भारतीय ज्योतिष अनुसार 12 महीनों की तरह ही 12 राशियां होती है। साल के इन 12 महीनों के हर महीने के साथ कोई ना कोई एक राशि जुड़ी होती है। 12 राशियों की तरह ही 12 संक्रांतियां भी होती है। मिथुन संक्रांति हिन्दू धर्म में मनाये जाने वाले महत्वपूर्ण धार्मिक पर्वों में से एक है। जिसे वर्ष के तीसरे माह के शुरुआत के रूप में मनाया जाता है। वर्ष में आने वाली 12 संक्रांतियों को दान-पुण्य आदि के सभी कार्यों के लिए शुभ माना जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार यह वर्ष का तीसरा माह होता है और इस दिन सूर्य वृषभ राशि से मिथुन राशि में प्रवेश करता है। जिस कारण इसे मिथुन संक्रांति कहा जाता है। ब्रह्मांड में होने वाले इस परविर्तन से बहुत से अच्छे और बुरे प्रभाव आते है इसलिए इस दिन पूजा का बहुत खास महत्व होता है। इस दिन सौरमंडल में काफी बदलाव आता है।

मिथुन संक्रांति

मिथुन राशि को दक्षिण भारत में मिथुन संक्रमणम के रूप में जाना जाता है। इसे हिंदू परंपराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार सबसे शुभ मौकों में से एक माना जाता है। इस दिन दान करने का बड़ा महत्व होता है। मिथुन संक्रांति को पूरे देश में अलग-अलग ढंग से मनाया जाता है। पूर्व में इसे अषाढ़ तो दक्षिण के केरल में इसे मिथुनम ओंठ के रुप में जाना जाता है। लेकिन उड़ीसा में मिथुन संक्रांति का खास महत्व है। उड़ीसा के लोग इसे “राजा संक्रांति” के रूप में मनाते हैं, जो चार दिन का त्यौहार है। जिसमें कई रोचक गतिविधियां शामिल होती हैं। पहले दिन को पहिली राजा, दूसरे दिन को मिथुन संक्रांति, तीसरे दिन को भू दाहा एवं चौथे दिन वसुमति स्नान कहते हैं। उड़ीसा भर में इस दिन को कृषि वर्ष की शुरूआत मानते हैं जिसे “राजा पर्ब” भी कहा जाता है। विशेषतौर पर इस दिन लोग पहली बारिश का स्वागत करते हैं साथ ही अच्छी बारिश होने व अच्छी खेती होने की प्रार्थनाएं भी करते हैं।

मिथुन संक्रांति से जुड़ी कहानियां

मिथुन संक्रांति मनाने के पीछे एक दिलचस्प पौराणिक कथा है। जिसके कारण चार दिवसीय यह उत्सव मनाया जाता है। कथानुसार देवी पृथ्वी जिसे भूदेवी भी कहते हैं। भगवान विष्णु की पत्नी हैं। जिस तरह महिलाओं को 4 दिन तक मासिक धर्म होते हैं शारिरिक विकास के लिए उसी तरह देवी भूदेवी को सृष्टि के विकास के लिए तीन दिनों तक मासिक धर्म हुए। चौथे दिन उन्हें स्नान कराया जाता है जिसे वासुमती गधुआ भी कहा जाता है । जो चौथे और अंतिम दिन को चिह्नित करता है। मसाला पिसने वाला पत्थर जिसे सिलबट्टा भी कहते है उसे भूदेवी का प्रतिक माना जाता है उसकी पूजा होती है। पुरी में भगवान जगन्नाथ मंदिर में भूदेवी की चांदी की भव्य मूर्ति विराजमान है। जो वहां की भव्यता को और बढ़ाती है।

मिथुन संक्रांति पर क्या होता है खास

मिथुन संक्रांति के दिन विशेषकर सूर्य की पूजा की जाती है। घर को साफ-सुथरा कर के मसाला पीसने वाले सिलबट्टे को साफ किया जाता और चार दिनों तक उससे कोई काम नहीं किया जाता। इस दिन महिलाएं व कुवांरी लड़कियां खूब सज-धज कर तैयार होती है। हाथों में मेंहदी लगाती हैं। अविवाहित लड़कियां विशेषकर उड़ीसा में सुंदर पोशाकें पहनती हैं और राजा पर्ब को अपने दोस्तों और परिवार के साथ मनाती हैं। इस दिन महिलाएं व लड़कियां कई तरह के खेल भी खेलती है। गीत गाना, झूला झूलना इत्यादि। राजा ढोली खेल ओडिशा में त्यौहार के रूप में मनाया जाने वाला एक दिलचस्प कार्यक्रम है, जिसके दौरान एक अच्छे पति की इच्छा रखने वाली लड़कियां झूला झूलती है और जिस तरह धरती बारिश की बूंदें पड़ने से पहले खुद को साफ करती है वैसे ही लड़किया मनचाहे पति की आस में साज-श्रृंगार करती हैं। परंपराओं के एक हिस्से के रूप में, लड़कियां राजा गीता गाती हैं और अन्य खेल लुडू इत्यादि खेलती हैं।

ओडिशा में राजा संक्रांति समारोह

चार दिवसीय त्यौहार में कई पारंपरिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं जैसे कि राम डोली, दांडी डोली और अन्य नामक विभिन्न बातों पर बहस करना। । परंपरागत ओडिया परिधान पहनने वाले लोग देवी पृथ्वी के प्रति कृतज्ञता दिखाकर मिथुन संक्रांति के अंतिम दिन का पालन करते हैं। भूदेवी के रूप में स्थानीय रूप से संदर्भित, भक्त पवित्र स्नान कर पीसने वाले पत्थर तक से दिव्य आशीर्वाद लेने के लिए विशेष पूजा करते हैं। इस दिन हर कोई अपने परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों और दोस्तों के साथ अच्छा समय बिताता हैं। लोग वृक्षारोपण करते हैं। गोडिपुआ नृत्य भी सामान्य ओडिआ संस्कृति को दर्शाते हुए गांवों में आयोजित किए जाते हैं। इस दिन उड़ीसा में भगवान जगन्नाथ के मंदिर में विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। उनका दूध, दही, जल से अभिषेक किया जाता है। मदिंर को फूलों से भव्यता के साथ सजाया जाता है। इस दिन कोई कार्य नहीं किया जाता। महिलाओं को आराम दिया जाता है। पुरुष व महिलाएं नाच-गाने के साथ इस पर्ब को मनाते हैं।

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