भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक होली जिसे आम तौर पर लोग 'रंगो का त्योहार' भी कहते हैं। हिंदू पंचांग के मुताबिक फाल्गुन माह में पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। देश के दूसरे त्योहारों की तरह होली को भी बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। होली को प्रेम व भाईचारे के रंग प्रतिक भी माना जाता हैं साथ ही होली का धार्मिक महत्व भी बहुत अधिक है। होली को मनाने की परंपरा कब शुरू हुई इसके ऐतिहासिक व प्रामाणिक साक्ष्य तो नहीं मिलते लेकिन होली के मनाने के पिछे जो कारण हैं, उन से जुड़ी कथाएं हिंदू धर्म ग्रंथों में जरूर मिलती हैं। होली से जुड़ी कई किंवदंतियाँ हैं, जो इस त्योहार को और अधिक रंगीन बनाती हैं। होली का त्योहार भारत में वर्षों से मनाया जा रहा है और इन सभी किंवदंतियों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक आगे बढ़ाया गया है। हर होली के साथ, हम बुराई पर अच्छाई की जीत की कहानियो को सुनाते हैं और उसका अनुसरण करते हैं। होली नाने का इतिहास हमारे पुराणों और इतिहासों में साफ-साफ देखने को मिलता है। होली के साथ कई प्राचीन पौराणिक कथाएं भी जुड़ी हैं और हर कथा अपने आप में विशेष है। 

होली की पौराणिक कथाएँ


राजा हिरण्यकश्यप और भक्त प्रह्लाद की होलिका दहन की कथा

राजा हिरण्यकश्यप और भक्त प्रह्लाद की कथा

होली के पर्व की की क कथाएं हैं लेकिन जो सबसे प्रचलित कथा है वह है भक्त प्रह्लाद और राजा हिरण्यकश्चप की जिस कथा को मुख्यतः होलिका दहन से जोड़ा जाता है। कथा के अनुसार हरिण्यकश्यपु दैत्यराज था उसने कठोर तपस्या कर देवताओं से यह वरदान प्राप्त कर लिया कि वह न धरती पर मरेगा न आसमान, न दिन में मरेगा न ही रात में, न अस्त्र से होगी हत्या न शस्त्र से,  न मरेगा बाहर न मरेगा घर में, न मार सकेगा पशु,नर कोई उसे नही मार सकेगा। यह वरदान पाकर वह खुद को अमर समझने लगा और अत्याचार करने लगा, वह खुद को भगवान कहने लगा और लोगों को उसे भगवान मानने पर मजबूर करने लगा।  ऐसे में उसके स्वयं के पुत्र प्रह्लाद ने उसे भगवान ना मानकर भगवान विष्णु का स्मरण किया और उसके खिलाफ हो गया। हरिण्यकश्यपु से यह बर्दाश्त नहीं हुआ उसने प्रह्लाद को अनेक यातानाएं दी लेकिन भगवान उसकी हर घड़ी मदद की। हरिण्यकश्यपु की बहन होलिका जिसके पास एक चादर थी जिसे ओढ़ने के बाद उसे अग्नि जला नहीं सकती थी उसने कहा कि वो प्रहलाद को लेकर अग्नि में बैठेगी जिससे प्रहलाद जल जाएगा और वरगान स्वरुप अग्नि उसे जला नहीं पाएगी। जिसके बाद होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाती है किन्तु भगवान अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा करते हैं होलिका के पास वरदान होने के बाद बी वो अग्नि में जल जाती है और भक्त प्रहलाद का बाल भी बांका नहीं हो पाता। जिससे बुराई पर अच्छाई की जीत होती है। इस प्रकार होली का यह त्यौहार बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है। होलिका दहन होली से एक दिन पूर्व संध्या में किया जाता है।

राधा कृष्ण की कथा

राधा-कृष्ण की होली कथा

होली का त्योहार हो और भगवान कृष्ण का नाम ना हो ऐसा संभव नहीं है। कृष्ण से जुड़ी कथा के अनुसार कृष्ण जब छोटे थे तब उनको खत्म करने के इरादे से विष से भरी राक्षसी पूतना ने अपना दूध पिला दिया था। जिसके कारण भगवान श्री-कृष्ण का रंग गहरा नीला हो गया था। अपने रंग से खुद को अलग महसूस करने पर श्री-कृष्ण को लगने लगा कि उनके इस रंग की वजह से न तो राधा और न ही गोपियां उन्हें पसंद करेंगी। उनकी परेशानी देखकर माता यशोदा ने उन्हें कहा कि वह जाकर राधा को अपनी पसंद के रंग से रंग दें और भगवान कृष्ण ने माता की यह सलाह मानकर राधा पर रंग डाल दिया। राधा और कृष्ण का दिव्य प्रेम। बसंत में एक-दूसरे पर रंग डालना श्रीकृष्ण लीला का ही अंग माना गया है। -कृष्ण और राधा के एक-दूसरे पर रंग डालने के बाद से ही रंगो का त्यौहार होली को उत्सव के रुप में मनाया जाने लगा। जिसके बाद से ब्रज में लोग होली दिव्य प्रेम के उपलक्ष्य में मनाते हैं।

पूतना की कथा

पूतना की कथा


कृष्ण और होली से जुड़ी एक एक अन्य किंवदंती कहती है कि एक बार पूतना नामक राक्षसी ने कृष्ण को अपना दूध पिलाकर मारने की कोशिश की। कहते हैं जब कंस के लिये यह आकाशवाणी हुई कि गोकुल में उसे मारने वाले ने जन्म ले लिया है तो कंस ने उस दिन पैदा हुए सारे शीशुओं को मरवाने का निर्णय लिया। इस काम के लिये उसने पुतना राक्षसी को चुना। पुतना बच्चों को स्तनपान करवाती जिसके बाद वे मृत्यु को प्राप्त हो जाते थे लेकिन जब उसने श्री कृष्ण को मारने का प्रयास किया तो के कृष्ण ने पूतना के दूध को इतनी तीव्रता से चूसा कि उसने अपने जीवन से दानव को निकाल दिया। इसलिए, होली का सबसे बड़ा उत्सव मथुरा में होता है जहाँ कृष्ण के साथ यह घटना घटी। राक्षसी पूतना की मृत्यु के बाद, मथुरा के लोग आज तक इस त्योहार में शाम को अलाव जलाकर इसका जश्न मनाते हैं।

शिव-पार्वती और कामदेव की कथा

 शिव-पार्वती और कामदेव की कथा

होली मनाने के पीछे भगवान शिव और कामदेव से जुड़ी कथा भी बहुत प्रचलित है। दक्षिण भारतीय क्षेत्रों में लोग होली का त्यौहार पूरी दुनिया को बचाने के लिये भगवान शिव के ध्यान भंग करने के भगवान कामदेव के बलिदान के उपलक्ष्य में मनाते हैं। कथा के अनुसार पत्नी सती ने अपने पिता द्वारा पति शिव का अपमान किए जाने से अग्नि मे स्वंय को समर्पित कर के स्वंय को खत्म कर दिया तो भगवान शिव बहुत व्याकुल और निराश हो गए वो इसके बाद ध्यान में बैठ गए। उन्होंने सृष्टि के कल्याण से मुख मोड़ लिया, सब कुछ त्याग कर अलग हो गए।  हिमालय पुत्री पार्वती चाहती थीं कि उनका विवाह भगवान शिव से हो लेकिन शिव अपनी तपस्या में लीन थे।  जिसके बाद किसी राक्षस के वध के लिए शिव-पुत्र की आवश्यकता थी, किन्तु महादेव गहरी समाधी में लीन थे, इसलिए उन्हें जगाने के लिए देवताओं की प्रार्थना पर कामदेव ने अपना पुष्प बाण भगवान शिव पर चला दिया, जिससे उनकी तपस्या भंग हो गयी। अपनी तपस्या भंग होने के कारण शिवजी के क्रोध का कहर कामदेव पर बरपा, उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोल दी। जिसने अपनी ज्वाला से कामदेव को राख कर दिया। पार्वती की आराधना सफल हो जाती है और शिवजी उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लेते हैं। बाद में, कामदेव की पत्नी ने शिव से अपने पति को वापस लाने की प्रार्थना की और उन्होंने उनके अनुरोध को स्वीकार कर लिया और उन्हें जीवन में वापस ले आईं। होली की आग में वासनात्मक आकर्षण को प्रतीकत्मक रूप से जला कर सच्चे प्रेम के विजय के उत्सव में मनाया जाता है।  दक्षिण भारतीय क्षेत्रों में लोग होली का त्यौहार पूरी दुनिया को बचाने के लिये भगवान शिव के ध्यान भंग करने के भगवान कामदेव के बलिदान के उपलक्ष्य में मनाते हैं। दक्षिण भारत में, होली पर लोग अपने बलिदान के लिए प्रेम देवता, कामदेव की पूजा करते हैं।

 

त्रेता युग में विष्णुजी की धूलि वंदन कथा

विष्णुजी की धूलि वंदन कथा

त्रेतायुग दूसरा युग था जिसमें अधर्म का नाश करने के लिए भगवान विष्णु ने तीन अवतार लिए थे, जो क्रमशः वामन अवतार, परशुराम अवतार और श्रीराम अवतार के नाम से हिंदू धर्म ग्रंथों में वर्णित हैं। जानकारी की मानें तो इस युग के प्रारंभ में विष्णु भगवना ने धूलि वंदन किया था, जिसका अर्थ यह है कि ‘उस युग में विष्णु जी ने अलग-अलग तेजोमय रंगों से अवतार कार्य का आरंभ किया। चूंकि होली भी रंगों का त्यौहार है, इसलिए इस कथा से जोड़कर होली को एक तेजोत्सव के रूप में भी देखा जाता है।

 
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