देश को आजादी यूं हीं नहीं मिली है। कितने ही वीरों और निर्दोषों ने अपनी जान की कुर्बानी देकर हमें आजदी दिलाई है। भारत में 1947 से पहले लगभग 200 सालों तक ब्रिटिश हुकुमत रही। जिसके अत्याचारों से तंग आकर और भारत को आजाद कराने के हेतु कितने ही वीर शहीद हुए। अस आजादी की लड़ाई में कई बार निर्दोष जनता को भी बलि की भेंट चढ़ना परा। किन्तु आजादी की जो सबसे बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है वो था जलियावाला बाग हत्याकांड। 13 अप्रैल को देश भर में वैसाखी का त्यौहार बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है, वैसाखी का त्योहार यूं तो पूरे भारत में मनाया जाता है किन्तु यह पंजाब का प्रसिद्ध त्योहार है। जो सिख गुरु गोबिंद के समक्ष नव वर्ष आरंभ होने के लिए मनाते हैं। लेकिन 1919 का जलियांवाला बाग़ काण्ड भी इसी दिन से जुड़ा हुआ है, जिसने समूचे भारत को हिला कर रख दिया था। 1919 मे जब पंजाब में वैसाखी का त्योहार मनाया जा रहा था उसी वक्त एक ऐसा हादसा हुआ जिसने लोगों की निंद उड़ा कर रख दी। यह हादसा था जलियावाला बाग हत्याकांड। जलियांवाला बाग अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के पास का एक छोटा सा बगीचा है, जहां 13 अप्रैल 1919 को ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर के नेतृत्व में अंग्रेजी फौज ने गोलियां चला के निहत्थे, शांत बूढ़ों, महिलाओं और बच्चों सहित सैकड़ों लोगों को मौत को घाट उतार दिया और हज़ारों लोगों को घायल कर दिया था। यदि किसी एक घटना ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर सबसे अधिक प्रभाव डाला था, तो वह घटना यह जघन्य हत्याकाण्ड ही था। इसी घटना की याद में यहां पर स्मारक बना हुआ है। इस वर्ष जलियावाला बाग हत्याकांड को 100 वर्ष भी पूरे हो रहें हैं। इस वर्ष जलियावाला हत्याकांड की बरसी 13 अप्रैल शनिवार को मनाई जाएगी।

जलियावाला बाग हत्याकांड

जलियावाला बाग हत्याकांड का इतिहास


जलियावाला बाग हत्याकांड का काला इतिहास आज भी किसी से छिपा नहीं है। भारत के इतिहास में इस दिन को काले दिवस के रुप में भी याद दिया जाता है। भारत की आजादी की लड़ाई यूं आसान नहीं थी। सन् 1919 ई. में भारत की ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट एक्ट का शांतिपूर्वक विरोध करने पर जननेताओं को पहले ही गिरफ्तार कर लिया था। इस गिरफ्तारी की निंदा करने और पहले हुए गोली कांड की भर्त्सना करने के लिए 13 अप्रैल, 1919 ई. को बैशाखी के दिन शाम को क़रीब साढ़े चार बजे अमृतसर के जलियाँवाला बाग में एक सभा का आयोजन हुआ। हालांकि शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था, फिर भी इसमें सैंकड़ों लोग ऐसे भी थे, जो आस-पास के इलाकों से बैसाखी के मौके पर परिवार के साथ मेला देखने और शहर घूमने आए थे और सभा की खबर सुन कर वहां जा पहुंचे थे।
सभा के शुरू होने तक वहां 10-15 हजार लोग जमा हो गए थे।इस सभा में 20,000 व्यक्ति इकट्ठे हुए थे। दूसरी ओर डायर ने उस दिन साढ़े नौ बजे सभा को अवैधानिक घोषित कर दिया था। सभा में डॉक्टर किचलू एवं सत्यपाल की रिहाई एवं रौलट एक्ट के विरोध में भाषणवाजी की जा रही थी। गांधी जी तथा कुछ अन्य नेताओं के पंजाब आने पर प्रतिबंध लगे होने के कारण वहाँ की जनता में बड़ा आक्रोश व्याप्त था। यह आक्रोश उस समय और अधिक बढ़ गया, जब पंजाब के दो लोकप्रिय नेता डॉक्टर सत्यपाल एवं सैफ़ुद्दीन किचलू को अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर ने बिना किसी कारण के गिरफ्तार कर लिया। इसके विरोध में जनता ने एक शान्तिपूर्ण जुलूस निकाला। पुलिस ने जुलूस को आगे बढ़ने से रोका और रोकने में सफल ना होने पर आगे बढ़ रही भीड़ पर गोलियाँ चला दी, जिसके परिणामस्वरूप दो लोग मारे गये। जुलूस ने उग्र रूप धारण कर लिया। सरकारी इमारतों को आग लगा दी गई और इसके साथ ही पांच अंग्रेज़ भी जान से मार दिये गए। अमृतसर शहर की स्थिति से बौखला कर ब्रिटिश सरकार ने 10 अप्रैल, 1919 ई. को शहर का प्रशासन सैन्य अधिकारी ब्रिगेडियर जनरल डायर को सौंप दिया। उसने 12 अप्रैल को कुछ गिरफ्तारियाँ भी कीं और कड़ी कार्यवाही करवायी। इस दिन रविवार था और आस-पास के गांवों के अनेक किसान हिंदुओं तथा सिक्खों का उत्सव बैसाखी बनाने अमृतसर आए थे। यह बाग़ चारों ओर से घिरा हुआ था। अंदर जाने का केवल एक ही रास्ता था। जनरल डायर ने अपने सिपाहियों को बाग़ के एकमात्र तंग प्रवेश मार्ग पर तैनात किया था। बाग़ साथ-साथ सटी ईंटों की इमारतों के पिछवाड़े की दीवारों से तीन तरफ से घिरा था। डायर ने बिना किसी चेतावनी के 50 सैनिकों को गोलियाँ चलाने का आदेश दिया और चीख़ते, आतंकित भागते निहत्थे बच्चों, महिलाओं, बूढ़ों की भीड़ पर 10-15 मिनट में 1650 गोलियाँ दाग़ दी गईं। जिनमें से कुछ लोग अपनी जान बचाने की कोशिश करने में लगे लोगों की भगदड़ में कुचल कर मर गए। अचानक चारों और से गोली चलते देख जलियावाला बाग में खड़ी भीड़ इधर उधर भागने लगी। आने जाने का एक ही रास्ता होने के कारण और उसे भी बंद कर दिए जाने के कारण बाग में मौजूद एक कुएं में ही लोग अपनी जान बचाने के लिए कूदने लगे। कूएं के अंदर से तकरीबन 107 लाशें बरामद हुईं थी।, जिससे इस बात का अन्दाजा आसानी से लागाया जा सकता है कि यह हत्याकांड कितना खूंखार रहा होगा। नेताओं के भाषणों और आजादी की लड़ाई का शिकार इन मासूम जनता को होना पड़ा। इस नरसंहार में करीब अनाधिकृत आंकड़े के अनुसार 1000 से भी ज्यादा लोग मारे गए थे। इस बर्बरता ने भारत में ब्रिटिश राज की नींव हिला दी। 1000 तो सिर्फ सरकारी आकंड़े थे। नरसंहार तो इससे भी ज्यादा लोगों का हुआ था। ब्रिटिश शासन कहीं बाकी लोगों पर भी ऐसा ही जुर्म ना कर दे इसलिए बहुत से लोगों ने अपने रिश्तेदारों तक को पहचानने से मना कर दिया। इतिहास की दृष्टि से यह सबसे बड़ा हत्याकांड था। इस हत्याकांड में हंसराज नाम के एक व्यक्ति ने डायर को सहयोग दिया था।

हत्याकांड पर डायर का तर्क

जलियावाला बाग नरसंहार करने के बाद मुख्यालय वापस पहुंच कर डायर ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सूचित किया कि उस पर भारतीयों की एक फ़ौज ने हमला किया था जिससे बचने के लिए उसको गोलियां चलानी पड़ी। ब्रिटिश लेफ्टिनेंट गवर्नर मायकल ओ डायर ने उसके निर्णय को अनुमोदित कर दिया। इसके बाद गवर्नर मायकल ओ डायर ने अमृतसर और अन्य क्षेत्रों में मार्शल लॉ लगा दिया। जनरल डायर ने अपनी कार्रवाई को सही ठहराने के लिए तर्क दिये और कहा कि- "नैतिक और दूरगामी प्रभाव के लिए यह ज़रूरी था। इसलिए मैंने गोली चलवाई।" डायर ने स्वीकार कर कहा कि- "अगर और कारतूस होते, तो फ़ायरिंग ज़ारी रहती।" निहत्थे नर-नारी, बालक-वृद्धों पर अंग्रेज़ी सेना तब तक गोली चलाती रही, जब तक कि उनके पास गोलियाँ समाप्त नहीं हो गईं। इस हत्याकाण्ड की विश्वव्यापी निंदा हुई जिसके दबाव में सेक्रेटरी ऑफ स्टेट एडविन मॉंटेग्यु ने 1919 के अंत में इसकी जांच के लिए हंटर कमीशन नियुक्त किया। कमीशन के सामने ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर ने स्वीकार किया कि वह गोली चलाने का निर्णय पहले से ही ले चुका था और वह उन लोगों पर चलाने के लिए दो तोपें भी ले गया था जो कि उस संकरे रास्ते से नहीं जा पाई थीं। हंटर कमीशन की रिपोर्ट आने पर 1920 में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर को पदावनत कर कर्नल बना दिया गया और उसे भारत में पोस्ट न देने का निर्णय लिया गया। भारत में डायर के खिलाफ बढ़ते गुस्से के चलते उसे स्वास्थ्य कारणों के आधार पर ब्रिटेन वापस भेज दिया गया। इस बर्बर हत्याकाण्ड के बाद 15 अप्रैल को पंजाब के लाहौर, गुजरांवाला, कसूर, शेखपुरा एवं वजीराबाद में 'मार्शल लॉ' लागू कर दिया गया, जिसमें लगभग 298 व्यक्तियों को गिरफ्तार कर अनेक तरह की सजायें दी गयीं। भारतीय सदस्य शंकर नायर ने इस हत्याकाण्ड के विरोध में वायसराय की कार्यकारिणी परिषद से इस्तीफा दे दिया "जलियांवाला बाग़ हत्याकाण्ड का विरोध जताते हुए गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 'सर' की उपाधि लौटा दी थी। इस हत्याकांड को आज भी जलियांवाला बाग़ स्मृति-दिवस के रूप में स्मरण किया जाता है। इस दिन शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। उनके बलिदान को याद किया जाता है।

जलियावाला बाग हत्याकांड
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