केसरिया बालम आओ नि पधारो म्हारे देस

पधारो म्हारे देस, आओ म्हारे देस जी..

यह गीत अपने आप में ही बहुत कुछ कहता है। इसी गीत पर आधारित राजस्थान की संस्कृति है। भारत के पश्चिम में बसा राजस्थान मेले और उत्सवों का शहर है। जहां पारंपरिक त्योहारों ने अभी भी जगह बनाई हुई है। राजस्थान अपने आप में कई किलों, राजा-महाराजाओं और उनके महलों की खूबसूरती समेटे हुए विरजामान है। राजस्थान के सबसे सुंदर शहरों में से एक है मेवाड़। मेवाड़ जितना अपने इतिहास के लिए प्रसिद्ध है उतना ही अपने त्योहारों, रीत-रस्मों मेले, एवं उत्सवों के लिए भी प्रसिद्ध है। घूमर नृत्य के साथ अपनी सुंदरता बिखेरता राजस्थान का मेवाड़ महोत्सव पूरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध है। मेवाड़ महोत्सव उदयपुर, राजस्थान में मार्च या अप्रैल के महीने में मनाया जाता है। यह भारत का दूसरा जीवित सांस्कृतिक त्योहार है, जो उदयपुर में वार्षिक रुप से मनाया जाता है। मेवाड़ महोत्सव तीन दिनों तक मनाया जाता है। यह तीन दिवसीय त्योहार वसंत ऋतु की शुरुआत का स्वागत करता है। इस त्योहार के दौरान, गणगौर और इसार की मूर्तियों को शहर के विभिन्न भागों के माध्यम से एक जुलूस के रूप में वितरित किया जाता है। उदयपुर में भारत की प्राचीन संस्कृति और परंपरा का नेतृत्व के साथ ही राजस्थान में मेवाड़ की सभी जीवित विरासतों की रक्षा करने के लिए मनाया जाता है। इस वर्ष मेवाड़ उत्सव 6 अप्रैल (शनिवार) से 8 अप्रैल (सोमवार) तक आयोजित किया जाएगा। मेवाड़ उत्सव का समारोह सभी को मेवाड़ की जीवित धरोहरों; जैसे- कला, पारंपरिक गायन, नृत्य्, भोजन, रंगों, सांस्कृतिक विविधता आदि को प्रदर्शित करने का अवसर देता है। राजस्थान एक पर्यटन का भी स्थल है जहां पर्यटक आते रहते हैं। राजस्थान राजा-महाराजओं की धरती रही है। जिसके फलस्वरुप पर्यटकों के लिए उदयपुर, भारत के प्रसिद्ध मनोरंजक और रुहानी स्थलों में से एक है, जो एक झील, पीचोला के किनारे स्थित है और यह बहुत सुन्दर और आकर्षक पहाड़ियों से घिरा हुआ है और इसी का शहर मेवाड़ अपने उत्सवों के साथ पर्यटकों को आकर्षित करता है।

मेवाड़ उत्सव


कैसे मनाया जाता है मेवाड़ उत्सव

ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ

घूमर रमवा म्हें जास्याँ

ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ

इसी गीत के साथ मेवाड़ उत्सव की शुरुआत होती है। मेवाड़ की महिलाएं घूमर गीत के साथ नाचते-गाते हुए मेवाड़ उत्सव का हिस्सा बनती हैं। मेवाड़ महोत्सव के जुलूस में सभी लोग शामिल होते है किन्तु महिलाओं के लिए इसका विशेष महत्व है। वो इस दिन खूब-सज सवंर कर सुंदर-सुंदर कपड़े पहनती हैं। महिलाओं के जुलूस के साथ मूर्तियां तैयार की जाती हैं, उन्हें सजाया जाता है। मेले में आतिशबाजियां, नृत्य, गायन समारोह आयोजित किया जाता है। महिलाएं अपना पांरपरिक नृत्य घूमर करती हुई मेले में शामिल होती है। मेवाड़ महोत्सव को लेकर सभी समाजों में खासा उत्साह रहता है। इस उत्सव के पहले दिन सभी समाजों की गणगौर की झांकियां घंटाघर से निकलती है, जो गणगौर घाट पहुंचती है। यहां महिलाएं पारंपरिक अंदाज में घूमर करती है। यहां पर्यटन विभाग की ओर से सांस्कृतिक कार्यक्रम व आतिशबाजी का आयोजन होता है। इस उत्सव के दूसरे दिन लोककला मंडल में रंगारंग कार्यक्रम होते हैं। इसमें विदेशी पर्यटकों के लिए राजस्थानी वेशभूषा में प्रतियोगिता भी शामिल है। उत्सव के तीसरे दिन गोगुन्दा में आयोजित मेले में सांस्कृतिक प्रस्तुतियां आयोजित की जाती है। मेवाड़ त्योहार हर साल मेवाड़ क्षेत्र की बहुत सी पारंपरिक, सांस्कृतिक, कालत्मक मनोरंजक गतिविधियों को आयोजित करने के द्वारा मनाया जाता है। हर साल रंगों का एक रंगारंग उत्सव आयोजित किया जाता है। मेले में स्थानिय कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। मेवाड़ में पुरानी कला की शैली का नए रुप में पुनर्निर्माण करने के लिए परंपरागत हस्तकला को आधुनिक और समकालीन शैली के साथ मिलाने के उद्देश्य के साथ विभिन्न सेमिनारों का आयोजन किया जाता है। मेले में विभन्न भारतीय व्यंजनों के साथ राजस्थानी लज़ीज पकवान परोसे जाते हैं। जिन्हें देखकर ही किसी के भी मुंह में पानी आ सकता है। मले में कई तरह के पेय पदार्थ प्रस्तुत किए जाते हैं। इन्हें बनाने के लिए कई पेशेवर रसोईयों को बुलाया जाता है। मेले में देसी के साथ कई विदेशी पर्यटक भी शामिल होते हैं जिन्हें राजस्थानी और भारतीय संस्कृति से रुबरु कराने के लिए कई तरह के कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है। उत्सव के दौरान तीन दिनों तक पेशेवर लोकगायकों और लोकनृत्यकों के द्वारा लोकगीत और लोकनृत्य का भी प्रदर्शन किया जाता है, जहाँ पूरे भारत वर्ष से पेशेवर कलाकारों को अपनी योग्यता दिखाने के लिए आमंत्रित किया जाता है। राजस्थानी गीतों से पूरा समा गुंजयमान हो जाता है। राजस्थानी नृत्य कला किसी का भी मन मोह लेने के लिए काफी है। नृत्य कलाओं से दर्शकों का मनोरजंन किया जाता है। उन्हें देश की संस्कृति से रुबरु कराया जाता है। नृत्य के जरिए महिलाएं अपना प्यार व खुशी प्रकट करती हैं।

मेवाड़ उत्सव का महत्व

मेवाड़ उत्सव में विभिन्न प्रकार की रस्में और परंपरागत गतिविधियों आयोजित की जाती है। मेवाड़ के लोग इस उत्सव में भगवान ईसार यानि भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करते हैं। उनकी मूर्तियों को नए कपड़े पहनाते हैं और एक शोभा यात्रा निकालते हैं, जो शहर के विभिन्न भागों से होती हुई गनगौर घाट पर पहुँचती है, जहाँ मूर्ति को विशेष नाव में झील के बीच में पानी में विसर्जन के लिए ले जाया जाता है। इस त्योहार में महिलाएं एवं कुवांरी लड़कियां व्रत रख कर भगवान शिव से प्रार्थना करती हैं। विवाहित महिलाएं जोड़ी बनाए रखने की एवं कुवांरी लड़किया अच्छा वर मिलने की मनोकामनाएं करती हैं। इस त्योहार में भगवान शिव और माता पार्वती की जोड़ी को राजस्थान की महिलाएं उत्सव में शामिल होने के लिए पारंपरिक और सांस्कृतिक परिधानों में स्वंय से बहुत अच्छे से तैयार करती है। वे समारोह में आकर्षण पैदा करने के लिए उत्सव के समारोह के दौरान विशेष लोकनृत्य का प्रदर्शन करती है। गनगौर का त्योहार विशेष रुप से महिलाएं आदर्श जोड़ी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मनाती है। देवी-देवताओं को अर्पित करने के लिए विशेष मिठाई घेवर को तैयार किया जाता है और लोगों के बीच में प्रसाद के रुप में वितरित की जाती है। नाच-गाने और हंसी खुशी के साथ इस मेले का समापन किया जाता है। भगवान से प्रार्थना की जाती है कि वो सदा उनकी जोड़ियां बनाएं रखें एवं घर में सुख-शांति प्रदान करें।

मेवाड़ उत्सव
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