भारत में वैसे तो कई त्यौहार, उत्सव एवं मेले आए दिन मनाए जाते हैं। लेकिन सभी मेलों का जो मेला और सभी पर्वों का जो पर्व है वो है कुंभ मेला। कुंभ मुख्यतः चार स्थानों पर लगता है जिनमें से एक हरिद्वार है। हरिद्वार को हिंदुओं के सात सबसे पवित्र स्थानों में से एक माना जाता है। उत्तराखंड का क्षेत्र हरिद्वार जिले एक महत्वपूर्ण तीर्थयात्रा है। इसे देवताओं का घर भी कहा जाता है। आज, शहर उत्तराखंड के राज्य औद्योगिक विकास निगम (एसआईडीसीयूएल) की तेजी से विकासशील औद्योगिक संपत्ति के साथ आर्थिक और धार्मिक विकास कर रहा है। हरिद्वार की भूमि सबसे पवित्र भूमि मानी जाती है क्योंकि यहां गंगा स्थित है। गंगा में स्नान करने के लिए भक्त दूर-दूर से हरिद्वार आते हैं ताकि इसमें डूबकी लगाकर अपने पापों से मुक्त हो पाएं। उज्जैन, प्रयाग (इलाहाबाद), हरिद्वार और नासिक चार स्थल है जो कुंभ मेला की मेजबानी करते है, और लाखों हिंदू तीर्थयात्रियों को आकर्षित करते है। परम्परागत रूप से हिंदुओं का मानना है कि किसी भी कुंभ मेले में पवित्र गंगा या अन्य पवित्र नदियो में तीन डुबकी लगाने से कोई भी पूर्व, वर्तमान और भविष्य के जन्मो के सभी पापों को धो कर, जन्म पुनर्जन्म और मृत्यु के आवागमन चक्र से मुक्त हो सकता है। शास्त्रो के अनुसार कुम्भ मेले में सभी तीर्थयात्रियों को जीवन में शुभता, पवित्रता और मोक्ष भावना आत्मसात करने का मौका मिलता है। कुंभ पर्व हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें करोड़ों श्रद्धालु कुंभ पर्व स्थल हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में स्नान करते हैं। इनमें से प्रत्येक स्थान पर प्रति बारहवें वर्ष और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ भी होता है। खगोल गणनाओं के अनुसार यह मेला मकर संक्रांति के दिन प्रारम्भ होता है, जब सूर्य और चन्द्रमा, वृश्चिक राशी में और वृहस्पति, मेष राशी में प्रवेश करते हैं। मकर संक्रांति के होने वाले इस योग को "कुम्भ स्नान-योग" कहते हैं और इस दिन को विशेष मंगलिक माना जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस दिन पृथ्वी से उच्च लोकों के द्वार इस दिन खुलते हैं और इस प्रकार इस दिन स्नान करने से आत्मा को उच्च लोकों की प्राप्ति सहजता से हो जाती है। यहाँ स्नान करना साक्षात स्वर्ग दर्शन माना जाता है। कुंभ मेला किसी स्थान पर लगेगा यह राशि तय करती है। ज्योतिष परंपराओं में कुंभ पर्व को कुंभ राशि एवं कुंभ योग से जोड़ा गया है। कुंभ योग विष्णुपुराण के अनुसार चार तरह के हैं। जब गुरू मेष राशि चक्र में प्रवेश करता है और सूर्य, चन्द्रमा मकर राशि में माघ अमावास्या के दिन होते हैं, तब कुंभ का आयोजन प्रयाग में किया जाता है। सूर्य एवं गुरू सिंह राशि में प्रकट होने पर कुंभ मेले का आयोजन नासिक (महाराष्ट्र) में गोदावरी नदी के मूल तट पर लगता है। उज्जैन में सूर्य और गुरु सिंह राशि आने पर यहाँ महाकुंभ मेले का आयोजन किया जाता है। जब गुरू कुंभ राशि में होता है और सूर्य मेष राशि में प्रविष्ट होता है, तब कुंभ पर्व हरिद्वार में लगता है। नक्षत्रों, ग्रहों और राशियों के संयोग से इस कुम्भ यात्रा का योग 6 और 12 वर्षो में इन स्थानों पर बनता है। अर्द्ध कुम्भ का पर्व केवल, प्रयाग और हरिद्वार में ही मनाया जाता है। ग्रह और राशियों के संगम के अनुसार इन स्थानों पर स्नान करना मोक्ष दायी माना जाता है। हरिद्वार का सम्बन्ध मेष राशि से है। कुंभ राशि में बृहस्पति का प्रवेश होने पर एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर कुंभ का पर्व हरिद्वार में आयोजित किया जाता है। हरिद्वारऔर प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का भी आयोजन होता है। हरिद्वार में अगला कुंभ वर्ष 2022 में लगेगा।
हरिद्वार कुंभ मेला

कुंभ क्या है?

कलश को कुंभ कहा जाता है। कुंभ का अर्थ होता है घड़ा। इस पर्व का संबंध समुद्र मंथन के दौरान अंत में निकले अमृत कलश से जुड़ा है। देवता-असुर जब अमृत कलश को एक दूसरे से छीन रह थे तब उसकी कुछ बूंदें धरती की तीन नदियों में गिरी थीं। जहां जब ये बूंदें गिरी थी उस स्थान पर तब कुंभ का आयोजन होता है। उन तीन नदियों के नाम है:- गंगा, गोदावरी और क्षिप्रा है। कुंभ के ही एक भाग को अर्धकुंभ भी कहा जाता है। अर्ध का अर्थ है आधा। हरिद्वार और प्रयाग में दो कुंभ पर्वों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ का आयोजन होता है। पौराणिक ग्रंथों में भी कुंभ एवं अर्ध कुंभ के आयोजन को लेकर ज्योतिषीय विश्लेषण उपलब्ध है। कुंभ पर्व हर 3 साल के अंतराल पर हरिद्वार से शुरू होता है। हरिद्वार के बाद कुंभ पर्व प्रयाग नासिक और उज्जैन में मनाया जाता है। प्रयाग और हरिद्वार में मनाए जानें वाले कुंभ पर्व में एवं प्रयाग और नासिक में मनाए जाने वाले कुंभ पर्व के बीच में 3 सालों का अंतर होता है। यहां माघ मेला संगम पर आयोजित एक वार्षिक समारोह है। कुंभ मेले का इतिहास कम से कम 850 साल पुराना है। माना जाता है कि आदि शंकराचार्य ने इसकी शुरुआत की थी, लेकिन कुछ कथाओं के अनुसार कुंभ की शुरुआत समुद्र मंथन के आदिकाल से ही हो गई थी। मंथन में निकले अमृत का कलश हरिद्वार, इलाहबाद, उज्जैन और नासिक के स्थानों पर ही गिरा था, इसीलिए इन चार स्थानों पर ही कुंभ मेला हर तीन बरस बाद लगता आया है। 12 साल बाद यह मेला अपने पहले स्थान पर वापस पहुंचता है। जबकि कुछ दस्तावेज बताते हैं कि कुंभ मेला 525 बीसी में शुरू हुआ था। वैदिक और पौराणिक काल में कुंभ तथा अर्धकुंभ स्नान में आज जैसी प्रशासनिक व्यवस्था का स्वरूप नहीं था। कुछ विद्वान गुप्त काल में कुंभ के सुव्यवस्थित होने की बात करते हैं। परन्तु प्रमाणित तथ्य सम्राट शिलादित्य हर्षवर्धन 617-647 ई। के समय से प्राप्त होते हैं। बाद में श्रीमद आघ जगतगुरु शंकराचार्य तथा उनके शिष्य सुरेश्वराचार्य ने दसनामी संन्यासी अखाड़ों के लिए संगम तट पर स्नान की व्यवस्था की।

हरिद्वार कुंभ का महत्व

उत्तराखण्ड के चारों धामों, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री एवं यमुनोत्री के लिये प्रवेश द्वार के रूप में प्रसिद्ध हरिद्वार ज्योतिष गणना के आधार पर ग्रह नक्षत्रों के विशेष स्थितियों में हर बारहवें वर्ष कुम्भ के मेले का आयोजन किया जाता है। मेष राशि में सूर्य और कुम्भ राशि में बृहस्पति होने से हरिद्वार में कुम्भ का योग बनता है। हरिद्वार भी तीन अन्य महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों के लिए प्रवेश द्वार के रूप में खड़ा है: ऋषिकेश, बद्रीनाथ और केदारनाथ। उज्जैन, नासिक और इलाहाबाद के साथ शहर चार स्थलों में से एक है जहां अमृत की बूंद गिरी थी। हरिद्वार में हर 12 साल कुंभ मेला में मनाया जाता है। हरिद्वार कुंभ मेले में लाखों तीर्थयात्रियों, भक्तों और पर्यटक गंगा नदी के तट पर अनुष्ठान स्नान करने के लिए एवं मोक्ष प्राप्त करने के लिए तथा अपने पापों को धोने के लिए एकत्रित होते हैं। यह दुनिया भर के किसी भी धर्म में सबसे बड़ा धार्मिक मेला है जहां कई जगहों से बड़ी संख्या में लोग इकट्ठे होते हैं और इस विशेष दिन पर अन्य सभी नदियों के किनारे भी विभिन्न अनुष्ठान करते हैं। यह त्योहार हिंदुओं के लिए धार्मिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण है। हर कुंभ अवसर पर, लाखों हिंदुओं ने समारोह में भाग लिया है। हरिद्वार में 2003 में कुंभ के दौरान 10 लाख से अधिक भक्त इकट्ठे हुए थे। भारत के सभी कोनों से संन्यासी, पुजारी और योगी कुंभ में भाग लेने के लिए एकत्र हुए। हरिद्वार को बहुत ही पवित्र माना जाता है, इस तथ्य के कारण कि गंगा यहां से पहाड़ों से मैदानों में प्रवेश करती है। इस त्योहार पर पूरे भारत के सभी आश्चर्यजनक संतों द्वारा दौरा किया जाता है। नागा साधु एक ऐसे हैं, जो कभी भी कोई कपड़ा नहीं पहनते है और राख में लिप्त रहते हैं। इन लंबे बाल वाले नागाओं पर भीषण सर्दी और गर्मी को कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। उर्द्धवावाहुर्रस वो लोग हैं जो शरीर को तप से निकालने में विश्वास करते हैं। पारिवाजक वो लोग हैं जो चुप्पी साधे रहते हैं और लोगों को अपने रास्तों से बाहर निकालने के लिए घंटियों का प्रयोग करते हैं। सिरसासिन वो लोग हैं जो 24 घंटे सर के बल खड़े होकर तप करते हैं। कल्प वासी वे लोग हैं जो दिन में तीन बार स्नान करते हैं और पुरे कुंभ के दौरान गंगा के किनारों पर समय बिताते हैं। यह माना जाता है कि कुंभ के दौरान स्नान करना सभी पापों और बुराइयों का इलाज करता है और मोक्ष प्रदान करता है। यह भी माना जाता है कि कुंभ योग के समय गंगा का पानी सकारात्मक ऊर्जा से भरा होता है और कुंभ के समय जल सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति की सकारात्मक विद्युत चुम्बकीय विकिरणों से भरा होता है। कुंभ मेला के शुभ अवसर पर पवित्र नदी में स्नान करना भारत में लाखों लोगों के लिए एक और सबसे महत्वपूर्ण गतिविधि है। हर की पौरी, परवाह घाट, सुभाष घाट, गौ घाट जैसे स्नान घाट इस शुभ अवसर के दौरान लाखों भक्त स्नान करते हैं। हरिद्वार में कुंभ मेला सभी भारतीय तीर्थयात्राओं की सूची के शीर्ष पर आता है, इसलिए इस स्थान पर मीडिया और पर्यटक यातायात द्वारा असाधारण कवरेज खाते हैं। इस स्थान को हिंदू धर्म के पौराणिक ग्रंथों में स्वर्ग के लिए प्रवेश द्वार के रूप में नामित किया गया है। कुम्भ मेला की गणना करने की प्रक्रिया में सूर्य, बृहस्पति और चंद्रमा की स्थिति जानने की आवश्यकता होती है। हरिद्वार में अगला महा कुंभ मेला 2022 में आयोजित किया जाएगा।

हरिद्वार अवलोकन

उत्तराखंड का क्षेत्र हरिद्वार एक पवित्र स्थल है। इस देव भूमि कहा जाता है। हरिद्वार या हरद्वार कहलाने के पीछे यह धारणा रही है कि इस पवित्र स्थान से उत्तराखंड के विभिन्न शैव और वैष्णव तीर्थों की यात्रा शुरु होती है। इस क्षेत्र में शैव तीर्थों में केदारनाथ और वैष्णव तीर्थों में बद्रीनाथ प्रमुख है। शिव को हर नाम और विष्णु को हरि नाम से भी जाना जाता है। हरिद्वार, उत्तराखण्ड के हरिद्वार जिले का एक पवित्र नगर तथा हिन्दुओं का प्रमुख तीर्थ है। यह नगर निगम बोर्ड से नियंत्रित है। यह बहुत प्राचीन नगरी है। हरिद्वार हिन्दुओं के सात पवित्र स्थलों में से एक है। ३१३९ मीटर की ऊंचाई पर स्थित अपने स्रोत गोमुख (गंगोत्री हिमनद) से २५३ किमी की यात्रा करके गंगा नदी हरिद्वार में मैदानी क्षेत्र में प्रथम प्रवेश करती है, इसलिए हरिद्वार को 'गंगाद्वार' के नाम से भी जाना जाता है; जिसका अर्थ है वह स्थान जो एक मान्यता के अनुसार वह स्थान जहाँ पर अमृत की बूंदें गिरी थीं उसे हर की पौड़ी पर ब्रह्म कुण्ड माना जाता है। 'हर की पौड़ी' हरिद्वार का सबसे पवित्र घाट माना जाता है और पूरे भारत से भक्तों और तीर्थयात्रियों के जत्थे त्योहारों या पवित्र दिवसों के अवसर पर स्नान करने के लिए यहाँ आते हैं। यहाँ स्नान करना मोक्ष प्राप्त करवाने वाला माना जाता है। यही कारण है कि शैव और वैष्णव तीर्थयात्राओं प्रवेश द्वार होने से पुरातन काल से ही यह हरिद्वार या हरद्वार नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसी स्थान पर आकर ही परम पवित्र गंगा नदी पहाड़ों से उतरकर मैदानों में अपनी पवित्रता के साथ फैल जाती है। इस प्रकार हरिद्वार परम ब्रह्म के अलग-अलग स्वरुपों के उपासना स्थलों तक पहुंचने और ईश्वर को पाने का प्रवेश द्वार है। जब कुम्भ राशि में बृहस्पति और मेष राशि में सूर्य प्रवेश करता है, तब यहां पर कुंभ स्नान का योग बनता है। जिसमें स्नान करने पर हर व्यक्ति मोक्ष को पाता है। अर्द्धकुंभ - धार्मिक महत्व के समागम में एक अवसर है अर्द्धकुंभ का यह प्रत्येक कुंभ के छ: वर्ष बाद होता है। हरिद्वार का इतिहास बहुत ही समृद्ध और प्राचीन है। पौराणि‍क कथाओं के अनुसार हरिद्वार को मायापुरी, मोक्षद्वार, कपिलस्थान और गंगाद्वार के नाम से भी जाना जाता हैं। यह उत्तराखंड के पवित्र चारधाम यात्रा का प्रवेश द्वार भी हैं। हरिद्वार भगवान शिव और भगवान विष्णु की भूमि भी है, इसलिए इसका नाम “गेटवे ऑफ़ द गॉड्स” है। यह पवित्र शहर भारत की जटिल संस्कृति और प्राचीन सभ्यता का खजाना हैं। हरिद्वार शिवालिक पहाडियों के कोड में बसा हुआ हैं। यह भी कहा जाता है कि, पौराणिक समय में जब समुन्द्र मंथन हुआ था तब अमृत की कुछ बुँदे हरिद्वार में भी गिरी थी। इसी कारण हरिद्वार में कुम्भ का मेला भी आयोजित किया जाता हैं। 12 वर्षों में मनाये जाने वाला “कुम्भ के मेले ” के कारण भी हरिद्वार एक महत्वपूर्ण स्थान हैं। हरिद्वार मे गंगा नदी और कई तीर्थ स्थल होने से वहां पर धार्मिक महत्व बहुत ज्यादा हैं। यहाँ आने वालों का मन एक दम पवित्र और शांत हो जाता हैं। यहाँ पर गंगाजी मैदानों में प्रवेश करती हैं। हरिद्वार का अर्थ "हरि (ईश्वर) का द्वार" होता है। हरिद्वार नाम भी उत्तर पौराणिक काल में ही प्रचलित हुआ है। महाभारत में इसे केवल 'गंगाद्वार' ही कहा गया है। पुराणों में इसे गंगाद्वार, मायाक्षेत्र, मायातीर्थ, सप्तस्रोत तथा कुब्जाम्रक के नाम से वर्णित किया गया है। प्राचीन काल में कपिलमुनि के नाम पर इसे 'कपिला' भी कहा जाता था। ऐसा कहा जाता है कि यहाँ कपिल मुनि का तपोवन था। 'पैड़ी' का अर्थ होता है 'सीढ़ी'। कहा जाता है कि राजा विक्रमादित्य के भाई भर्तृहरि ने यहीं तपस्या करके अमर पद पाया था। भर्तृहरि की स्मृति में राजा विक्रमादित्य ने पहले पहल यह कुण्ड तथा पैड़ियाँ (सीढ़ियाँ) बनवायी थीं। इनका नाम 'हरि की पैड़ी' इसी कारण पड़ गया।यही 'हरि की पैड़ी' बोलचाल में 'हर की पौड़ी' हो गया है। ह्वेनसांग भी सातवीं शताब्दी में हरिद्वार आया था और इसका वर्णन उसने 'मोन्यु-लो' नाम से किया है। मोन्यू-लो को आधुनिक मायापुरी गाँव समझा जाता है जो हरिद्वार के निकट में ही है। प्राचीन किलों और मंदिरों के अनेक खंडहर यहाँ विद्यमान हैं। हरिद्वार का शांत वातावरण देखकर भगवान की भक्ति में लीन हो जाने का मन करता है। यहां बहती शांत गंगा नदी जिसमें हर वर्ष कई श्रद्धालु यहाँ आकर स्नान करते हैं और ऐसा माना जाता है कि, यहाँ डूबकी लगाने से सारे पाप धुल जाते हैं। गंगा नदी में स्नान करना मोक्ष को पाने जैसा माना जाता हैं। हरिद्वार में बहुत सारे मंदिर और आश्रम हैं और यहाँ पर मन को बहुत सुकून मिलता हैं।

कुंभ मेले की पौराणिक कथा

कुंभ मेले की पौराणिक कथा के अनुसार एक बार इन्द्र देवता ने महर्षि दुर्वासा को रास्ते में मिलने पर जब प्रणाम किया तो दुर्वासाजी ने प्रसन्न होकर उन्हें अपनी माला दी, लेकिन इन्द्र ने उस माला का आदर न कर अपने ऐरावत हाथी के मस्तक पर डाल दिया। जिसने माला को सूंड से घसीटकर पैरों से कुचल डाला। इस पर दुर्वासाजी ने क्रोधित होकर इन्द्र की ताकत खत्म करने का श्राप दे दिया। तब इंद्र अपनी ताकत हासिल करने के लिए भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव से संपर्क किया, जिन्होंने उन्हें विष्णु भगवान की प्रार्थना करने की सलाह दी, तब भगवान विष्णु ने क्षीरसागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी। भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर संपूर्ण देवता दैत्यों के साथ संधि करके अमृत निकालने के यत्न में लग गए। समुद्र मंथन के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी और नागराज वासुकि को रस्सी बनाया गया। जिसके फलस्वरूप क्षीरसागर से पारिजात, ऐरावत हाथी, उश्चैश्रवा घोड़ा रम्भा कल्पबृक्ष शंख, गदा धनुष कौस्तुभमणि, चन्द्र मद कामधेनु और अमृत कलश लिए धन्वन्तरि निकलें। सबसे पहले मंथन में विष उत्पन्न हुआ जो कि भगवान् शिव द्वारा ग्रहण किया गया। जैसे ही मंथन से अमृत दिखाई पड़ा,तो देवता, शैतानों के गलत इरादे समझ गए, देवताओं के इशारे पर इंद्र पुत्र अमृत-कलश को लेकर आकाश में उड़ गया। समझौते के अनुसार उनका हिस्सा उनको नहीं दिया गया तब राक्षसों और देवताओं में 12 दिनों और 12 रातों तक युद्ध होता रहा। इस तरह लड़ते-लड़ते अमृत पात्र से अमृत चार अलग-अलग स्थानों पर गिर गया, जिन स्थानो पर अमृत गिरा, वो स्थान थे। इलाहाबाद, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन। तब से, यह माना गया है कि इन स्थानों पर रहस्यमय शक्तियां हैं, और इसलिए इन स्थानों पर कुंभ मेला लगता है। उस समय चंद्रमा ने घट से प्रस्रवण होने से, सूर्य ने घट फूटने से, गुरु ने दैत्यों के अपहरण से एवं शनि ने देवेन्द्र के भय से घट की रक्षा की। कलह शांत करने के लिए भगवान ने मोहिनी रूप धारण कर यथाधिकार सबको अमृत बाँटकर पिला दिया। इस प्रकार देव-दानव युद्ध का अंत किया गया। देवताओं के 12 दिन, मनुष्यों के 12 साल के बराबर हैं, इसलिए इन पवित्र स्थानों पर प्रत्येक 12 वर्षों के बाद कुंभ मेला लगता है। अमृत प्राप्ति के लिए देव-दानवों में परस्पर बारह दिन तक निरंतर युद्ध हुआ था। देवताओं के बारह दिन मनुष्यों के बारह वर्ष के तुल्य होते हैं। अतएव कुंभ भी बारह होते हैं। उनमें से चार कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और शेष आठ कुंभ देवलोक में होते हैं, जिन्हें देवगण ही प्राप्त कर सकते हैं, मनुष्यों की वहाँ पहुँच नहीं है। जिस समय में चंद्रादिकों ने कलश की रक्षा की थी, उस समय की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं, उस समय कुंभ का योग होता है अर्थात जिस वर्ष, जिस राशि पर सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का संयोग होता है, उसी वर्ष, उसी राशि के योग में, जहाँ-जहाँ अमृत बूँद गिरी थी, वहाँ-वहाँ कुंभ पर्व होता है।

हरिद्वार कैसे पहुंचे

हरिद्वार पवित्र गंगा के तट पर स्थित है और उत्तरांचल की चार तीर्थयात्राओं के प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करता है। यह शहर परिवहन के सभी उपलब्ध तरीकों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है, जो भक्तों को इस पवित्र तीर्थ यात्रा में जाने में मदद करता है।

हवाईजहाज द्वारा

हरिद्वार पहुंचने के लिए निकटतम हवाई अड्डा देहरादून की जॉली ग्रांट हवाई अड्डा है, जो लगभग 45 किलोमीटर दूर स्थित है। वहां से, कोई भी आसानी से बस पकड़ सकता है या पवित्र शहर तक पहुंचने के लिए कार भी ले सकता है।

ट्रेन द्वार
हरिद्वार शहर का अपना रेलवे स्टेशन हरिद्वार ही है, जो इसे जोड़ता है, यह भारत के सभी प्रमुख शहरों जैसे दिल्ली, मुंबई और यहां तक कि कोलकाता भी जोड़ता है।

सड़क द्वारा
सड़क से हरिद्वार पहुंचे फिर से एक सुखद विकल्प है। यह शहर एनएच 58 के माध्यम से भारत की राजधानी नई दिल्ली के साथ जुड़ा हुआ है। इसके अलावा, यह देश के अन्य प्रमुख शहरों में एक अच्छा सड़क नेटवर्क भी साझा करता है।

To read this Article in English Click here

Forthcoming Festivals

Download our free mobile app

Get festival updates on your mobile & Explore and enjoy the panorama of Festivals/Fairs/Melas celebrated in India.