भारतीय त्योहारों में होली का बहुत महत्व है। होली भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है। होली को फाल्गुन ’या वसंत ऋतु के आगमन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है इसे फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। होली का त्योहार सर्दियों के मौसम के अंत का भी प्रतीक है। यह बहुत सारे रंग, पानी के फुहारे, और गुब्बारों के संग इस दिन को और रंगीन कर देता है। होली का त्योहार जश्न का त्योहार होता है इसलिए इस दिन विशेषरुप से खान-पान और नृत्य गायन किया जाता है।  होली का महत्व हमारे जीवन के हर पहलू में महसूस किया जाता है क्योंकि इस दिन हम अपने मतभेदों को भूल जाते हैं और त्योहार की खुशियों को साझा करने के लिए एक-दूसरे को गले लगाते हैं। भारत में होली का त्यौहार सभी के जीवन मे बहुत सारी खुशियॉ और रंग भरता है, लोगों के जीवन को रंगीन बनाने के कारण इसे आमतौर पर 'रंग महोत्सव' कहा गया है। यह लोगो के बीच एकता और प्यार लाता है।

 
होली का महत्व

इसे "प्यार का त्यौहार" भी कहा जाता है। यह एक पारंपरिक और सांस्कृतिक हिंदू त्यौहार है, जो प्राचीन समय से पुरानी पीढियों द्वारा मनाया जाता रहा है और प्रत्येक वर्ष नयी पीढी द्वारा इसका अनुकरण किया जा रहा है। होली का त्योहार भारत का एक राष्ट्रीय अवकाश है और होली का त्योहार हर वर्ग-हर उम्र के लोग, अमीर गरीब सब मनाते हैं यह किसी के भी बीच फर्क नहीं करता है। यहां  हर एक का रंगों के एकसाथ स्वागत किया जाता है। इस दिन युवा हो या बुजुर्ग, किसी को भी नहीं बख्शा जाता है, ऊपर से लेकर पैर तक हर जगह रंग दिया जाता है। आधुनिक स्थायी रंगों के साथ-साथ कई पारंपरिक और हर्बल रंगों का उपयोग आज होली के अवसर पर किया जाता है। यह ऐसा त्यौहार है जिसे लोग अपने परिवार के सदस्यो और रिश्तेदारों के साथ प्यार और स्नेह वितरित करके मनातें हैं जो उनके रिश्तों को भी मजबूती प्रदान करता हैं। यह एक ऐसा त्यौहार हैं जो लोगों को उनके पुराने बुरे व्यवहार को भुला कर रिश्तों की एक डोर मे बॉधता हैं। होली का हर रंग एक विशेष संदेश देकर जाता है।


होली का पौराणिक महत्व

होलिका दहन

फरवरी अंत या मार्च की शुरुआत में होली दो दिनों के लिए मनाई जाती है। होली मनाने के पीछे इसका पौराणिक महत्व भी है। पौराणिक कथा के अनुसार, शक्तिशाली राजा हिरण्यकश्यप था, वह खुद को भगवान मनाता था और चाहता था कि हर कोई भगवान की तरह उसकी पूजा करें। वहीं अपने पिता के आदेश का पालन न करते हुए हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रहलाद ने उसकी पूजा करने से इंकार कर दिया और उसकी जगह भगवान विष्णु की पूजा करनी शुरू कर दी। इस बात से नाराज हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रहलाद को कई सजाएं दी जिनसे वह प्रभावित नहीं हुआ। इसके बाद हिरण्यकश्यप और उसकी बहन होलिका ने मिलकर एक योजना बनाई की वह प्रहलाद के साथ चिता पर बैठेगी। होलिका के पास एक ऐसा कपड़ा था जिसे ओढ़ने के बाद उसे आग में किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुंचता, दूसरी तरह प्रहलाद के पास खुद को बचाने के लिए कुछ भी न था। जैसे ही आग जली, वैसे ही वह कपड़ा होलिका के पास से उड़कर प्रहलाद के ऊपर चला गया। इसी तरह प्रहलाद की जान बच गई और उसकी जगह होलिका उस आग में जल गई। यही कारण है होली का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व आस्था और विश्वास का प्रतीक है।


होली का सांस्कृतिक महत्व

होली का सांस्कृतिक महत्व

होली का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न भी मनाया। बुराई, अहंकार, इच्छाओं और नकारात्मकता को जलाने वाले रंगों के त्योहार से पहले हर साल शाम को एक पवित्र अलाव जलाया जाता है। होली बंधन, मित्रता, एकता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का त्योहार है। शाम का समय वह समय होता है जब अलाव की रोशनी से बुराई के खत्म होने का संकेत मिलता है। अगली सुबह रंगों से खेलने का दिन है, दोस्ती और खुशी का जश्न मनाते हैं, जिसमें बहुत सारे गायन और नृत्य शामिल हैं।


होली का धार्मिक महत्व

होली का धार्मिक महत्व

होली का धार्मिक महत्व भी है। होली में रंगों के साथ खेलने का महत्व भगवान कृष्ण से जुड़ा है, जो गहरे रंग के थे और अपनी माँ से शिकायत करते थे कि सभी गोपियाँ और राधा का रंग गोरा है फिर वो क्यों सांवले हैं। गोपियाँ कृष्ण का मज़ाक उड़ाती थीं, इसलिए उनकी माँ ने उनसे कहा कि वे  गोपियों और राधा को अपने मनचाहे रलग में रंग सकते हैं।इस तरह होली पर रंगों से खेलने की परंपरा चली आ रही है। यह मजेदार और जीवंत होली एक बहुत प्रसिद्ध परंपरा है जो भगवान कृष्ण के लिए प्रसिद्ध मथुरा वृंदावन में ब्रज और होली समारोह में मनाई जाती है।

 

कैसे मनाते हैं होली

होलिका दहन के दिन एक पवित्र अग्नि जलाई जाती जिसमें सभी तरह की बुराई, अंहकार और नकरात्म उर्जा को जलाया जाता है। अगले दिन, लोग अपने प्रियजनों को रंग लगाकर त्योहार की शुभकामनाएं देते हैं साथ ही नाच, गाने और स्वादिष्ट व्यंजनों के साथ इस पर्व का मजा लेते हैं।  यह एक ऐसा दिन है जब सभी पुरुष और महिला स्वतंत्र रूप से एक दूसरे को रंग देते हैं। यह 'क्षमा करने और भूलने का दिन' है, इस दिन सब पुराने गिले-शिकवे, लड़ाई-झगड़े भुला कर दोस्ती नए सिरे से शुरु करते हैं।  यह पारंपरिक पेय का आनंद लेने का समय भी होता है। दूध से बने पारंपरिक पेय और होली पर इसका सेवन किया जाता है। इसे कई स्थानों पर स्वागत पेय या प्रसाद के रूप में भी परोसा जाता है। गुझिया, लड्डू, पकोड़े, हलवा और पूड़ी इत्यादि जैसी शानदार मिठाइयाँ और व्यंजन इस उत्सव का एक अभिन्न हिस्सा होंते हैं क्योंकि कोई भी भारतीय त्यौहार भोजन के भव्य प्रसार के बिना अधूरा होता है।

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