गुरु अर्जन देव जी ग्यारह सिख गुरुओं के पांचवें गुरु थे। अर्जन देव जी का जन्म पंजाब के गोइंदवाल में हुआ था। उनके पिता गुरु राम दास साहिब जी और माता बीबी भानी जी थी। अर्जन देव सबसे छोटे बेटे थे। बीबी भानी जी गुरु अमर दास की बेटी थीं। अपने पिता गुरु राम दास की मृत्यु के बाद 1 सितंबर, 1581 को गुरु अर्जन पांचवें गुरु बने थे। गुरु अर्जन देव के द्वारा किए गए सबसे महत्वपूर्ण काम में से एक था “आदि ग्रंथ” का संकलन। उन्होंने पहले चार गुरुओं के सभी कार्यों को इकट्ठा किया और उन्हें 1604 में छंद के रूप में लिखा। उन्होंने अपने संकलन में हिंदू और मुस्लिम संतों की शिक्षाओं को भी जोड़ा। मृत्यु से पहले गुरु अर्जन देव ने अपने बेटे गुरु हर गोबिंद को अगले गुरु के रूप में घोषित किया। उन्होंने अमृतसर शहर का निर्माण कराया तथा साथ ही तारन और करतरपुर जैसे अन्य शहरों की भी स्थापना की।

गुरु अर्जन देव जी से जुड़ी कथा

गुरु अर्जन देव जी के साथ एक कथा प्रचलित है। एक समय की बात है। उन दिनों बाला और कृष्णा पंडित सुंदरकथा करके लोगों को खुश किया करते थे और सबके मन को शांति प्रदान करते थे। एक दिन वे गुरु अर्जन देव जी के दरबार में उपस्थित हुए और प्रार्थना करने लगे। लोगों ने कहा कि महाराज आप कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे हमारे मन को शांति मिले, हमें शांति कब प्राप्त होगी..? तब गुरु अर्जन देव जी ने कहा कि अगर आप लोग सच में मन की शांति चाहते हो तो अपनी कथनी और करनी पर अमल करो। आप जो कहते हो उसका अनुसरण करो। परमात्मा सब देख रहा है वो हमारे साथ है इस बात को हमेशा ध्यान में रखो। अगर आप सिर्फ धन इकट्ठा करने के लालच से कथा करोगे तो आपके मन को शांति कदापि प्राप्त नहीं होगी। बल्कि उल्टा आपके मन का लालच बढ़ता जाएगा और आप पहले से भी ज्यादा दुखी हो जाओगे। अपने कथा करने के तरीके में बदलाव कर निष्काम भाव से कथा करो, तभी तुम्हारे मन में सच्ची शांति महसूस होगी।

गुरु अर्जन देव को लेकर उनके नाना ने की थी भविष्यवाणी

गुरु अर्जन देव को लेकर उनके नाना ने भविष्यवाणी की थी। अर्जन देव बचपन से ही बहुत शांत स्वभाव तथा पूजा भक्ति करने वाले थे। जब वह छोटे थे उसी समय गुरु अमरदास जी ने भविष्यवाणी की थी कि यह बालक बहुत बाणी की रचना करेगा। गुरु जी ने कहा था ‘दोहिता बाणी का बोहिथा’। गुरु अर्जन सिंह जी ने बचपन के साढ़े 11 वर्ष गोइंदवाल साहिब में ही बिताए तथा उसके बाद गुरु रामदास जी अपने परिवार को अमृतसर साहिब ले आए। उनकी शादी 16 वर्ष की आयु में जिला जालंधर के गांव मौ साहिब में कृष्ण चंद की पुत्री माता गंगा जी के साथ हुई।

समाज सुधारक के रुप में भी जाने जाते हैं गुरु अर्जन देव जी

पवित्र वचनों से दुनिया को उपदेश देने वाले गुरुजी का मात्र 43 वर्ष का जीवनकाल अत्यंत प्रेरणादायी रहा। वे आध्यात्मिक चिंतक एवं उपदेशक के साथ ही समाज सुधारक भी थे। अपने जीवन काल में गुरुजी ने धर्म के नाम पर आडंबरों और अंधविश्वासों पर कड़ा प्रहार किया। सती प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ भी वे डंटकर खड़े रहे। गुरु अर्जन देव जी ने 'तेरा कीआ मीठा लागे, हरि नाम पदारथ नानक मागे'  शब्द का उच्चारण करते हुए सन्‌ 1606 में अमर शहीदी प्राप्त की। आध्यात्मिक जगत में गुरु जी को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। गुरु अर्जन देव ने मसंद नामक एक प्रणाली का आयोजन किया। जहां प्रतिनिधियों के एक समूह ने गुरुओं की शिक्षाओं को पढ़ाया और फैलाया और उन्हें सिख की आय की आंशिक पेशकश मिली, जिसे ‘दसींद’ कहा जाता है।  इसे मौद्रिक मूल्यों, सामानों या सेवाओं के संदर्भ में माना जा सकता है। इन पैसों को सिखों द्वारा गुरुद्वारे में लंगर के आयोजन के रुप में प्रयोग में लाया जाता है। लंगर सभी के लिए खुले होते हैं। जो गुरुद्वारा जाते हैं, जो कि सभी मनुष्यों के लिए जातिहीन समाजिक और समानता का प्रतीक है। जिस भूमि को आज अमृतसर के नाम से जाना जाता है उसे मुगल सम्राट अकबर ने उपहार दिया था। अकबर रसोईघर में एक आम आदमी की तरह फर्श पर बैठकर भोजन साझा करने के तरीके से बहुत प्रभावित हुआ था। गुरु अर्जन देव अपने अनुयायियों के बीच बहुत प्रसिद्ध थे। उन्होंने गुरु नानक की शिक्षाओं और दर्शन के संदेश को धीरे-धीरे सिखाया और फैलाया था।

जहांगीर ने अर्जन सिंह को किया था शहीद

गुरु अर्जन सिंह जी के प्रचार के कारण सिख धर्म तेजी से फैलने लगा था। जब जहांगीर बादशाह बना तो पृथी चंद ने उसके साथ नजदीकियां बढ़ानी शुरू कर दीं। जहांगीर गुरु जी की बढ़ती लोकप्रियता को पसंद नहीं करता था। उसे यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई कि गुरु अर्जन देव जी ने उसके भाई खुसरो की मदद क्यों की थी। जहांगीर अपनी जीवनी ‘तुज़के जहांगीरी’ में स्वयं भी यह लिखता है कि वह गुरु अर्जन देव जी की बढ़ रही लोकप्रियता से आहत था, इसलिए उसने गुरु जी को शहीद करने का फैसला कर लिया। गुरु अर्जन देव जी को लाहौर में 30 मई 1606 को भीषण गर्मी के दौरान ‘यासा व सियासत’ कानून के तहत लोहे की गर्म तवे पर बिठाकर शहीद कर दिया गया। ‘यासा व सियासत’ के अनुसार किसी व्यक्ति का रक्त धरती पर गिराए बिना उसे यातनाएं देकर शहीद किया जाता है। गुरु जी के शीश पर गर्म-गर्म रेत डाली गई। जब उनका शरीर अग्नि के कारण बुरी तरह झुलस गया तब उन्हें ठंडे पानी वाले रावी दरिया में नहाने के लिए भेजा गया, जहां गुरु जी का पावन शरीर रावी में मिल गया। उसी जगह पर अर्जन सिंह जी की ज्योत समाए हुए है। लाहौर में इस स्थान पर रावी नदी के किनारे गुरुद्वारा डेरा साहिब का निर्माण किया गया है, जो अब पाकिस्तान में हैं। 1606 के बाद से 16 जून को सिखों द्वारा उनका शहीदी दिवस मनाया जाता है।

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