जब भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का निधन हो गया तो पूरे देश में खलबली मच गई। अभी अभी चीन से युद्ध में हार हुई थी। खाने को अन्न नहीं था और ऐसे में नेहरू जी का चले जाना। हर कोई सोच रहा था कि अब देश कैसे चलेगा, लेकिन तभी देश की टूट रही बागडोर को संभाला लाल बहादुर शास्त्री जी ने और ऐसे संभाला कि युद्ध के मैदान से लेकर किसान के खेत तक सब जगह विजय पताका लहराया। लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्म भी गांधी जयंती के दिन, यानि 2 अक्टूबर को ही हुआ था। वह 9 जून 1964 से 11 जनवरी1966 को अपनी मृत्यु तक प्रधानमन्त्री रहे।
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प्रारंभिक जीवन

शास्त्री जी का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ। शास्त्री जी के पिता शारदा प्रसाद एक शिक्षक थे। काशी विद्या पीठ से संस्कृत की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने अपने नाम के पीछे लगा श्रीवास्तव हटा लिया और हमेशा के लिये शास्त्री बन गए। शास्त्री जी पढ़ाई के वक्त भारत सेवक संघ से जुड़े और यहीं से उनका राजनीतिक जीवन शुरू हुआ।

राजनीतिक जीवन

शास्त्री जी ने स्वतंत्रता संग्राम में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। वो सच्चे गांधीवादी थे। उन्होंनेअपना सारा जीवन सादगी से बिताया और उसे गरीबों की सेवा में लगाया। असहयोग आंदोलन, दांडी मार्च और भारत छोड़ो आन्दोलन  में उनका बहुत सहयोग रहा। भारत की आजादी के बाद शास्त्रीजी को उत्तर प्रदेश का संसदीय सचिव नियुक्त किया गया और फिर कई औहदों पर नियुक्त रहे। इनकी प्रतिभा और निष्ठा को देखते हुए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के पश्चात कांग्रेस पार्टी ने 1964 में लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री पद सौंपा।
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प्रधानमंत्री कार्यकाल

जब शास्त्री जी ने कुर्सी संभाली तो देश में हालात ठीक नहीं थे। बॉर्डर पर हालात कमजोर थे। अमीरी और गरीबी के बीच खाई बढ़ चुकी थी। लोगों के पास ना तो नौकरी थी और ना ही अन्न। शास्त्री जी ने “जय जवान और जय किसान ” का नारा दिया। पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण किया और उसकी जबरदस्त तरीके से हार हुई। बाद में दुग्ध क्रांति और हरित क्रांति शुरू की गई। जब देश में खाने पीने की कमी हो गई तो उन्होंने खुद भी व्रत करना शुरू कर दिया।

अंत समय

पाकिस्तान पर जबरदस्त जीत के बाद भारतीय सेना ने पाकिस्तना की ज़मीन पर काफी कब्जा कर लिया था। रुस और अमरीका ने मिल कर शास्त्रीजी को ताशकंद बुलाया और फिर पाकिस्तान की ज़मीन वापस लौटाने के लिये दबाव बनाया। दबाव में आकर शास्त्री जी से हस्ताक्षर करवा लिये गए। युद्ध विराम के कुछ ही घंटों बाद शास्त्री जी की मौत हो गई। कुछ लोग इसे हार्ट अटैक बताते हैं जो कुछ इसे सोची समझी साजिश।

जयंती कार्यक्रम

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शास्त्री जी की जयंती पर देश भर में कई कार्यक्रम किये जाते हैं। स्कूलों और यूनिवर्सिटियों में कई कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। शास्त्री जी को हमारे बीच से गए कितने साल हो गए, लेकिन आज भी उनके विचार हमारे दिलों में रहकर हमेशा उनकी याद दिलाते हैं। सच्ची निष्ठा, सेवा और कर्म भावना कोई अगर सीखना चाहे तो शास्त्री जी के जीवन से सीखे।

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