हिन्दूओं में मान्यता है कि सभी हिन्दू देवी देवता चौमास यानि 4 महीनों के लिए निद्रा में लीन हो जाते हैं। जिस दिन देवी-देवता सोने जाते हैं उस दिन को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। देवशयनी एकादशी दो शब्दो से मिलकर बना है देव यानि भगवान और शयन यानि सोना अर्थात भगवान के सोने का दिन है देवशयनी एकादशी। देवशयनी एकादशी आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को कहते हैं जिसे , आषाढ़ी एकादशी, हरि शायानी एकादशी, महा-एकादशी और प्रथम एकादशी नाम से भी जाना जाता है। यह चुतुर्मास शुरु होने का संकेत देती है। चतुर्मास, चार महीनों की पवित्र अवधि होती है जब भगवान विष्णु सोते हैं यह समय देवशायनी एकादशी के बाद शुरू होता है। देवशयनी एकादशी आमतौर पर पुरी रथ यात्रा के कुछ दिन बाद शुरू होती है। महाराष्ट्र में पदंरपुर यात्रा भी इस दिन खत्म होती है। महाराष्ट्र में तीर्थयात्री धार्मिक उत्साह के साथ देवशयनी एकादशी के व्रत का पालन करते हैं। महाराष्ट्र के भगवान विठ्ठल मंदिर में इस दिन मुख्य उत्सव होता है। भगवान कृष्ण को विष्णु का अवतार समझ उनकी पूजा की जाती है। इस बार देवशयनी एकादशी 12 जुलाई को है।


चतुर्मास अवधि की शुरुआत

देवशयनी एकादशी चतुर्मास काल की शुरुआत से एक दिन पहले होती है। चतुर्मास नाम के रूप में यह चार महीनों का संकेत देता है जिसमें अषाढ, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन चतुर्मास काल के दौरान, सभी शुभ कार्य वर्जित होतें हैं। भक्तों से तपस्या का करने, भक्तिपूर्ण गतिविधियों को पूरा करने और अपनी इंद्रियों पर रोक लगाने की उम्मीद की जाती है।

देवशयनी एकादशी का ऐतिहासिक महत्व

देवशयनी एकादशी का महत्व धार्मिक शास्त्रों में यह है कि पहली बार भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को इसके महत्व को बारे में समझाया था। उन्होंने कहा था कि मंधाता नामक सतयुग में एक राजा हुआ करते थे। एक बार उनके राज्य में वर्षा नहीं हुई उन्हें तीन साल तक सूखे का सामना करना पड़ा। इसने एक अनिश्चित स्थिति पैदा की जिससे राज्य के निवासियों को मुश्किल समय का सामना करना पड़ा। नदियां सूख गईं और मनुष्य और पशु को बहुत पीड़ा मिलने लगी। जिससे दुखित होकर राजा सोचने लगे की मैने अपने जीवन में ऐसा कौन सा पाप किया है जिसकी सजा मुझे मिल रही है। यही सोचते हुए राजा अपने राज्य में होने वाली घटनाओं के पीछे का कारण जनाने के लिए जंगल की ओर निकल गए। वहाँ विचरण करते-करते एक दिन वे ब्रह्माजी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुँचे और उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। ऋषिवर ने राजा से उनका कुशल समाचार पूछा फिर जंगल में विचरने व अपने आश्रम में आने का प्रयोजन जानना चाहा। तब राजा ने हाथ जोड़कर कहा- 'महात्मन्‌! मैं सभी प्रकार से धर्म का पालन करता हुआ फिर भी मैं अपने राज्य की दुर्गति देख रहा हूं । आखिर मुझसे ऐसा कौन सा पाप हो गया है। इसका क्या समाधान है मुझे बताएं ऋषिवर। तब ऋषि ने कहा कि यह सतयुग है यहां थोड़े से पाप की भी बड़ी भुगताई करनी पड़ती है उसका बड़ा दंड मिलता है। इस युग में ब्राह्मण के अतिरिक्त किसी अन्य जाति को तप करने का अधिकार नहीं है जबकि आपके राज्य में एक शूद्र तपस्या कर रहा है। यही कारण है कि आपके राज्य में वर्षा नहीं हो रही है। जब तक वह काल को प्राप्त नहीं होगा, तब तक यह दशा शांत नहीं होगी। किंतु राजा किसी को मारने के लिए तैयार नहीं हुए। उन्होनें कोई दूसरा उपाय जानना चाहा। तब 'महर्षि अंगिरा ने बताया- 'आषाढ़ माह के शुक्लपक्ष की एकादशी का व्रत करें। इस व्रत के प्रभाव से अवश्य ही वर्षा होगी।' राजा अपने राज्य की राजधानी लौट आए और चारों वर्णों सहित पद्मा एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उनके राज्य में मूसलधार वर्षा हुई और पूरा राज्य धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया।

वहीं इसकी दूसरी कथा भी है। धार्मिक ग्रंथों में यह भी मिलता है कि इसी एकादशी की तिथि को शंखासुर दैत्य मारा गया था। जिसके बाद भगवान विष्णु इस दिन से आरंभ करके चार मास तक क्षीर सागर में शयन करते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं। पुराण के अनुसार यह भी कहा गया है कि भगवान हरि ने वामन रूप में दैत्य बलि के यज्ञ में तीन पग दान के रूप में मांगे थे। भगवान ने पहले पग में संपूर्ण पृथ्वी, आकाश और सभी दिशाओं को ढक लिया। अगले पग में सम्पूर्ण स्वर्ग लोक ले लिया। तीसरे पग में बलि ने अपने आप को समर्पित करते हुए सिर पर पग रखने को कहा। इस प्रकार के दान से भगवान ने प्रसन्न होकर बलि को पाताल लोक का अधिपति बना दिया और कहा वर मांगो। बलि ने वर मांगते हुए कहा कि भगवान आप मेरे महल में नित्य रहें। बलि के बंधन में बंधा देख उनकी भार्या लक्ष्मी ने बलि को भाई बना लिया और बलि से भगवान से को वचन से मुक्त करने का अनुरोध किया। तब इसी दिन से भगवान विष्णु जी द्वारा वर का पालन करते हुए तीनों देवता 4-4 माह सुतल में निवास करते हैं। विष्णु देवशयनी एकादशी से देवउठानी एकादशी तक, शिवजी महाशिवरात्रि तक और ब्रह्माजी शिवरात्रि से देवशयनी एकादशी तक निवास करते हैं।

देवशयनी एकादशी समारोह

देवशयनी एकादशी के दिन प्रात:काल उठकर साफ-सफाई कर नित्य कर्म से निवृत हो, स्नानादि के पश्चात घर में पवित्र जल का छिड़काव करना चाहिए। पूजा स्थल पर भगवान श्री हरि यानि विष्णु जी की सोने, चांदी, तांबे या फिर पीतल की मूर्ति स्थापित करनी चाहिए। इसके बाद धूप, दीप, नैवेध सहित पूजा करनी चाहिए। पूजा के बाद व्रत कथा अवश्य सुननी चाहिये। तत्पश्चात आरती करें और प्रसाद बांटे और अंत में सफेद चादर से ढंके गद्दे तकिये वाले पलंग पर श्री विष्णु को शयन कराना चाहिये। भक्तों को देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु के दिव्य आशीर्वाद प्राप्त होते हैं। यदि वे इस दिन पूर्ण भक्ति के साथ भगवान विष्णु की अराधना करते हैं तो उन्हें सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है। साथ ही भक्त मोक्ष प्राप्त करने में सक्षम होते हैं। देवशयनी एकादशी का उपवास भक्तों को उनकी इच्छाओं को पूरा करने में मदद करता है और उन्हें अतीत में किए गए किसी भी पाप से मुक्ति दिलाने में भी मदद करता है। देवशयनी एकादशी के उपवास से आत्मा को नियंत्रण एवं मजबूत करने और भावनात्मक रूप से स्थिर बनाने में मदद मिलती है। भगवान विष्णु के कई भक्त लगातार 2 दिनों तक उपवास करते हैं। हालांकि, दूसरे दिन उपवास केवल उन लोगों के लिए सुझाया जाता है जो लंबे समय तक सान्या (मोक्ष) प्राप्त करना चाहते हैं। जो मोक्ष प्राप्त करने की उम्मीद कर रहे हैं वे भी देवशयनी एकादशी में दूसरे दिन उपवास कर सकते हैं।

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