मध्यप्रदेश के छतरपुर ज़िले का यह रमणीक स्थल खजुराहो के नाम से दुनिया भर में प्रसिद्ध है। पर्यटकों के लिए यह कौतहूल का नज़ारा है। देश-विदेश में खजुराहों की सुंदरता के किस्से फैले हुए हैं। जंगलों के पीछे बसे पहाड़, उनमें झांकती झीले, महकती वादियां एक अलग ही आत्मियता और सुंदरता का एहसास कराती हें। पत्थरों से बनी सुंदर प्रतिमाएं जो जीवित प्रतीत होती हैं, यही तो खजुराहो की पहचान है। जो दूर-दूर से पर्यटोकों को खींचे ले आती हैं। खजुराहो चंदीला राजवंश की धार्मिक राजधानी थी, जो मध्य भारत के सबसे शक्तिशाली राजपूत राजवंशों में से एक था। खजुराहो आज भी अपने मन मोह लेने वाले मोहक मंदिरों के साथ-साथ पौराणिक नृत्य महोत्सव के लिए भी प्रसिद्ध है। पिछले 43 सालों से प्रत्येक वर्ष खजुराहों में शास्त्रीय नृत्य महोत्सव का आयोजन बड़े ही शानदार ढंग से किया जाता है। तब से अब तक निरंतर नृत्य की आहटें खजुराहो की ओर सारी दुनिया का ध्यान आकर्षित करती हैं। मंदिर की पृष्ठभूमि में नृत्य का सम्मेलन एक अनोखे कलात्मक आनंद की अनुभूति कराता है। समारोह के समन्वयक यह मानते हैं कि नृत्यों का यह समारोह, ख़ासकर विदेशी कला प्रेमियों के लिए भारतीय संस्कृति को समझने का प्रवेश द्वार है।

खजुराहो नृत्य महोत्सव

खजुराहो नृत्य आयोजित करने का इतिहास

दरअसल खजुराहो नृत्य समारोह को स्थापित करने के पीछे दो-तीन दृष्टियां काम कर रही थीं। एक तो यह वह समय था जब मध्य प्रदेश को सांस्कृतिक संसार बनाने की शुरुआत हो रही थी। तब भोपाल महोत्सव की परम्परा शुरू हुई और तानसेन समारोह को नया स्वरूप दिया गया। खजुराहो नृत्य के पीछे नज़रिया यह था कि मध्य प्रदेश की इस विश्व धरोहर को इसी अर्थ में बड़े प्रभाव के साथ लोक प्रचारित किया जाए। दूसरा यह कि खजुराहो व नृत्य का आत्मिक संबंध है, इसलिए वहां कुछ करना इतिहास को रूपाकार देने का प्रयास था। तीसरी बात यह कि इतनी बड़ी विश्व सम्पदा को देखने, और उसके संरक्षण-विस्तार आदि के लिए समाज में जागृति बढ़े तथा हिन्दुस्तान की नृत्य शैलियां देश-विदेश के कला प्रेमियों के सामने प्रकट हो सके। यह नृत्य समारोह पहले मंदिर परिसर में होता था। बाद में यह महसूस किया कि वहां होने से, रौशनी आदि से मंदिर को क्षति पहुंच सकती है। मंदिर के संरक्षण की चिंता देश-विदेश में हुई। खजुराहो में मंदिर के ऊपर से वायुयान गुजरते थे तो कंपन मंदिरों के लिए नुकसानदेह होती थी इसलिए इसे अब मदिंर के बाहर आयोजित किया जाता है। शुरूआत के कुछ वर्षों में ही यह देश का सबसे प्रतिष्ठापूर्ण समारोह बन गया। यह एक ऐसा मंच है जहां कोई भी कलाकार प्रस्तुति दे सकता है और अपनी कला को दुनिया के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है। लम्बे समय तक विशेषज्ञों की चयन समिति के कारण नृत्य चयन लगभग निर्विवाद रहा। दुर्भाग्य से अब कलाकारों के चयन पर राजनैतिक और प्रशासनिक दबाव भी हावी हों रहे हैं।

कैसा होता है खजुराहो नृत्य महोत्सव

खजुराहों नृत्य महोत्सव एक ज़रिया है भारतीय संस्कृति को बढ़ाने का, दुनिया को भारतीय शास्त्रीय नृत्य से रुबरु कराने का। यह सांस्कृतिक त्यौहार विभिन्न भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैलियों जैसे कथक, भारत्नाट्यम, ओडिसी, कुचीपुडी, मणिपुरी और कथकली जैसी महान नृत्य शैलियों को प्रदर्शित करता है। इसके अलावा, क्षेत्र में कुछ बेहतरीन घाटियों के प्रदर्शन भी हैं। पारंपरिक शास्त्रीय नृत्य रूपों के अलावा, आधुनिक भारतीय नृत्य ने भी अब इसमें जगह बना ली है। नृत्य के विभिन्न रूप एक खुले हवा के सभागार में किए जाते हैं, जो आमतौर पर चित्रगुप्त मंदिर जो सूर्य भगवान को समर्पित है, और विश्वनाथ मंदिर जो भगवान शिव समर्पित है उनके सामने आयोजित किया जाता है। सप्ताह भर लंबे इस महोत्सव के दौरान देश के हर हिस्से से लोकप्रिय शास्त्रीय नृत्य के कलाकारों को आमंत्रित किया जाता हैं। देश-विदेश से आए प्रसिद्ध कलाकारों के साथ-साथ कई कारीगर अपनी कलाओं को प्रदर्शित करते हैं। यहां शिल्प कला अधिक प्रचलित है। इसके अलावा, स्थानीय लेखों की बिक्री के लिए भी यह मंच खुला है। खजुराहो नृत्य महोत्सव खजुराहो मंदिरों की सांस्कृतिक विरासत को मनाने, आगामी पीढ़ी को उनसे परिचित कराने एवं उन्हें संरक्षित करने के लिए आयोजित किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि शास्त्रीय नृत्य हिंदू मंदिरों से निकला है वहीं इसको परिपक्वता प्राप्त हुई है। यह सांस्कृतिक त्यौहार भारतीय कला-नृत्य और संगीत को प्रोत्साहित करने के लिए मनाया जाता है, जो एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी तक चलाया जा सके। यह प्रतिवर्ष फाल्गुन माह(फरवरी के महीने) में आयोजित होता है।

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