भारतीय हिंदू धर्म में पुस्तकों एवं धर्म ग्रंथों का बड़ा महत्व है। हिंदू धर्म से जुड़े सभी रीति-रिवाज,धर्म,परंपराएं इन धार्मिक ग्रंथों के माध्यम से ही पता चलती है। प्रत्येक धर्म की कोई ना कोई धार्मिक ग्रंथ अवश्य होता है जिसमें मनुष्य के जीवन का सार छिपा होता है। हिंदू धर्म में श्रीमद्भागवत गीता का बड़ा ही महत्व है। यह पुस्तक कोई आम पुस्तक नहीं है। इसमें सभी धर्मों और मनुष्य जातियों के जीवन का सार निहित है। गीता को सबसे पवित्र पुस्तक और न्याय पुस्तिका के रुप में जाना जाता है। जिसमें भगवान श्री कृष्ण ने महाभारत के समय अर्जुन को उपदेश दिया था। उन्हीं के उपदेशों को गीता का नाम दिया गया है। आज भी किसी बात की सत्यता की जांच करने के लिए गीता को ही साक्षी माना जाता है। गीता की इसी महत्वता को प्रदर्शित करने के लिए प्रत्येक वर्ष हरियाणा के कुरुक्षेत्र में गीता जयंती समारोह का आयोजन किया जाता है गीता जयंती महोत्सव एक अद्वितीय और असाधारण त्योहार है जो हिंदुओं की पवित्र पुस्तक श्रीमद् भागवत गीता के जन्म के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। गीता जंयती उत्सव यूं तो पूरे देश में मार्गशीर्ष शुक्ल् एकादशी को मनाया जाता है किन्तु कुरुक्षेत्र में गीता जयंती की अलग ही भव्यता और चमक देखने को मिलती है। इस पवित्र त्यौहार को अत्यधिक भक्ति और समर्पण के साथ मनाया जाता है। कुरुक्षेत्र अविभाज्य है जब कोई भारतीय संस्कृति और हिंदू पौराणिक कथाओं के बारे में बात करता है। दरअसल कुरुक्षेत्र को वह भूमि माना जाता है जहां वास्तविक हिंदू धर्म का सार पाया जाता है। मान्ययता है कि भगवद् गीता का जन्म श्री कृष्ण के मुख से कुरुक्षेत्र के मैदान में हुआ था। कलयुग के प्रारंभ होने के 30 साल पहले मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी के दिन कुरुक्षेत्र के मैदान में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिया था वह श्रीमद्भगवद् गीता के नाम से प्रसिद्ध है। श्रीमद्भागवद गीता के 18 अध्यायों में से पहले 6 अध्यायों में कर्मयोग, फिर अगले 6 अध्यायों में ज्ञानयोग और अंतिम 6 अध्यायों में भक्तियोग का उपदेश है। इस वर्ष गीता जयंती समारोह 18 दिसंबर को मनाया जाएगा।

 
गीता जयंती

गीता का महत्व

हिंदू धर्म में गीता का बहुत महत्व है। गीता के उपदेश सिर्फ उपदेश नहीं बल्किो यह हमें जीवन जीने का तरीका सिखाते हैं। मान्यता के अनुसार कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन अपने विपक्ष में परिवार के लोगों और सगे-संबधियों को देखकर बुरी तरह भयभीत हो गए थे और वह उनके खिलाफ युद्ध करने को तैयार नहीं थे तब श्री कृष्ण ने गीता के माध्यम से अर्जुन को रिश्तों से उपर उठकर न्याय का साथ देने का उपदेश दिया। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उनके कर्तव्य और कर्म के बारें में बताया। उन्होंने आत्मा-परमात्मा से लेकर धर्म-कर्म से जुड़ी अर्जुन की हर शंका का निदान किया। भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हुआ यह संवाद ही श्रीमद्भगवद गीता है। जिस दिन श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया उस दिन मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी थी। इस एकादशी को मोक्षदा एकादशी भी कहा जाता है। मोक्षदा एकादशी के दिन ही गीता जयंती मनाई जाती है। श्रीमद् भगवत गीता ने अपनी स्थापना के बाद से हिंदुओं के लिए दार्शनिक गाइड और आध्यात्मिक शिक्षक का रुप धारण किया है। गीता में, भगवान कृष्ण ने अर्जुन को पांडवों में से एक को कई सबक सिखाए हैं जिन्हें किसी के जीवन जीने का आदर्श माध्यम माना जाता है। गीता की सबसे प्रसिद्ध शिक्षाओं में से एक उम्र के बाद से कहती है, "किसी को निस्संदेह अपने कर्तव्यों और कर्मों को निष्पादित करना चाहिए, परिणाम के बारे में चिंता नहीं करनी चाहिए केवल कर्म करना चाहिए"। पौराणिक कथाओं के अनुसार गीता हर समस्या के लिए समाधान प्रदान करती है जिसे एक व्यक्ति अपने जीवन में सामना करता है।

 

 

गीता जयंती उत्सव

गीता जयंती समरोह कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड, हरियाणा पर्यटन, जिला प्रशासन, उत्तरी क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र पटियाला और सूचना एवं जनसंपर्क विभाग हरियाणा द्वारा आयोजित किया जाता है। गीता जयंती समरोह के दौरान पूरा भारत भक्तिमय हो जाता है। गीता के जन्म स्थल के रुप में विख्यात कुरुक्षेत्र की भूमि और पवित्र हो जाती है। भक्तों और श्रद्धालुओं का जमावड़ा लग जाता है। इस उत्सव में हर उम्र के लोग सम्मिलित होते है। पवित्र कुंडो में स्नान करते हैं सनीहित सरोवर और ब्रह्मा सरोवर के पवित्र पानी में डुबकी लगाई जाती है। पूरे पर्यावरण का आयोजन कई गतिविधियों के साथ दिव्य और आध्यात्मिक हो जाता है। गीता जयंती समारोह के समय  विशाल मेला लगता है जो करीब एक सप्ताह तक चलता है। आगंतुकों के लिए प्रमुख आकर्षण श्लोक रीतिताल, नृत्य, भगवड़ा कथा पढ़ना, भजन, नाटक और पुस्तक प्रदर्शनी होती है।

गीता जयंती के दिन श्रीमद्भागवद्गीता का पाठ किया जाता है। देश भर के मंदिरों विशेषकर इस्कॉन मंदिर में भगवान कृष्ण और गीता की पूजा की जाती है। गीता जयंती के मौके पर कई लोग उपावस रखते हैं। गीता के उपदेश पढ़े और सुने जाते हैं। कुरुक्षेत्र में प्रतिदिन भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने के लिए देशभर से कलाकारों को आमंत्रित किया जाता है। इस समारोह के दौरान राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की जाती है जिसमें देश-विदेश के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से आए विद्वानों अपने विचार रखते हैं। इस दौरान यहां राज्य स्तरीय विकास प्रदर्शनी और शिल्प मेले का भी आयोजन किया जाता है। देश भर से आए लोक कलाकारों के दलों ने पारंपरिक वाद्य यंत्रों को बजाकर माहौल को खुशनुमा बना देते हैं। इस दौरान यहां आकर विभिन्न राज्यों से आए कलाकारों के कला और हुनर के बेहतरीन नमूनों को भी देखा जा सकता है। प्रख्यात विद्वानों और हिंदू पुजारी द्वारा पवित्र पुस्तक के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालने और पीढ़ियों तक मानव जाति पर इसके बारहमासी प्रभाव से चर्चाएं और सेमिनार आदि आयोजित होते हैं। गीता पढ़ने में उनकी रुचि को प्रोत्साहित करने के एक तरीके के रूप में बच्चों के लिए स्टेज प्ले और गीता जप प्रतियोगिताओं को अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए आयोजित किया जाता है। पत्र, पुस्तिका और गीता के सार युक्त किताबें जनता को वितरित की जाती हैं। पिछले कुछ वर्षों में गीता जयंती समरोह ने विशेष रूप से हिंदू समुदाय के बीच बहुत महत्व और लोकप्रियता प्राप्त की है इन वर्षों में, गीता जयंती समरोह के रूप में जाना मेले में अत्यधिक लोकप्रियता मिली है और इस पवित्र सभा में भाग लेने के लिए घटनाओं के दौरान बड़ी संख्या में पर्यटकों और तीर्थयात्री कुरुक्षेत्र जाते हैं। जिससे पर्यटन को भी काफी बढ़ावा मिला है।

 
गीता जयंती

 
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