भारतीय शास्त्रों में भगवान के अवतरण की कई कथाएं मौजूद है। जो यह बताती हैं कि भगवान अपने भक्तों की रक्षा करने एवं दुष्टों का अंत करने के लिए सदैव इस धरती पर प्रकट होते रहें हैं। ऐसे ही विख्यात भगवान नरसिंह को हिंदू परंपार में उच्च माना गया है। जिन्होंने अपने भक्त प्रहलाद को बचाने के लिए उसके पिता हिरण्यकश्यप का नरसिंह रुप लेकर संहार किया। प्राचीन धार्मिक पाठ में वर्णित भगवान नरसिंह भगवान विष्णु का अवतार हैं। भगवान नरसिम्हा को हिंदू धर्म के सबसे लोकप्रिय देवताओं में से एक माने जाता है। उन्हें आधा आदमी- आधा जानवर (शेर) के रूप में देखा जाता है, जिसमें शेर की तरह चेहरे और पंजे के साथ मानव-जैसे धड़ और निचले शरीर होते हैं। उन्हें रक्षक के रूप में जाने जाता है जो विशेष रूप से आवश्यकता के समय अपने भक्तों का हर घड़ी बचाव करते हैं। वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को नरसिंह जयंती के रूप में मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु ने अपने पांचवे अवतार के रूप में नरसिंह का रूप धारण किया था। नर का अर्थ है मानव और सिंह का अर्थ होता है शेर। नरसिंह चतुर्दशी या नरसिम्हा चतुर्दशी मुख्य रूप से बुराई पर अच्छाई की जीत मनाने के लिए मनाई जाती है। इस वर्ष नरसिंह जयंती 17 मई शुक्रवार को मनाई जाएगी।
 नरसिंह जयंती

नरसिंह जयंती व्रत का महत्व

पौरैणिक मान्यता है कि नरसिंह जयंती के दिन व्रत रखने से भक्त के सारे दुख दूर हो जाते हैं। इस दिन व्रत करने से चारों फलों की प्राप्ति होती है। भगवान नरसिंह हर घड़ी, हर पल अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। उनके शत्रुओं का विनाश करते हैं। नरसिंह जयंती के दिन भक्तगण सूर्योदय से पहले उठकर, स्नानोपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं। इसके बाद भक्तगण व्रत का संकल्प लेते हैं और पूरे दिन व्रत रखते हैं। इस दिन भक्त बड़े ही श्रद्धा से भगवान की पूजा अर्चना करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन जो भी सच्चे मन से भगवान नरसिंह और देवी लक्ष्मी की पूजा करता है। उसे सफलता ज़रूर मिलती है, देवी लक्ष्मी की कृपा से उसके जीवन में किसी भी तरह की आर्थिक समस्या नहीं आती है।

नरसिंह जयंती की कथा

भगवान नरसिंह के धरती पर अवतरण लेने के पीछे प्रचलित कथा व्यख्यात है। प्राचिन काल में कश्यप नामक एक राजा था। उसकी पत्नी का नाम दिति था। कश्यप के दो पुत्र थे हरिण्याक्ष और हिरण्यकश्यप। एक बार हिरण्याक्ष धरती को पाताल लोक में ले गया। तब विष्णु जी ने वाराह रूप धरकर उसका वध कर दिया और वापस शेषनाग की पीठ पर धरती को स्थापित कर दिया। अपने भाई की मृत्यु के पश्चात हिरण्यकश्यप प्रतिशोध की आग में जलने लगा। उसने अपने भाई की मृत्यु का बदला लेने के लिए ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने का निर्णय लिया और कठोर तपस्या करने लगा। हिरण्यकश्यप ने कठोर तपस्या कर ब्रह्माजी को प्रसन्न करके वरदान प्राप्त कर लिया कि उसे न तो कोई मानव मार सकता और न ही कोई पशु, न दिन में उसकी मृत्यु होगी और न ही रात में, न घर के भीतर और न बाहर, न धरती पर और न आकाश में, न किसी अस्त्र से और न ही किसी शस्त्र से उसे कोई मार सकता है। यह वरदान प्राप्त कर वह अहंकारी बन गया क्योंकि उसे लगता था कि उसे कोई नहीं मार सकता। वह स्वंय को भगवान समझने लगा। उसके अत्याचार से तीनों लोक त्रस्त हो उठे। वह लोगों को तरह-तरह की यातनाएं और कष्ट देने लगा। हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। उसने प्रहलाद को भगवान विष्ण की भक्ति करने से रोकने के लिए अनेक प्रयास किए लेकिन हर प्रयास उसका बेकार गया। यहां तक की उसने अपने ही पुत्र के प्राण लेने की भी कोशिश में अपनी बहन होलिका से प्रहलाद को जलाने के लिए कहा क्योंकि होलिका को वरदान प्राप्त था कि उसे आग जला नहीं सकती लेकिन प्रह्लाद का इससे बाल भी बांका नहीं हुआ। उल्टा होलिका जल कर भस्म हो गई। जिससे क्रोधित हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को खत्म करना चाहा। एक दिन जब प्रह्लाद ने उससे कहा कि भगवान सर्वत्र व्याप्त हैं, तो हिरण्यकश्यप ने उसे चुनौती देते हुए कहा कि अगर तुम्हारे भगवान सर्वत्र हैं, तो इस स्तंभ में क्यों नहीं दिखते? यह कहते हुए उसने अपने राजमहल के उस स्तंभ पर प्रहार कर दिया। तभी स्तंभ में से भगवान विष्णु नरसिंह अवतार के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने हिरण्यकश्यप को उठा लिया और उसे महल की दहलीज पर ले आए। भगवान नरसिंह ने उसे अपनी जांघो पर लिटाकर उसके सीने को अपने नाखूनों से फाड़ दिया और अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा की। भगवान नरसिंह ने जिस स्थान पर हिरण्यकश्यप का वध किया, उस समय वह न तो घर के भीतर था, न बाहर। उस समय गोधुलि बेला थी यानी न दिन था और न रात। नरसिंह, न पूरी तरह से मानव थे और न ही पशु। वो आधे मानव तथा आधे शेर के रुप में थे। हिरण्यकश्यप का वध करते समय उन्होंने नरसिंह ने उसे अपनी जांघ पर लिटाया था, इसलिए वह न धरती पर था और न आकाश में था। उन्होंने अपने नाखून से उसका वध किया, इस तरह उन्होंने न तो अस्त्र का प्रयोग और न ही शस्त्र का। इसी दिन को नरसिंह जयंती के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि जो भी भक्त इस दिन सच्चे मन से भगवान विष्णु के स्वरूप नरसिंह देव की प्रार्थना करता है, उनका आह्वान करता है। ईश्वर उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। उसकी कभी किसी चीज से डर नहीं लगता और ना है किसी चीज की कमी होती है। संकट की घड़ी में भगवान उसकी मदद करते हैं। इसलिए यह दिन भगवान विष्णु के भक्तो के लिए सर्वोत्म दिन होता है। भगवान नरसिंह की पूजा से उनकी हर मनोकामनाएं पूर्ण होती है।

नरसिंह जयंती की पूजन विधि

भगवान नरसिंह की पूजा सायंकाल में की जाती है। भगवान नरसिंह की मूर्ति के पास देवी लक्ष्मी की मूर्ति भी रखें और दोनों की पूजा पूरे भक्ति भाव से करें। भगवान की पूजा के लिए फल, पुष्प, कुमकुम, केसर, पंचमेवा, नारियल, अक्षत और पीताम्बर रखा जाता है। गंगाजल, काले तिल, पंचगव्य और हवन सामग्री का पूजन में उपयोग किया जाता है। भगवान नरसिंह को पीले तथा माता लक्ष्मी को लाल वस्त्र अर्पित किए जाते हैं। भगवान नरसिंह को चंदन, कपूर, रोली व तुलसीदल भेंट कर धूपदीप दिखाएं। इसके बाद घंटी बजाकर आरती करें भोग लगाएं। रात में जागरण करें तथा भगवान नरसिंह की कथा सुनें। साथ ही नरसिंह मंत्र का जाप भी किया जाता है। इस मंत्र का- ‘नैवेद्यं शर्करां चापि भक्ष्यभोज्यसमन्वितम्। ददामि ते रमाकांत सर्वपापक्षयं कुरु’। भगवान नरसिंह की जयंती पर गरीबों को दान करने का विशेष महत्व बताया जा रहा है। व्रत करने वाले श्रद्घालु को सामर्थ्य अनुसार तिल, स्वर्ण तथा वस्त्रादि का दान देना चाहिए। इस प्रकार सच्चे मन से नरसिंह जयंती का व्रत करने वाले श्रद्घालु की समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है।

नरसिंह जयंती समारोह

इस दिन भक्त मंदिरों में भगवान नरसिंह के गुणों का गान करते हैं। भगवान विष्णु के नरसिंह रुप की पूजा की जाती है। भजन-कीर्तन गाए जाते हैं। पूजा-पाठ कर प्रसाद वितरित किया जाता है। आम तौर पर इस दिन को उपवास और अभिषेक के साथ भगवान की पूजा करने के साथ मनाया जाता है। अनुष्ठानों के बाद संकेर्तण और हरि नाम परायण होता हैं। जयपुर जिले के एक गांव तदवास, जो नरसिंह मंदिर के लिए लोकप्रिय हैं। वहां नरसिंह चतुर्दशी के दिन विशेष उत्सव मनाते हैं। नरसिंह लीला का आयोजन नरसिंह चतुर्दशी पर हर साल यहां किया जाता है। नरसिंह लीला का आनंद लेने के लिए हजारों लोग आस-पास के गांवों से यहां इकट्ठे होते हैं। दूर-दूर से भी लोग यहां भगवान के दर्शन करने आते हैं।
 नरसिंह जयंती
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