पर्युषण पर्व का जैन समाज में सबसे अधिक महत्वा है, इस पर्व को पर्वाधिराज कहा जाता है। पर्युषण पर्व आध्यांत्मिक अनुष्ठागनों के माध्यरम से आत्माा की शुद्धि का पर्व माना जाता है। इसका मुख्यस उद्देश्या आत्माे के विकारों को दूर करने का होता है। जैन समाज मुख्य रूप से दो पंथों में विभाजित है- दिगंबर एवं श्वेरतांबर पंथ। पर्यूषण पर्व जैन धर्म का मुख्य पर्व है। श्वेतांबर इस पर्व को 8 दिन और दिगंबर संप्रदाय के जैन अनुयायी इसे दस दिन तक मनाते हैं। इस पर्व में जातक विभिन्न आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि योग जैसी साधना तप-जप के साथ करके जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करते हैं। पर्यूषण पर्व का मूल उद्देश्य आत्मा को शुद्ध करके आवश्यक उपक्रमों पर ध्यान केंद्रित करना होता है। पर्यावरण का शोधन इसके लिए वांछनीय माना जाता है। पर्यूषण पर्व के इस शुभ अवसर पर जैन संत और विद्वान समाज को पर्यूषण पर्व की दशधर्मी शिक्षा को अनुसरण करने की प्रेरणा प्रदान करते हैं। पर्यूषण पर्व के दौरान मंदिर, उपाश्रय, स्थानक तथा समवशरण परिसर में अधिकाधिक समय तक रहना जरूरी माना जाता है। इस दौरान कई जातक निर्जला व्रत भी करते हैं। मानव की सोई हुई अन्त: चेतना को जागृत करने, आध्यात्मिक ज्ञान के प्रचार, सामाजिक सद्भावना एवं सर्व धर्म समभाव के कथन को बल प्रदान करने के लिए पर्यूषण पर्व मनाया जाता है। साथ ही यह पर्व सिखाता है कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि की प्राप्ति में ज्ञान व भक्ति के साथ सद्भावना का होना भी अनिवार्य है। इस वर्ष यह पर्व 7 सिंतबर से 14 सितंबर तक मनाया जाएगा।
पर्युषण पर्व

पर्युषण पर्व का महत्व

जैन धर्म में अहिंसा एवं आत्माा की शुद्धि को सबसे महत्वनपूर्ण स्थािन दिया जाता है। पर्युषण पर्व के दौरान विभिन्नक धार्मिक क्रियाओं से आत्माशुद्धि की जाती व मोक्षमार्ग को प्रशस्त्र करने का प्रयास किया जाता है, ताकि जनम-मरण के चक्र से मुक्ति पायी जा सकें। जब तक अशुभ कर्मों का बंधन नहीं छुटेगा, तब तक आत्मा के सच्चेत स्वणरूप को हम नहीं पा सकते हैं। प्रत्येभक समय हमारे द्वारा किये गये अच्छेत या बुरे कार्यों से कर्म बंध होता है, जिनका फल हमें अवश्य भोगना पड़ता है। शुभ कर्म जीवन व आत्मा को उच्चि स्थाेन तक ले जाता है, वही अशुभ कर्मों से हमारी आत्माअ मलिन होती जाती है। इस पर्व के दौरान दस धर्मों- उत्ततम क्षमा, उत्त म मार्दव, उत्तमम आर्जव, उत्तकम शौच, उत्ताम सत्य , उत्तरम संयम, उत्तचम तप, उत्त्म त्या ग, उत्त,म आकिंचन एवं उत्तजम ब्रह्मचर्य को धारण किया जाता है। समाज के सभी पुरूष, महिलाएं एवं बच्चेे पर्युषण पर्व को पूर्ण निष्ठात के साथ मनाते है। सभी के द्वारा मन-वचन-काय से अहिंसक धर्म का पूर्ण रूप से पालन करने का प्रयत्नप करते हुए किसी भी प्रकार के अनावश्यहक कार्य को करने से परहेज किया जाता है। सांसारिक मोह-माया से दूर मंदिरों में भगवान की पूजा-अर्जना, अभिषेक, आरती, जाप एवं गुरूओं के समागम में अधिक से अधिक समय को व्यहतीत किया जाता है एवं अपनी इंद्रियों को वश में कर विजय प्राप्तओ करने का प्रयास करते है। शास्त्रों की विवेचना की जाती है, व जप के माध्य म से कर्मों को काटने का प्रयत्नर करते है। व्रत व उपवास करके आत्माकेंद्रित व विषय-कसायों से दूर रहा जाता है। संसार के समस्त प्राणियों से जाने-अनजाने में की गई गलतियों के लिए क्षमा याचना कर सभी के लिए मंगल कामना की जाती है और खुद को प्रकृति के निकट ले जाने का प्रयास किया जाता है। पर्युषण पर्व आत्मल-मंथन का पर्व है, जिसमें यह संकल्प् लिया जाता है, कि प्रत्ययक्ष या अप्रत्याक्ष रूप से जीवमात्र को कभी भी किसी प्रकार का कष्टध नहीं पहॅुचाएंगे व किसी से कोई बैर-भाव नहीं रखेंगे।

पर्युषण पर्व के दसलक्षण

1. क्षमा
2. मार्दव
3. आर्दव
4. सत्य
5. शौच
6. संयम
7. तप
8. त्याग
9. अकिंचनता
10. ब्रह्मचर्य

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