दुर्गा पूजा का त्योहार कई अनुष्ठानों और परंपराओं का एक पर्व है। मूर्ति बनाने से लेकर मूर्ति विसर्जित करने तक हर चीज का एक तरीका और नियम है। हिंदू धर्म में हर पूजा पाठ में कुछ नियम बनाए गए हैं जिनके आधार पर ही विधि आगे बढ़ती है। हालांकि कुछ नियमों में ढील भी दी गई है, लेकिन कुछ नियम कड़े हैं जैसे कि मूर्ति बनाने के लिये वेश्याल की मिट्टी जरूरी है। मां की मूर्ति बीच में होनी चाहिए और उनके पीछे पूरा चल चित्र होना चाहिए। मां शेर की सवारी करते हैं। उनका सबसे प्रचलित चित्र हाथ में भाला लिये महिषासुर का वध करते हुए का है।

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वैसे तो दुर्गा पूजा 10 दिन चलती है, लेकिन मुख्य अनुष्ठान चार दिन चलते हैं। देवी पक्षा जो कि नए चांद से अगले पूरे चांद के बीच का वक्त होता है वो धार्मिकअनुष्ठानों के लिये बहुत उपयुक्त माना गया है।
मां दुर्गा की प्रतिमा की बड़ी बड़ी आंखे बनाने की प्रक्रिया को “चक्खू दान” कहते हैं। ये दृष्टी की शक्ति का प्रतीक होता है। ये प्रक्रिया महालया के दिन होती है।

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मुख्य पूजा षष्ठी से शुरू होती है। जो कि नए चांद से छठे दिन होती है।

सप्तमी

सप्तमी के दिन दुर्गा मां की प्रतिमा में जीवदान डाला जाता है, इस प्रक्रिया को बोधन कहा जाता है। सुबह जल्दी जाकर देवी के प्राण प्रतिमा में रखे जाते हैं। ये केले के पत्ते पर नदी से लाए जाते हैं। केले के पोधे को नहलाया जाता है और फिर नई पीली साड़ी में लपेट कर पूरा दुल्हन की तरह सजा दिया जाता है।

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सप्तमी पर पूजा के लिये जरूरी सामग्री

जूट रस्सियां, एक बर्तन, लाल धागा, अल्टा, चार अंगूठियां, चार yadnyopaveet या जनेऊ, एक दर्पण, चंदन, mashkolai(माह दाल), हिबिस्कस फूल, छोटा नोइबाइडो, एक बड़ा मिट्टी का दीपक, पंचपल्लब, पंच रत्न, पंचशाश, पंचगुरी, सिंदूर, आरती का सामान , यज्ञ का सामान, रेत, लकड़ी, सूखे खार्क घास, गौ-गोबर, कुशा, घी, 108 बेल पत्ते और एक कटोरा।

अष्टमी

अष्टमी का दिन दुर्गा पूजा अपनी चरम सीमा पर होती है। दिन की शुरूआत मंत्रोच्चार से होती है। सैंकड़ो की संख्या में पंडाल और उनमें हज़ारों की संख्या में भक्त मां दुर्गा को अंजली अर्पित करते हैं। अष्टमी के दिन छोटी छोटी कन्याओं को मां दुर्गा के रूप में पूजन सबसे महत्वपूर्ण होता है। शाम को संधि पूजा होती है। संधि पूजा अष्टमी और नवमी के बीच आती है। इस दिन एक दंतक्षतो, 40 या 22 कुशा की अंगूठियां, एक नथ, लोहा, सिंदूर का बक्सा, दो शंख, फूल, बेलपत्री और एक माला।

नवमी

नवमी के दिन मुख्यआकर्षण होती है शाम को होने वाली महा आरती। ये दुर्गा पूजा का आखिरी दिन भी होता है। संधि पूजा जैसे ही खत्म होती है तो नवमी पूजा शुरू हो जाती है। दुर्गा मां को नवमी भोग लगाए जाते हैं। पूजा की सामग्रियां सप्तमी जैसे ही होती हैं।

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दशमी

दशमी के दिन विसर्जन का दिन होता है। मां की मूर्ति को वाहन पर रख कर एक शोभा यात्रा निकाली जाती है। बैंड बाजे के साथ नाचते गाते सभी लोग नदी किनारे जाते हैं और पूरे विधि विधान से प्रतिमा को नदी में विसर्जित करते हैं। एक दूसरे को मिठाइयां बांटी जाती हैं और फिर भोज दिया जाता है।

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