गुजरात के पाटन से लगभग 30 किलोमीटर दूर दक्षिण में ‘मोढेरा’ नाम के एक गाँव में स्थित मोढेरा सूर्य मंदिर काफी विख्यात मंदिर है। यह सूर्य मन्दिर स्थापत्य कला एवं शिल्पकारी का बेजोड़ नमूना प्रस्तुत करता है। सन 1026 ई. मे सोलंकी वंश के राजा भीमदेव प्रथम द्वारा इस मन्दिर का निर्माण हुआ था। वर्तमान समय में इस मन्दिर मे पूजा करना निषेध कर दिया गया है। इस मंदिर में हर साल जनवरी के आखिर में तीन दिन का एक उत्सव मनाया जाता है जिसमें भारतीय शास्त्रीय नृत्य का आयोजन किया जाता है। इस वार्षिक नृत्योत्सव का आयोजन गुजरात पर्यटन विभाग करता है जिसमें देश भर से आए प्रतिभागी भाग लेते हैं। इस तीन दिवसीय उत्सव को उत्तरायन महोत्सव के नाम से भी जाना जाता है जिसमें विभिन्न संगीत, नृत्य कला और संस्कृति का मंचन किया जाता है। इस वर्ष यह उत्सव 19 जनवरी से 21 जनवरी के बीच आयोजित होगा।

मोढेरा नृत्य उत्सव


सूर्य मंदिर की खासियत

मोढेरा का यह मन्दिर भगवान सूर्य को समर्पित है, इसकी बाहरी दीवारें मूर्तियों से ढकी हुई हैं जिनमें भगवान सूर्य के अंश प्रमुख हैं। इस सुन्दर सूर्य मंदिर में हर साल जनवरी में तीन दिनों तक भारतीय शास्त्रीय नृत्य का आयोजन कराया जाता है। जिसका उद्देश्य लोगों को भारतीय संस्कृति से रुबरु कराना है। इस नृत्य महोत्सव को देखने देश-विदेश से पर्यटक आते हैं। इस नृत्य महोत्सव का शास्त्रीय नृत्य रूप प्रस्तुत करना होता है जिससे लोगों को शास्त्रीय संगीत और नृत्य के प्रति रुचि पैदा हो। मोढेरा में सूर्य मंदिर इस तरह से स्थित है कि सूर्य की पहली किरण मुख्य प्रवेश द्वार के माध्यम से भीतर के देवता पर पड़ कर उसे उजागर करती है। असाधारण रूप से सुंदर सूर्य मंदिर शास्त्रीय नृत्य के दौरान और खूबसूरत हो जाता है। सोलंकी राजा भीमदेव ने इस मन्दिर को दो हिस्सों में बनवाया था। इसके प्रथम भाग में गर्भगृह तथा द्वितीय भाग में सभामंडप है। गर्भगृह काफ़ी विस्तृत है। इसकी लंबाई 51 फुट 9 इंच तथा चौड़ाई 25 फुट 8 इंच है। मन्दिर के सभामंडप में 52 स्तंभ हैं, जिन पर उत्कृष्ट कारीगरी की गई है। इन स्तंभों की विशेषता यह है कि नीचे की ओर देखने पर अष्टकोणाकार और ऊपर की ओर देखने पर वह गोल प्रतीत होते हैं। इन स्तंभों पर देवी-देवताओं के चित्र तथा रामायण, महाभारत आदि के प्रसंगों को अद्भुत सुन्दरता व बारीकी से उकेरा गया है। मन्दिर में एक विशाल कुंड है, जिसे 'सूर्यकुंड' तथा 'रामकुंड' कहा जाता है। इतिहासकारों का मानना है कि इस विशाल सुंदर मंदिर को खिलजी वंश के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने तहस-नहस कर दिया था। जिसके बाद से इसमें पूजा-पाठ नहीं किया जाता। इस वजह से यहां भीड़ भी कम होती है। किन्तु नृत्य महोत्सव के जरिए यह सूर्य मंदिर आज भी बहुत प्रसिद्ध है।

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