दुर्गा मां के नाम से ही भूत प्रेत, डर, नज़र, रोक, टोक बीमारी, उपरी हवा सब भाग जाते हैं। जो भक्त रोज मां की स्तुति करता है एक तो वो निडर बनता है, दूसरा उसका कोई बाल बांका नहीं कर सकता और तीसरा उसकी नौकरी में तरक्की या कारोबार में वृद्धि होती है। दुर्गा मां का कवच सचमुच के कवच का काम करता है और बुरी शक्तियों से हमारी रक्षा करता है।

दुर्गा मां कवच




ॐ अस्य श्री चण्डी कवचस्य । ब्रह्मा ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः ।
चामुण्डादेवता अङ्गन्यासोक्तमातरो बीजम् । दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम् ।।
श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशती पाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः ।।
!! ॐ नमश्चण्डिकायै !!

*****मार्कण्डेय उवाच*****
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम् ।।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह ।। १।।
ब्रह्मोवाच 
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम् ।|
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने ।। २।।
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ।।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।। ३।।
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च ।।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।। ४।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ।।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ।। ५।।
अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे ।।
विषमे दुर्गमे चैव भयात्तार्म शरणं गताः ।। ६।।
न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे ।।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि ।। ७।।
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते ।।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः ।। ८।।
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना ।।
ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना ।। ९।।
माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना ।।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरि प्रिया ।। १०।।
श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना ।।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता ।। ११।।
इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोग समन्विताः ।।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नो पशोभिताः ।। १२।।
दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः ।।
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम् ।। १३।।
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च ।।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शाङ्गर्मायुधमुत्तमम् ।। १४।।
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च ।।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै ।। १५।।
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे ।।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ।। १६।।
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवद्धिर्नि ।।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता ।। १७।।
दक्षिणेऽवतु वाराही नैऋर्त्यां खड्गधारिणी ।।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी ।। १८।।
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी ।।
ऊध्वर्म ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा ।। १९।।
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना ।।
जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः ।। २०।।
अजिता वाम पाश्वेर् तु दक्षिणे चापराजिता ।।
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूध्निर् व्यवस्थिता ।। २१।।
मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी ।।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके ।। २२।।
शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोद्वार्रवासिनी ।।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शाङ्करी ।। २३।।
नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका ।।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती ।। २४।।
दन्तान् रक्षतु कौमरी कण्ठदेशे तु चण्डिका ।।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके ।। २५।।
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला ।।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी ।। २६।।
नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी ।।
स्कन्धयोः खङ्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी ।। २७।।
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च ।।
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौरक्षेत्कुलेश्वरी ।। २८।।
स्तनौरक्षेन्महादेवी मनःशोकविनाशिनी ।।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी ।। २९।।
नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा ।।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी ।। ३०।।
कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी ।।
जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ।। ३१।।
गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी ।।
पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी ।। ३२।।
नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोध्वर्केशिनी ।।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा ।। ३३।।
रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती ।।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी ।। ३४।।
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा ।।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसन्धिषु ।। ३५।।
शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा ।।
अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी ।। ३६।।
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम् ।।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना ।। ३७।।
रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी ।।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा ।। ३८।।
आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी ।।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी ।। ३९।।
गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके ।।
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी ।। ४०।।
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा ।।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता ।। ४१।।
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु ।।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी ।। ४२।।
पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः ।।
कवचेना वृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति ।। ४३।।
तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः ।।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् ।।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान् ।। ४४।।
निर्भयो जायते मत्यर्म: संग्रामेष्वपराजितः ।।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान् ।। ४५।।
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् ।। यः
पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः ।। ४६।।
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः ।।
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः ।। ४७।।
नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः ।।
स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम् ।। ४८।।
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले ।।
भूचराः खेचराश्चैवजलजाश्चोपदेशिकाः ।। ४९।।
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा ।।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः ।। ५०।।
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः ।।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कुष्माण्डा भैरवादयः ।। ५१।।
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते ।।
मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम् ।। ५२।।
यशसा वद्धर्ते सोऽपि कीर्ति मण्डितभूतले ।।
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा ।। ५३।।
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम् ।।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां सन्ततिः पुत्र पौत्रिकी ।। ५४।।
देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम् ।।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामाया प्रसादतः ।। ५५।।
लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते ।। ॐ ।। ५६

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दुर्गा मां स्तुति



जय भगवति देवि नमो वरदे जय पापविनाशिनि बहुफलदे।
जय शुम्भनिशुम्भकपालधरे प्रणमामि तु देवि नरार्तिहरे॥1॥

जय चन्द्रदिवाकरनेत्रधरे जय पावकभूषितवक्त्रवरे।
जय भैरवदेहनिलीनपरे जय अन्धकदैत्यविशोषकरे॥2॥

जय महिषविमर्दिनि शूलकरे जय लोकसमस्तकपापहरे।
जय देवि पितामहविष्णुनते जय भास्करशक्रशिरोवनते॥3॥

जय षण्मुखसायुधईशनुते जय सागरगामिनि शम्भुनुते।
जय दु:खदरिद्रविनाशकरे जय पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे॥4॥

जय देवि समस्तशरीरधरे जय नाकविदर्शिनि दु:खहरे।
जय व्याधिविनाशिनि मोक्ष करे जय वाञ्छितदायिनि सिद्धिवरे॥5॥

एतद्व्यासकृतं स्तोत्रं य: पठेन्नियत: शुचि:।
गृहे वा शुद्धभावेन प्रीता भगवती सदा॥

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मां दुर्गा चालीसा





नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥
निरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूँ लोक फैली उजियारी॥
शशि ललाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥
रूप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुख पावे॥1॥

तुम संसार शक्ति लै कीना। पालन हेतु अन्न धन दीना॥
अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥
प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥
शिव योगी तुम्हरे गुण गावें। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥2॥

रूप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥
धरयो रूप नरसिंह को अम्बा। परगट भई फाड़कर खम्बा॥
रक्षा करि प्रह्लाद बचायो। हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥
लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं॥3॥

क्षीरसिन्धु में करत विलासा। दयासिन्धु दीजै मन आसा॥
हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥
मातंगी अरु धूमावति माता। भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥
श्री भैरव तारा जग तारिणी। छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥4॥

केहरि वाहन सोह भवानी। लांगुर वीर चलत अगवानी॥
कर में खप्पर खड्ग विराजै ।जाको देख काल डर भाजै॥
सोहै अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला॥
नगरकोट में तुम्हीं विराजत। तिहुँलोक में डंका बाजत॥5॥

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे। रक्तबीज शंखन संहारे॥
महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी॥
रूप कराल कालिका धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा॥
परी गाढ़ सन्तन र जब जब। भई सहाय मातु तुम तब तब॥6॥

अमरपुरी अरु बासव लोका। तब महिमा सब रहें अशोका॥
ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नरनारी॥
प्रेम भक्ति से जो यश गावें। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्ममरण ताकौ छुटि जाई॥7॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥
शंकर आचारज तप कीनो। काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥
निशिदिन ध्यान धरो शंकर को। काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥
शक्ति रूप का मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछितायो॥8॥

शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदम्ब भवानी॥
भई प्रसन्न आदि जगदम्बा। दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥
मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥
आशा तृष्णा निपट सतावें। मोह मदादिक सब बिनशावें॥9॥

शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥
करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धिसिद्धि दै करहु निहाला॥
जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ । तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ ॥
श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै। सब सुख भोग परमपद पावै॥10॥

देवीदास शरण निज जानी। कहु कृपा जगदम्ब भवानी॥


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मां दुर्गा आरती





जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी तुम को निस दिन ध्यावत
मैयाजी को निस दिन ध्यावत हरि ब्रह्मा शिवजी ।| जय अम्बे गौरी ॥
 
माँग सिन्दूर विराजत टीको मृग मद को |मैया टीको मृगमद को
उज्ज्वल से दो नैना चन्द्रवदन नीको|| जय अम्बे गौरी ॥
 
कनक समान कलेवर रक्ताम्बर साजे| मैया रक्ताम्बर साजे
रक्त पुष्प गले माला कण्ठ हार साजे|| जय अम्बे गौरी ॥
 
केहरि वाहन राजत खड्ग कृपाण धारी| मैया खड्ग कृपाण धारी
सुर नर मुनि जन सेवत तिनके दुख हारी|| जय अम्बे गौरी ॥
 
कानन कुण्डल शोभित नासाग्रे मोती| मैया नासाग्रे मोती
कोटिक चन्द्र दिवाकर सम राजत ज्योति|| जय अम्बे गौरी ॥
 
शम्भु निशम्भु बिडारे महिषासुर घाती| मैया महिषासुर घाती
धूम्र विलोचन नैना निशदिन मदमाती|| जय अम्बे गौरी ॥
 
चण्ड मुण्ड शोणित बीज हरे| मैया शोणित बीज हरे
मधु कैटभ दोउ मारे सुर भयहीन करे|| जय अम्बे गौरी ॥
 
ब्रह्माणी रुद्राणी तुम कमला रानी| मैया तुम कमला रानी
आगम निगम बखानी तुम शिव पटरानी|| जय अम्बे गौरी ॥
 
चौंसठ योगिन गावत नृत्य करत भैरों| मैया नृत्य करत भैरों
बाजत ताल मृदंग और बाजत डमरू|| जय अम्बे गौरी ॥
 
तुम हो जग की माता तुम ही हो भर्ता| मैया तुम ही हो भर्ता
भक्तन की दुख हर्ता सुख सम्पति कर्ता|| जय अम्बे गौरी ॥
 
भुजा चार अति शोभित वर मुद्रा धारी| मैया वर मुद्रा धारी
मन वाँछित फल पावत देवता नर नारी|| जय अम्बे गौरी ॥
 
कंचन थाल विराजत अगर कपूर बाती| मैया अगर कपूर बाती
माल केतु में राजत कोटि रतन ज्योती|| बोलो जय अम्बे गौरी ॥
 
माँ अम्बे की आरती जो कोई नर गावे| मैया जो कोई नर गावे
कहत शिवानन्द स्वामी सुख सम्पति पावे|| जय अम्बे गौरी ॥
 
देवी वन्दना
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता|
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ||

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