भारत हमेशा से एक धर्मनिरपेक्ष देश होने के साथ-साथ सांस्कृतिक धरोहर भी रहा है। जहां एक साथ विभिन्न संस्कृतियां निवास करती है। यहां हर धर्म, संस्कृति, रीति-रिवाज एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि सभी लोग यहां प्रेम, भाईचारे के साथ एक-दूसरे के साथ रहते हैं। यहां मनाए जाने वाला हर त्यौहार आपस में एक होना सिखाता है और सभी को खुशी देता है। ऐसे ही पवित्र त्यौहारो में से प्रमुख है रमज़ान यानि ईद-उल-फितर। भारत में इस वर्ष यह 5 जून को मनाया जाएगा।  
ईद उल-फितर
रमज़ान के महीने को इबादत का महीना कहा जाता है। इस दौरान बंदगी करने वाले हर शख्स की ख्वाहिश अल्लाह पूरी करता है। इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक नवां महीना रमज़ान का होता है। इसमें सभी मुस्लिम समुदाय के लोग एक महीना रोज़ा रखते हैं। इस साल रमज़ान की शुरुआत 17 मई से हुई है।

क्यों मनाया जाता है रमज़ान

रमज़ान का इतिहास- रमज़ान इस्‍लाम कैलेंडर का नवां महींना होता है। रमज़ान का मतलब होता है प्रखर। सन् 610 में लेयलत उल-कद्र के मौके पर जब मुहम्‍मद साहब को कुरान शरीफ के बारे में पता चल, तभी इस महीने को पवित्र माह के रूप में मनाया जाने लगा। लिहाजा रमज़ान को कुरान के जश्न का भी मौका माना जाता है।

क्या होता है रमज़ान

रमज़ान एक अरेबिक शब्द है। ये अरेबिक के रमीदा और रमद शब्द से मिलकर बना है। इसका मतलब चिलचिलाती गर्मी और सूखापन होता है। रमज़ान के दौरान मुस्लिम समुदाय के लोग पूरे एक महीने व्रत(रोज़ा) रखते हैं। इस्लाम में रोज़ा को फर्ध(ईश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता जाहिर करना) माना गया है। अल्लाह की इबादत या ईश्वर की उपासना वैसे तो किसी भी समय की जा सकती है। उसके लिये किसी विशेष दिन की जरुरत नहीं होती लेकिन सभी धर्मों में अपने आराध्य की पूजा उपासना, व्रत उपवास के लिये कुछ विशेष त्यौहार मनाये जाते हैं। रमज़ान का महीना खुदा के करीब होने का सबसे अच्छा समय होता है। यही वो महीना होता है जब व्यक्ति अपने सब पापों से दूर होकर साफ मन से खुदा से जुड़ता है। लेकिन खुदा के करीब होने का रास्ता इतना भी आसान नहीं है खुदा भी बंदों की परीक्षा लेता है। जो उसकी कसौटी पर खरा उतरता है उसे ही खुदा की नेमत नसीब होती है। इसलिए ईस्लाम में खुदा की इबादत के लिये रमज़ान के पाक महीने को महत्व दिया जाता है। ईस्लाम में आस्था रखने वाले लोग नियमित रूप से नमाज़ अदा करने के साथ-साथ रोज़े यानि कठोर उपवास (इसमें बारह घंटे तक पानी की एक बूंद तक नहीं लेनी होती) रखे जाते हैं। हालांकि अन्य धर्मों में भी उपवास रखे जाते हैं लेकिन ईस्लाम में रमज़ान के महीने में यह उपवास लगातार तीस दिनों तक चलते हैं। कभी-कभी यह उपवास 30 या 29 दिन के भी होते हैं। इस्लामी कैलेंडर  के अनुसार हर साल रमज़ान  में 10 दिन कम होते जाते हैं वहीं आग्रेंजी कैलेंडर के अनुसार यह 10 दिन पहले आता है। ।  महीने के अंत में चांद के दिदार के साथ ही पारण यानि कि उपवास को खोला जाता है।

शिया और सुन्नी की अलग है मान्यता

आमतौर पर शिया और सुन्नी दोनों ही रमज़ान एक जैसे ही मनाते हैं, लेकिन दोनों के तरीकों में थोड़ा फर्क होता है। मसलन सुन्नी समुदाय के लोग अपना रोज़ा सूरज छिपने पर खोलते हैं। वहीं शिया पूरी तरह से अंधेरा होने के बाद रोज़ा खोलते हैं।

कुछ परिस्थिति में रोज़ा ना रखने की होती है इज़ाजत

यूं तो  रमज़ान के महीने में हर मुस्लिम व्यक्ति रोज़ा रख अपने खुदा को याद कर सकता है। लेकिन कुछ परिस्थितियों जैसे बीमार होना, यात्रा करना, गर्भावस्था में होना ,मासिक धर्म से पीड़ित होना एवं बुजुर्ग होने पर रोज़ा ना रखने की छूट होती है।

कैसा होता है रोज़ा

रमज़ान में रोज़ा किया जाता है जिसे अल्लाह की इबादत भी कहते हैं।  रोज़े के दौरान रोज़ेदार पूरे दिन बिना कुछ खाए-पिए रहते हैं। हर दिन सुबह सूरज उगने से पहले थोड़ा खाना खाया जाता है। इसे सुहूर (सेहरी) कहते हैं, जबकि शाम ढलने पर रोज़ेदार जो खाना खाते हैं उसे इफ्तार कहते हैं।

रोज़ेदार हर रोज खजूर खाकर रोज़ा तोड़ते हैं। एक इस्लामिक साहित्य के मुताबिक अल्लाह के एक दूत को अपना रोज़ा खजूर से तोड़ने की बात लिखी गई है। इसी के आधार पर सभी रोज़ेदार खजूर खाकर सेहरी एवं इफ्तार मनाते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी खजूर खाने के फायदे हैं। खजूर लीवर, पेट की दिक्कत व कमजोरी जैसी अन्य बीमारियों को ठीक करता है, इसलिए रोज़ेदार इसे खाते हैं।
रमज़ान के दौरान खास दुआएं पढ़ी जाती हैं। हर दुआ का समय अलग अलग होता है। दिन की सबसे पहली दुआ को फज्र कहते हैं। जबकि रात की खास दुआ को तारावीह कहते हैं।

रमज़ान में बुराई की होती है मनाही

रमज़ान के दौरान रोज़ेदारों को बुरी सौहबतों से दूर रहना चाहिए, उन्हें न तो झूठ बोलना चाहिए, न पीठ पीछे किसी की बुराई करनी चाहिए और न ही लड़ाई झगड़ा करना चाहिए। इस्लामिक पैगंबरों के मुताबिक ऐसा करने से अल्लाह की रहमत मिलती है।
रोज़ा यानी संयम। आप कितना संयम बरत सकते हैं, इस बात की परीक्षा इस दौरान होती है। तमाम बुराइयों से दूर रहना चाहिये। गलत या बुरा नहीं बोलना, आंख से गलत नहीं देखना, कान से गलत नहीं सुनना, हाथ-पैर तथा शरीर के अन्य हिस्सों से कोई नाजायज़ अमल नहीं करना।
रोज़े के दौरान किसी भी स्‍त्री को गलत नियत से नहीं देखना चाहिए। इस बात की सख्त मनाही होती है। यहां तक अपनी पत्नी तक को नहीं। पत्‍नी के लिये मन में कामवासना नहीं जागनी चाहिये। गैर औरत के बारे में तो ऐसा सोचना ही हराम है।
रोज़े में दिन भर भूखा व प्यासा ही रहा जाता है, जिससे इन्सान में एक वक्ती कमज़ोरी आ जाती है और वह किसी भी हैवानी काम के विषय में नहीं सोचता, शोर नहीं मचाता, हाथापाई नहीं करता इत्यादि। जिस स्‍थान पर ऐसा हो रहा हो, वहां रोज़ेदार के लिए खड़ा होना मना है।
रोज़े के वक्‍त झूठ नहीं बोलना चाहिये। हिंसा, बुराई, रिश्वत तथा अन्य तमाम गलत कामों से दूर रहना चाहिये। इसकी मश्क यानी (अभ्यास) पूरे एक महीना कराया जाता है ताकि इंसान पूरे साल तमाम बुराइयों से बचे और इंसान से हमदर्दी का भाव रखे। शराब का सेवन इस्‍लाम में हराम है। रमज़ान पाक में के दौरान इसके अलावा भी कोई भी नशा सिगरेट, बीड़ी, तम्‍बाकू, आदि हराम है।

रोज़े में करना चाहिए नेक काम

रमज़ान के माह में मुसलमान के हर नेक अमल यानी पुण्य के कामों का सबाव 70 गुना बढ़ा दिया जाता है। 70 गुना अरबी में मुहावरा है, जिसका मतलब होता है बेशुमार। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अपने पुण्य के कामों में अधिक से अधिक हिस्सा लेना चाहिये। दान पुण्‍य करें ज़कात इसी महीने में अदा की जाती है। यदि कोई व्यक्ति अपने माल की ज़कात इस महीने में निकालता है तो उसको 1 रुपये की जगह 70 रुपये अल्लाह की राह में देने का पुण्य मिलता है।
रमज़ान के दौरान पूरे महीने कुरान पढ़ना चाहिए। पैगंबरों के मुताबिक कुरान को इस्लाम के पांच स्तम्भों में से एक माना गया है। रोज़े के वक्त कुरान पढ़ने से खुदा बंदों के गुनाह माफ करते हैं और उनके लिए जन्नत का दरवाजा खोलते हैं।
रमज़ान के वक्त रोज़ेदारों को दरियादिली दिखानी चाहिए, उन्हें दान(जकात) देना चाहिए। इससे उन्हें सबाब(पुण्य) मिलेगा। कई लोग इस दौरान मस्जिदों में मुफ्त में लोगों को खाना खिलाते हैं। जबकि कई लोग जरूरतमंदों को जरूरी सामान भी बांटते हैं।

रमज़ान के बाद मनाते हैं ईद-उल-फितर

रमज़ान का महीना खत्म होने के साथ ही ईद का त्यौहार मनाया जाता है। वैसे तो दान-दक्षिणा जिसे जकात कहा जाता है रोज़े रखने के दौरान भी दी जाती है लेकिन ईद के दिन नमाज से पहले गरीबों में फितरा बांटा जाता है जिस कारण ईद को ईद-उल-फितर कहा जाता है। भारत में महिलाएं ईद से पहले हाथों में मेंहदी भी लगवाती है। ईद को शवाल(चंद्र मास) का पहला दिन भी कहते हैं। इस दिन सभी रोज़ेदार नए कपड़े पहनकर मस्जिदों और ईदगाह में जाते हैं।  वहां वे रमज़ान का आखिरी नमाज पढ़कर खुदा का शुक्रिया अदा करते हैं, साथ ही एक दूसरे को गले मिलकर बधाई देते हैं। ईद के दिन ईदी काफी प्रसिद्ध है। खासतौर पर बच्चों को ईदी दी जाती है जिसका उद्देश्य जरुरतमंदो की मदद करना भी होता है। इसी हंसी-खुशी के साथ ईद का त्यौहार मनाया जाता है।

दुनिया भर में मनाया जाता है  ईद उल-फितर

ईद केवल भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में अलग-अलग ढंग से मनाया जाता है। यदि सबसे अच्छा ईद उत्सव देखना चाहते हैं, तो सऊदी अरब में देखें। ईद के दिन यहां लोग पूरी तरह से ईद मनाने में व्यस्त होते हैं। कई दुकानदार  तो प्रत्येक खरीदारी के साथ मुफ्त उपहार प्रदान करते हैं।  जबकि कुछ अजनबियों को नए खिलौने  भी देते हैं। इतना ही नहीं, इस समय आपको सऊदी अरब का दौरा क्यों करना चाहिए, इसकी एक पुरानी परंपरा भी है। जिसके अनुसार कुछ क्षेत्रों में, परिवार के पुरुष बड़े पैमाने पर स्टेपल और चावल खरीदते हैं और अज्ञात लोगों के दरवाजे पर जाते हैं। बड़े पैमाने पर खाना बनाकर अजनबी पड़ोसियों के साथ उसे साझा करते हैं।
तुर्की में यह दिन बेरम के नाम से भी प्रसिद्ध है। लोग सुबह की प्रार्थनाओं के बाद अपने प्रियजनों का सम्मान करने के लिए कब्रिस्तान जाते हैं। तुर्की में यह तीन दिवसीय त्यौहारके रुप में मनाया जाता है जहां बुजुर्गों का दांया हाथ इच्छा रखते हुए सर झुका कर चूमा जाता है। इस दिन अधिकारिक अवकाश भी होता है। वहीं, दक्षिण अफ्रीका  के ट्यूनीशिया में, पड़ोसियों को देने के लिए विशेष बिस्कुट तैयार किए जाते हैं।

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