भारत अनेक धर्मों का देश है। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी इत्यादि कई धर्मों के लोग यहां रहते हैं। इन्हीं प्रमुख धर्मों में से एक धर्म है सिख धर्म। सिख धर्म में अब तक 10 प्रमुख गुरु रहें हैं। सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी हैं। 15 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में गुरु नानक देव जी ने पंजाब में सिख धर्म की शुरूआत की थी। जिसके बाद से ही इस धर्म के अनुयायियों को सिखों के नाम से जाना जाता है। भारत में करीब दस लाख सिख हैं और इनमें से अधिकांश पंजाब में केंद्रित हैं। सिखों के प्रमुख गुरुओं में से एक गुरु, गुरु हरगोबिन्द सिंह जी हैं। सिख पंथ के छठे धर्म-गुरु हरगोबिन्द साहिब जी का जन्म 21 आषाढ़ (वदी 6) संवत 1652 ( 19 जून, 1595) को अमृतसर के वडाली गाँव में गुरु अर्जन देव जी के घर हुआ था। गुरु हरगोबिन्द सिंह जी के जन्मोत्सव को ही ‘गुरु हरगोबिन्द जयंती’ के रूप में मनाया जाता है। इस शुभ अवसर पर गुरुद्वारों में भव्य कार्यक्रम सहित गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ किया जाता है। लाखों सिख अनुयायियों के साथ-साथ हिन्दू व अन्य धर्मों के लोग भी इस दिन गुरुद्वारों में जाकर माथा टेकते हैं। इस दिन गुरुदवारों में लंगर यानि सामूहिक भोज का भी आयोजन किया जाता है। जिसमें सभी लोग एक साथ बैठकर भोजन ग्रहण करते हैं। गुरु हरगोबिन्द सिंह जयंती हर वर्ष बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है। इस वर्ष गुरु हरगोबिन्द सिंह जयंती 5 जुलाई को है।

गुरु हरगोबिन्द सिंह जी

कौन हैं सिखों के गुरु

सिख शब्द का अर्थ होता है शिष्य है। वे अपने दस गुरुओं, जैसे गुरु अंगद (गुरु 1539-52), गुरु अमर दास (गुरु 1552-74) के शिष्य हैं वैसे ही अन्य गुरु गुरु राम दास (गुरु 1574-81), गुरु अर्जन देव (गुरु 1581-1606), गुरु हरगोबिन्द (गुरु 1606-44), गुरु हर राय (गुरु 1644-61); गुरु हरकृष्ण (गुरु 1661-64); गुरु तेग बहादुर (गुरु 1664-75) और गुरु गोबिंद सिंह (गुरु 1675-1708) को मिलाकर दस सिख गुरु हैं। गुरु हरगोबिन्द साहिब 1606 में अपने पिता गुरु अर्जन देव साहिब के शहीद हो जाने पर उत्तराधिकारी बने। उस समय उनकी आयु महज ग्यारह वर्ष थी। गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को योद्धा के रुप में भी जाना जाता है।

गुरु हरगोबिन्द सिंह जी का व्यक्तित्व

गुरु हरगोबिन्द सिंह जी केवल एक अध्यात्मिक गुरु नहीं थे बल्कि वो एक योद्धा भी थे। गुरु हरगोबिन्द सिंह जी ने सिख धर्म में वीरता की नई मिसाल पेश की। एक तलवार धर्म के लिए तथा दूसरी तलवार धर्म की रक्षा के लिए। गुरु हरगोबिन्द साहिब अपने पास दो तलवारें रखते थे जो शक्ति और भक्ति का प्रतीक थीं। एक तलवार को 'पीरी' कहा जाता था जिसकी उपयोग आध्यात्मिक, भक्ति, शांति के लिए किया जाता था। दूसरी तलवार को मिरी' कहा जाता था जिसका प्रयोग घुड़सवारी, शिकार, कुश्ती, तलवारबाजी और अन्य शक्ति प्रदर्श जैसे खेलों के लिए किया जाता था। धड-खिलाड़ी सिखों को प्रेरित करने के लिए वीर गीत गाया करते थे जिसे ‘वर्स’ कहा जाता था। इन्हीं अभ्यासों को कर के सिख एक सैन्य बल बन गए और हमेशा अपनी आजादी की रक्षा के लिए लड़ते रहे। गुरु साहिब ने सिखों में अध्यात्मिक प्रचार-प्रसार किया। साथ सिख राष्ट्र की समस्याओं पर विचार-विमर्श भी किया। गुरु हरगोबिन्द सिंह जी ने सिखों को यह जोर दिया गया कि उन्हें स्वयं अपने विवादों का हल करना चाहिए। इस शिक्षा को ग्रहण कर सिखों ने राष्ट्र को मजबूत बनाने में योगदान दिया। एक बार जहांगीर ने गुरु हरगोबिन्द साहिब को ग्वालियर के किले में बन्दी बना लिया था । इस किले में और भी कई राजा, जो मुगल सल्तनत के विरोधी थे, पहले से ही कारावास भोग रहे थे। गुरु हरगोबिन्द साहिब लगभग तीन वर्ष ग्वालियर के किले में बन्दी रहे। जहांगीर की पत्‍‌नी नूरजहां मीयांमीर की सेविका थी। इन लोगों ने भी जहांगीर को गुरु जी की महानता और प्रतिभा से परिचित करवाया। जिसके बाद जहांगीर ने केवल गुरु हरगोबिन्द जी को ही ग्वालियर के किले से आजाद नहीं किया, बल्कि उन्हें यह स्वतन्त्रता भी दी कि वे 52 राजाओं को भी अपने साथ लेकर जा सकते हैं। इसीलिए सिख इतिहास में गुरु जी को बन्दी छोड़ दाता कहा जाता है। जिसका अर्थ होता है कैद से छुड़ाने वाला।  गुरु हरगोबिन्द जयंती पर अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में समन्वय दिवस या 'गुड़गाढ़ी दिवस' का जश्न मनाने के लिए हजारों सिख आते हैं। भक्त सबसे सम्मानित स्वर्ण मंदिर के पास बने सरोवर में स्नान कर डुबकी लगाते हैं। सिख सरोवर के पानी को अमृत के समान मानते हैं।

हरगोबिन्द सिंह जयंती समारोह

गुरु हरगोबिन्द ने किरतपुर साहिब में अपने जीवन के अंतिम कुछ वर्ष बिताए और आखिर में उनके पार्थिव शरीर ने 1644 निर्वाण प्राप्त कर लिया। । गुरु हरगोबिन्द सिंह जी ने सिखों को केवल संत ही नहीं बनाया बल्कि, सैनिक-संत बनाया जो जरुरत पड़ने पर दुश्मनों का डटकर मुकाबला भी कर सकते हैं। सिखों के इसी गुण के कारण उन्हें बहादूर योद्धा भी कहा जाता है। गुरु हरगोबिन्द सिंह जी के जन्मदिवस पर जगह-जगह लंगर का आयोजन किया जाता है। गुरुद्वारों में भक्तों की लंबी कतारें होती हैं। गरीबों की सेवा करना, उन्हें दान देना इस दिन का प्रमुख उद्देश्य होता है। गुरु हरगोबिन्द साहिब जी बहुत परोपकारी योद्धा थे। उनका जीवन दर्शन जन-साधारण के कल्याण से जुडा हुआ था। यही कारण है कि उनके समय में गुरु ज्ञान राष्ट्र के कोने-कोने तक पहुंचा। गुरु हरगोबिन्द सिंह जी ने श्री गुरु ग्रन्थ साहिब के महान संदेशों को जन-जन तक पहुंचाया। लोगों में भक्ति, विश्वास व आत्मनिर्भर होने की भावना का विकास किया।

गुरु हरगोबिन्द सिंह जी
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