होली का त्योहार भारत का प्रमुख त्योहार है। होली का नाम सुनते ही सबसे पहला नाम बरसाना का आता है। बरसाने की होली पूरे भारतवर्ष के साथ विश्व में भी प्रसिद्ध है। बरसाने की होली को लठ्मार होली कहा जाता है। आम होली में जहां रंग और गुलाल का प्रयोग कर होली खेली जाती है वहीं बरसाने में स्त्रियां पुरुषों को डंडे से मारती है और पुरुष अपना रक्षण करते हैं। बरसाना होली से जुड़ा सबसे प्रसिद्ध स्थान है। उत्तर प्रदेश के मथुरा के पास एक छोटा सा शहर बरसाना अपनी लठ्मार होली के लिए प्रसिद्ध है। यह इस रंगीन, जीवंत, शरारती त्योहार का उत्सव है, लेकिन परंपरा में शहर के पुरुषों की पिटाई शामिल है महिलाओं और पुरुषों द्वारा जवाबी कार्रवाई नहीं की जा सकती है, लेकिन केवल खुद को अच्छी तरह से सुरक्षित कर पुरुष और महिलाएं इस होली का आनंद उठाती है। यह अपनी तरह की अनूठी होली होती है जो काफी दिलचस्प हैं। 

बरसाना में लट्ठमार होली

बरसाने की महिलाएं इस दिन अपनी सबसे अच्छी सुंदर साड़ी पहनकर आती हैं और पुरुषों को "लट्ठ" या डंडों से मारती हैं। भगवान कृष्ण की साथी राधा का जन्म स्थान बरसाने को माना जाता है। चूंकी होली को भगवान कृष्ण से जोड़कर देखा जाता है इसलिए बरसाने में इस दिन का महत्व और बढ़ जाता है।  बरसाने की लट्ठमार होली फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाई जाती है। इस दिन नंदगाँव के ग्वाल बाल होली खेलने के लिए राधा रानी के गाँव बरसाने जाते हैं और विभिन्न मंदिरों में पूजा अर्चना के पश्चात  फाल्गुन शुक्ल की दशमी तिथि पर रंगों की होली खेलने आते हैं। नंदगांव के पुरुष होली खेलने बरसाना गांव में आते हैं और बरसाना गांव के लोग नंदगांव में जाते हैं। इन पुरूषों को होरियारे कहा जाता है।


बरसाना में लट्ठमार होली की किंवदंतियाँ और परंपराएँ


बरसाना में लट्ठमार होली
होली का त्योहार भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ा होता है। बरसाने में भगवान श्री कृष्ण से संबिधित होली की किंवदंतियों के अनुसार कृष्ण अपने सखाओं के साथ इसी प्रकार कमर में फेंटा लगाए राधारानी तथा उनकी सखियों से होली खेलने पहुंच जाते थे तथा उनके साथ ठिठोली करते थे जिस पर राधारानी तथा उनकी सखियां ग्वाल वालों पर डंडे बरसाया करती थीं। ऐसे में लाठी-डंडों की मार से बचने के लिए ग्वाल वृंद भी लाठी या ढ़ालों का प्रयोग किया करते थे। जो धीरे-धीरे होली की परंपरा बन गई। जिसके परिणाम स्वरुप बरसाने में हर साल लठ्मार होली का आयोजन किया जाता है। बरसाने के आस-पास के पुरुष नाचते झूमते गांव में पहुंचते हैं जिसके बाद औरतें हाथ में ली हुई लाठियों से उन्हें पीटना शुरू कर देती हैं और पुरुष खुद को ढाल से बचाते हैं। मारना-पीटना यहां खुशी का हिस्सा होता है इसमें कोई हिंसक प्रवृति नहीं होती। आस –पास के लोग इस माहोल में रंग और गुलाल को उडाकर इसे और रंगीन बना देते हैं। बरसाने की होली को देखने के लिए बड़ी संख्या में देश-विदेश से लोग बरसाना आते हैं।

 

बरसाने में होली उत्सव


बरसाने में होली उत्सव
होली के दिन बरसाना के विभिन्न मंदिरों में भगवान कृष्ण को समर्पित ब्रजभाषा में पारंपरिक संगीत और भक्ति गीत गाए जाते हैं। भक्त श्री कृष्ण की भक्ति में ओत-प्रोत होकर झूमते रहते हैं। एक-दूसरे को मिठाई बांटी जाती है। बरसाना में स्थित राधा रमण मंदिर सबसे प्रसिद्ध मंदिर है। होल का उत्सव इसी मंदिर से शुरु होता है। ब्रज की गलियाँ और सड़कें हर जगह उड़ते हुए रंग और फूलों की धाराओं में बदल जाती हैं। भक्त और आगंतुक मंदिरों में इकट्ठा होते हैं और होली की पूजा के साथ-साथ होली का जश्न मनाते हैं। मंदिरों के पुजारी रंग और पानी के साथ-साथ गुलाब और गेंदे के फूलों की माला भी पहनते हैं, सभी राधा और कृष्ण की स्तुति करते हुए भक्तों की भारी भीड़ पर पुष्पवर्षा करते हैं। यह त्यौहार सिर्फ महिलाओं द्वारा लाठी के साथ रंगों या पुरुषों के ठहराव के बारे में नहीं है, बल्कि भगवान कृष्ण में उनकी आस्था और भक्ति को भी दोहराता है। होली न केवल रंग, खुशी और उल्लास में, बल्कि विश्वास और भक्ति में आनन्दित भी होती है। प्रभु के आशीर्वाद और प्रभु के विश्वास में खुद को रंगने के लिए हर तरफ से भारी भीड़ उमड़ती है। ब्रज में होली का उत्सव वास्तव में रहस्यमय अनुभव के साथ-साथ सबसे मजेदार भरे त्योहार का आनंद लेने के लिए भी प्रसिद्ध है।

 
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