पश्चिम बंगाल की भूमि पर मनाया जाने वाला केंडुली मेला एक ऐसा आयोजन है जो आज इस भीड़ भाड़ भरी ज़िन्दगी और हार्ड रॉक संगीत के दौर में असल संगीत है, ऐसा संगीत जो आपका मन मोह लेने का एहसास कराता है।इस साल इस मेले का आयोजन 14 से 16 जनवरी के बीच किया जा रहा है। पश्चिम बंगाल के बीरभूम पर बाउल समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला ये मेला अपने आप में ख़ास होता है।
रात्रि में संन्यासी-अखाड़ों का एक दृश्य

कहा जाता है कि संगीत ही बाउल समुदाय के लोगों का धर्म है। इस समुदाय के ज्यादातर लोग या तो हिन्दू वैष्णव समुदाय से ताल्लुक रखते हैं या फिर मुस्लिम सूफ़ी समुदाय से। बाउल संगीत का मुख्य उद्देश्य अलग अलग जाति, समुदाय धर्म के लोगों को एक कर उनमें एकता का संचार करना है| बीरभूम जिसे स्थानीय भाषा में लाल माटिर देश (लाल मिट्टी की भूमि ) कहा जाता है, में चलने वाला ये उत्सव हर साल जनवरी में मनाया जाता है। इस दौरान यहां के स्थानीय लोग जगह जगह जा के इन लोक गीतों को गाते हैं जैसा कि हम बता चुके हैं इन लोक गीतों को गाने का प्रमुख उद्देश्य लोगों के बीच एकता का संचार करना होता है।

बाउल समुदाय और संगीत

संगीत की दुनिया बहुत ही विस्तृत और बेहद विशाल है, और आज संगीत के माध्यम से प्यार का इजहार करने के बहुत सारे तरीके भी मौजूद हैं। बात अगर संगीत पर हो और ऐसे में हम लोक संगीत पर बात न करें तो फिर ये सारी बातें अधूरी रह जाती हैं। लोक संगीत में प्रेम की सच्ची भावना लाना अपने आप में एक कला है। कहा जाता है कि इस कला के स्वामी कुछ चुनिंदा ही लोग होते हैं। लोक संगीत या लोकगीत अत्यंत प्राचीन एवं मानवीय संवेदनाओं के सहजतम उद्गार हैं। इसका प्रसारण लेखनी के द्वारा नहीं अपितु मौखिक रूप से बोलकर या गाकर होता है।आपको बताते चलें कि लोकगीतों में धरती गाती है, पर्वत गाते हैं, नदियां गाती हैं, फसलें गाती हैं। उत्सव, मेले और अन्य अवसरों पर मधुर कंठों में लोक समूह लोकगीत गाते हैं। लोकगीत प्रकृति के उद्गार होते हैं। साहित्य की छंदबद्धता एवं अलंकारों से मुक्त रहकर ये मानवीय संवेदनाओं के संवाहक के रूप में माधुर्य प्रवाहित कर हमें तन्मयता के लोक में पहुंचा देते हैं।लोकगीतों के विषय, सामान्य मानव की सहज संवेदना से जुडे हुए हैं।इन गीतों में प्राकृतिक सौंदर्य, सुख-दुःख और विभिन्न संस्कारों और जन्म-मृत्यु को बड़े ही खूबसूरत अंदाज में प्रस्तुत किया जाता है।

बाउल गायक

मजे कि बात ये है कि बाउल समुदाय के इन लोक गायकों को पहचानना बड़ा आसान होता है, ये गायक भगवा वस्त्र धारण किये हुए होते हैं और इनके बाल बड़े होते हैं और ये उनमें जूड़ा बांधते हैं। ये लोक गायक हमेशा तुलसी की माला और हाथों में इकतारा लिए हुए होते हैं। इन लोगों का मुख्य व्यवसाय भी संगीत है, ये लोक एक स्थान से दूसरे स्थान घूम घूम के लोक गीत गाते हैं और उससे प्राप्त पैसों से गुज़र बसर करते हैं। केंडुली मेले के ही दौरान ये सभी लोग अपनी भूमि पर जमा होते हैं और बड़े ही हर्ष और उल्लास के साथ अपना ये खूबसूरत पर्व मानते हैं| बाउल संगीत जहां एक तरफ कर्णप्रिय है तो वहीँ दूसरी तरफ इसकी ये भी खासियत है कि ये किसी भी ऐसे व्यक्ति का मन मोह सकता है जो संगीत से दूर भागता हो।

गौरतलब है कि इस समुदाय से ताल्लुख रखने वाली लोकप्रिय गायिका पार्वती बाहुल ने आज यहां के स्थानीय लोक गीतों को विश्व मानचित्र पर प्रस्तुत किया है|

मेले का इतिहास

पश्चिम बंगाल स्थित शांति निकेतन से 42 किलोमीटर दूर मनाये जाने वाले इस त्योहार का इतिहास बड़ा रोमांचक है। इस पर्व का आयोजन बीरभूम के जयदेव केंडुली में होता है इस स्थान का नाम एक लोकप्रिय बंगाली कवि जयदेव के नाम पर पड़ा। बताया जाता है कि किसी ज़माने में बीरभूम बाउल गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। बाद में यहां के लोग त्रिपुरा बिहार ओडिशा के अलावा बांग्लादेश चले गए और वहां जा के अपनी कला और संस्कृति का प्रचार और प्रसार किया।बहरहाल आज बिना बाउल समुदाय के पश्चिम बंगाल की कला सभ्यता और संस्कृति पर बात करना अधूरा है क्योंकि इस समुदाय से बहुत कुछ मिला है बंगाल की संस्कृति को।

कैसे पहुँचे ?

सड़क मार्ग-बीरभूम, सड़क मार्ग से राष्‍ट्रीय राजमार्ग 2बी और 2 से कोलकाता तक अच्‍छी तरह जुड़ा हुआ है। यह मुर्शिदाबाद से 70 किमी. की दूरी पर स्थित है।

रेल मार्ग-कोलकाता रेलवे स्‍टेशन, बीरभूम के लिए सबसे नजदीकी रेलवे स्‍टेशन है जहां देश भर के सभी शहरों के लिए ट्रेन चलती है।

वायु मार्ग-बीरभूम का नजदीकी एयरपोर्ट, कलकत्‍ता एयरपोर्ट है। यहां के देश के अन्‍य भागों के लिए फ्लाइट आसानी से मिल जाती है।

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