भारत में हिन्दू मान्यतानुसार हर महीने में दो एकादशियां होती है। एक कृष्ण पक्ष की और एक शुक्ल पक्ष की। सभी एकादशियों का अपना-अपना महत्व है। किन्तु चैत्र माह की एकादशी अन्य सभी एकदाशियों से प्रमुख और उत्तम मानी गई है क्योंकि यह एकादशी मनुष्यों को उनके पापों से मुक्त कराती है। इसलिए इसे पापमोचनी एकादशी कहा जाता है। उत्तर भारतीय हिंदू कैलेंडर के अनुसार पापमोचनी एकादशी चैत्र माह की कृष्ण पक्ष के 11वें दिन होती है यह सभी 24 एकादशियों में से आखिरी एकादशी होती है। किन्तु दक्षिण भारतीय कैलेंडर के अनुसार यह फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष के 11वें दिन होती है। दिलचस्प बात यह है कि पापमोचनी एकदाशी दोनों कैलेंडर के अनुसार एक ही दिन यानि चैत्र माह के कृष्ण पक्ष के 11 वें दिन मनाई जाती है। बस दक्षिण भारत में उसे फाल्गुन माह मानते हैं और उत्तर भारत में चैत्र माह मानते हैं। इस वर्ष पापमोचनी एकादशी 31 मार्च रविवार को मनाई जाएगी। पापमोचनी एकदशी का अर्थ इसके नाम से ही ज्ञात होता है। यह दो शब्दों से मिलकर बनी है। ‘पाप’ यानी की दुष्ट कर्म, गलती और ‘मोचनी’ यानी मुक्ति, छुड़ाने वाली। अर्थात पापमोचनी एकादशी का मूल अर्थ हुआ हर तरह के पाप से मुक्ति दिलाने वाली। इस दिन व्रत करने से सुख, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है। पापमोचनी एकादशी का व्रत करने से बड़े से बड़ा पाप, कष्ट, विपदा नष्ट हो जाती है। इस व्रत में भी भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।

पापमोचनी एकादशी


पापमोचनी एकादशी व्रत कथा

पापमोचनी एकादशी का व्रत करने के पीछे एक कथा छिपी है। जिसे सुनने और पढ़ने मात्र से ही मुक्ति मिल जाती है। यह कथा भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठर को सुनाई थी। उन्होने कहा था कि प्राचीन काल में एक चैत्ररथ नामक एक वन था। इस वन में इंद्र देव, अप्सरा और गंधर्व कन्याओं के साथ भ्रमण किया करते थे। और यही वह वन था जहां च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी तपस्या करते थे। अप्सराएं कामदेव की अनुचरी थीं। और कामदेव शिव के विद्रोही थे क्योंकि शिव ने कामदेव को उनकी तपस्या भंग करने के आरोप में भस्म कर दिया था। इधर इन्द्र भी ऋषि को तपस्या करते देख डरने लगे थे कि कहीं यह देव आदि देव से मेरा सिंहासन ही ना मांग ले। इस वजह से बदला लेने के लिए कामदेव ने एक अप्सरा को उनका ध्यान भंग करने को कहा। इस काम को करने के लिए कामदेव ने मंजूघोषा नामक अप्सरा को कहा। मंजूघोषा ने इसे अपना काम समझ अपने नृत्य और हावभाव से ऋषि का ध्यान भंग कर दिया। और ऋषि मंजूघोषा के प्रेम में पड़ गए। मेधावी ऋषि अब जगह-जगह मंजूघोषा के साथ विहार करने लगे। उसके प्यार में सुध-बुध खोकर दिन-रात भोग-विलास में रहने लगे। उन्हें रात-दिन की भी सुधी नहीं रही। ऐसे रहते-रहते करीब 57 साल बित गए और मजूंघोषा को अब लगा कि मेरा काम तो हो गया अब मुझे वापस स्वर्गलोक जाना चाहिए। जिसके बाद एक दिन मंजुघोषा ने मेधावी ऋषि से स्वर्गलोक जाने की अनुमति तो मेधावी ऋषि कहने लगे कि प्रिय अभी तो कल ही तुम आई हो अभी जाने लगी। तब मंजूघोषा ने कहा कि आपको समय का ज्ञात नहीं हमें साथ रहते काफी समय बित गया है। उसी समय ऋषि को एहसास हुआ कि वह रसातल में जा चुके हैं। उनकी तपस्या भंग हो चुकी है। और इस सब का कारण उन्होंने मंजुघोषा को माना। जिसके बाद मेधावी ऋषि ने मजूंघोषा को कहा कि तुमने मेरे साथ यह अच्छा नहीं किया। मेरा अमूल्य समय नष्ट किया है तुमने, मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम पिशाचनी बनोगी। मंजुघोषा को पिशाचनी का श्राप देने के बाद मंजुघोषा ने ऋषि से अपने किए की गलती की माफी मांगी तो ऋषि ने पापमोचनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी और कहा कि इससे ही तुम्हारे पाप खत्म होंगे। जिसके बाद मेधावी ऋषि जब वापस आश्रम पहुंचे तो उन्होंने अपने पिता को सारी बात बताई। च्यवन ऋषि ने कहा कि तुमने मंजुघोषा को श्राप देकर खुद को पाप का भोगी बना लिया है और अगर तुम्हें अपने पाप खत्म करने हैं तो तुम्हें भी पापमोचनी एकादशी का व्रत करना होगा। जिसके बाद मंजूघोषा और मेधावी ऋषि ने पूर्ण विधि से पापमोचनी एकादशी का व्रत किया। जिससे उनके सारे पाप नष्ट हो गए। मेधावी ऋषि फिर से तपस्या करने लगे और मंजुघोषा को पिशाचनी यौनी से मुक्ति मिली। यह कथा इस बात का प्रमाण है कि इस व्रत को करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।

पापमोचनी एकादशी व्रत की पूजा विधि

पापपमोचनी एकादशी का व्रत करने करने के लिए शुद्ध होना चाहिए। पापमोचनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप की पूजा की जाती है। यह व्रत कठिन व्रत होता है। क्योंकि यह दो दिन किया जाता है। इस व्रत में व्रत करने वाला व्यक्ति दशमी तिथि को सात्विक भोजन करके हरि भजन में मन लगा लेता है। इस व्रत को करते समय भोग विलास के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए। पूजा के पश्चात भगवान के समक्ष बैठकर भग्वद् कथा का पाठ अथवा श्रवण करना चाहिए। एकादशी तिथि को जागरण करने से कई गुणा पुण्य मिलता है। अत: रात्रि में भी निराहार रहकर भजन कीर्तन करते हुए जागरण करें। द्वादशी के दिन प्रात: स्नान करके विष्णु भगवान की पूजा करें फिर ब्रह्मणों को भोजन करवाकर दान-दक्षिणा सहित विदा करें। इसके पश्चात स्वयं भोजन ग्रहण करना करें। इसके बाद व्रत पूर्ण होता है।

पापमोचनी एकादशी व्रत का महत्व

आधुनिक समय में पापमोचनी एकादशी उपवास को उचित विधि से करना एव कठोरता से उसका पालन करना मुश्किल है। इसलिए भक्त पापमोचनी एकादशी के दिन पूर्ण उपवास तो रखते हीं है साथ ही मंदिरों में घर के आस-पास विशेष भजन कीर्तिन करने के लिए सभाएं आयोजित करते हैं। जगह-जगह गीता का पाठ किया जाता है। तन-मन शुद्ध कर भगवान विष्णु से प्रार्थना की जाती है। भगवान से सभी पापों को दूर करने एवं क्षमा याचना कर, अच्छे आचरण का आशीर्वाद मांगा जाता है। गरीबों को दान पुण्य किया जाता है।

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