पहले नवरात्रि, फिर दशहरा और फिर शुरू हो जाती है दिवाली की धूम। दिवाली के त्योहारों की शुरुआत धनत्रयोदशी यानि धनतेरस से ही होती है। अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से ये दिवाली से 2 दिन पहले आता है। धनतेरस के दिन मां लक्ष्मी और भगवान धन्वन्तरि की पूजा होती है। धनतेरस दो शब्दों से मिलकर बना है एक धन और दूसरा तेरस। तेरस का मतलब होता है 13वां दिन। कृष्ण पक्ष के 13वें दिन धनतेरस आती है।



इस दिन घर में धन धान्य, निरोग और बरकत की कामना की जाती है। यही नहीं अकाल मृत्यु को लेकर भी इनस दिन दीया जलाया जाता है। जो लोग व्यापार करते हैं या किसी ना किसी तरीके से व्यापार से जुड़े हैं वो इस त्योहार को बड़े ही चाव से मनाते हैं। कुछ भी नया लेना हो चाहे वो वाहन हो, मशीन हो या सोना चांदी हो लोग इस दिन ही खरीदने को तरजीह देते हैं। माना जाता है कि इस दिन जो कुछ भी खरीदेंगे उसमें बढ़ौतरी होगी साथ ही मां लक्ष्मी भी खुश होती हैं। मां लक्ष्मी खुश हो गईं तो वो आपके घर आकर वहां के भंडार भर देती हैं।

धनतेरस कैसे मनाएं

इस दिन लोग अपने घर और ऑफिस को अच्छे से साफ सुथरा बनाते हैं। मुख्य द्वार के आगे रंगोली बनाकर मिट्टी के दीये जलाए जाते हैं। उसके बाद पूजा शुरू की जाती है। मुहूर्त के वक्त अराधना होती है। दिवाली की पूजा के लिये गणेश और लक्ष्मी जी की प्रतिमाएं भी लाई जाती हैं।
ये बहुत पुरानी प्रथा है कि धनतेरस के दिन सोने चांदी के सिक्के खरीदे जाएं और कम से कम एक नया बर्तन तो जरूर ही घर आना चाहिए। आज के दौर में एक दूसरे को गिफ्ट् देने का भी रिवाज चल पड़ा है। अधिकतर लोगों ने अगर सितंबर या अक्टूबर में कोई वाहन लेना हो तो वो धनतेरस के दिन ही इसे लेते हैं। कई जगह तो धनतेरस के दिन वाहन लेने के लिये चार-पांच महीने पहले ही बुकिंग करवानी पड़ती है।



लक्ष्मी मां की पूजा सच्चे मन और पूरी भक्ति के साथ की जाती है। इस दिन पूरी रात घर में दीये जलते रहते हैं। महाराष्ट्र में धनिये के बीज और गुड़  का भोग लगाया जाता है साथ ही गांव के कई लोग अपने पशुओं को पूजते हैं, क्योंकि पशु ही उनकी आय का साधन होते  हैं।

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May (Baisakh/Jyeshta)​