेकर संसार के विभिन्न भागों से स्वय्ं-सेवक भारत आये तन, मन, धन से गरीबों की सेवा में लग गये। मदर टेरेसा क कहना है कि सेवा का कार्य एक कठिन कार्य है और इसके लिए पूर्ण समर्थन की आवश्यकता है। वही लोग इस कार्य को संपन्न कर सकते हैं जो प्यार एवं सांत्वना की वर्षा करें - भूखों को खिलायें, बेघर वालों को शरण दें, दम तोडने वाले बेबसों को प्यार से सहलायें, अपाहिजों को हर समय ह्रदय से लगाने के लिए तैयार रहें। मदर टेरेसा ने मनुष्य जनो को अपने वचनो के जरिए जीवन की महत्वपूर्ण शिक्षा दी जो इस प्रकार हैः-

1. एक जीवन जो दूसरों के लिए नहीं जीया गया वह जीवन नहीं है।
2. प्रेम की शुरुआत निकट लोगो और संबंधो की देखभाल और दायित्व से होती है, वो निकट सम्बन्ध जो आपके घर में हैं।
3. सादगी से जिए ताकि दूसरे भी जी सकें।
4. यदि हमारे बीच कोई शांति नहीं है, तो वह इसलिए क्योंकि हम भूल गए हैं कि हम एक दूसरे से संबंधित हैं।
5. यदि आप एक सौ लोगों को भोजन नहीं करा सकते हैं, तो सिर्फ एक को ही भोजन करवाएं।
6. यदि आप चाहते हैं कि एक प्रेम संदेश सुना जाय तो पहले उसे भेजें। जैसे एक चिराग को जलाए रखने के लिए हमें दिए में तेल डालते रहना पड़ता है।
7. सबसे बड़ी बीमारी कुष्ठ रोग या तपेदिक नहीं है , बल्कि अवांछित होना ही सबसे बड़ी बीमारी है।
8. प्यार क़रीबी लोगों की देखभाल लेने के द्वारा शुरू होता है, जो आपके घर पर हैं।
9. शांति की शुरुआत मुस्कराहट से होती है।
10. प्यार हरमौसम में होने वाला फल है, और हर व्यक्ति के पहुंच के अन्दर है।
11. आज के समाज की सबसे बड़ी बीमारी कुष्ठ रोग या तपेदिक नहीं है, बल्कि अवांछित रहने की भावना है।
12. प्यार के लिए भूख को मिटाना रोटी के लिए भूख की मिटने से कहीं ज्यादा मुश्किल है।
13. जहाँ जाइये प्यार फैलाइए। जो भी आपके पास आये वह और खुश होकर लौटे।
14. अगर आप यह देखेंगे की लोग कैसे हैं तो आप के पास उन्हें प्रेम करने का समय नहीं मिलेगा।
15. खूबसूरत लोग हमेशा अच्छे नहीं होते। लेकिन अच्छे लोग हमेशा खूबसूरत होते है।

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