भारत एक उत्सवों का देश है। यहां रोज कोई न कोई उत्सव मनाया जाता है। जितने ही राज्य हैं उतनी ही भाषाएं, उतनी ही बोलियां और उतने ही त्यौहार है। भारत के राज्य जितने खूबसूरत है उतने ही यहां के त्यौहार खूबसूरत है। इन्हीं खूबसूरत राज्यों में से एक राज्य है लद्दाख और लद्दाख में मनाया जाने वाला ‘हेमिस’ उत्सव। लद्दाख भारत की सबसे सुंदर जगहों में से एक है। यह बर्फ की पहाड़ियों से ढ़का शांत शहर है। जितना ही शानदार यह शहर उतना ही अनूठा यहां का त्यौहार है ‘हेमिस’। जिसे लद्दाख के निवासी काफी धूमधाम के साथ मनाते हैं।  इस त्यौहार का आयोजन लद्दाख के सबसे बड़े बौद्ध मठ हेमिस गोम्पा में किया जाता है। प्रसिद्ध हेमिस गोम्पा चारों तरफ से पहाड़ो की चट्टानों से घिरा हुआ है।  इसका आयोजन जून या जुलाई महीने में दो दिनों के लिए किया जाता है। यह त्यौहार गुरु पद्मसम्भवा के जन्मदिवस पर उनको सम्मान देने के लिए मनाया जाता है।  भगवान पद्मसम्भवा तिब्बत में तांत्रिक बुद्धिज़्म के संस्थापक है। इस बार हेमिस उत्सव 11 से 12 जुलाई के बीच आयोजित होगा।

मुखौटा नृत्य है यहां की विशेषता

हेमिस उत्सव में लद्दाख निवासी कई तरह के आयोजन करते हैं जिनमें विशेष रुप से कला प्रदर्शनी और रंग-बिरंगी वेशभूषा एवं मुखौटे पहन कर किया जाने वाला नृत्य हैं। जो यहां सबसे ज्यादा आकर्षण का कारण है। इस त्यौहार का सबसे अच्छा भाग छाम नाम के लामा संतो द्वारा किया जाने वाला नृत्य है जो की राक्षसो, यमो की भूमिका मे सींगो के साथ मुखौटा पहन कर नाचते हैं। इसी के साथ-साथ ढोल और मंजीरा बजाकर अच्छाई की बुराई पर जीत का नाटक भी दिखाते है। लद्दाख में कई सैलानी इस नृत्य को देखने ही आते हैं। बहुत लोग इसे देखने के लिए एकत्रित होते हैं। यह माना जाता है की इससे उन्हें सौभाग्य, अच्छे स्वास्थ्य और शक्ति की प्राप्ति होगी। छामो द्वारा किया गया नृत्य तांत्रिक परम्परा का भाग है। छाम केवल मठो में ही ये कार्यक्रम करते है। वह तांत्रिक बुद्धिज्म की शिक्षाओ का अभ्यास करते हैं। यहां सबसे प्रसिद्ध व बड़ी ‘थंका’ तस्वीर है जिसे 12 साल में एक बार ही जनता के लिए प्रदर्शित किया जाता है।
गुरु पद्मसम्भवा भगवान बुद्ध के बाद दुसरे सबसे बड़े गुरु माने जाते है। यह माना जाता है कि गुरु पद्मसम्भवा ने तांत्रिक बुद्धिज़्म की मदद से सभी बुरी शक्तियों पर विजय पायी थी। तांत्रिक बुद्धिज़्म ने न केवल बुरी शक्तियों को हराया बल्कि उनको क्षेत्र के संरक्षक के रूप में भी बदला। इस प्रकार गुरु पद्मसम्भवा महत्वपूर्ण हो गए और उनके जन्म दिवस को बौद्ध समुदाय में बहुत ही जोश के साथ मनाया जाने लगा।

क्या है हेमिस का इतिहास

हेमिस 1630 में लद्दाख के एक शानदार शासक सेन्ग नामग्याल के शासनकाल के दौरान बनाया गया था। यह राजशाही के लिए नामग्याल वंश के तहत विकसित हुआ, जिसने मृदा को प्रबंधित किया और ड्रग्पा संप्रदाय का पक्ष लिया। हेमिस फेस्टिवल दो भागों में बांटा गया है, दाईं ओर असेंबली हॉल और बाईं ओर मुख्य मंदिर। त्यौहार के दौरान नर्तकियों द्वारा हॉल दुखांग का भी "ग्रीन रूम" के रूप में उपयोग किया जाता है। मंदिर को त्सोगखांग के नाम से जाना जाता है।  यहाँ के निवासी यह मानते हैं की यह त्यौहार उनके अच्छे स्वास्थ्य और धार्मिक शक्ति को बढ़ाता है। त्यौहार के कार्यक्रम मठ के मुख्य द्वार के सामने वाले परिसर में आयोजित किए जाते हैं। एक उँचे चबूतरे में गद्दे पर रंग बिरंगे तिबत्तन मेज़ को रखा जाता है जिस पर अनुष्ठानिक चीज़ें परोसी जाती हैं जैसे पवित्र जल के पात्र, कच्चे चावल, टॉरमस (आटें और मक्खन को गूंथकर बनाया गया मिश्रण) और अगरबत्तियां इत्यादि चीजें रख पूजा की जाती है। हेमिस उत्सव में कार्यक्रम में शामिल होने वाले भगवान से अच्छे जीवन की प्रार्थना करते हैं और हंसी खुशी के साथ इस उत्सव को संपन्न करते हैं।

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