माना जाता है कि अगर आपके पूर्वज या पितर आपसे खुश हैं, तो दुनिया कि कोई ताकत आपका बाल भी बांका नहीं कर सकती और अगर वो नाराज़ हो गए तो पूरे परिवार का सर्वनाश हो जाता है। पितर का मतलब आपके पूर्वज और श्राद्ध का मतलब श्रद्धा। अपने पूर्वजोंं का श्रद्धापूर्वक सम्मान करना ही श्राद्ध होता है। ऐसा कहा जाता है कि मरणोपरांत भी आत्मा भटकती रहती है। उसी आत्मा को तृप्त करने के लिये तर्पण किया जाता है। पितृ पक्ष या श्राद्ध इस बार सितंबर 02 (बुधवार) से सितंबर 17 (गुरुवार) तक चलेंगे। पूर्वजों की संतानें जौं और चावल का पिंड देते हैं। कहा जाता है कि इस दौरान हमारे पूर्वज कौए का रूप धारण कर के आते हैं और पिंड लेकर चले जाते हैं। श्राद्ध के वक्त लोग ब्राह्मणों को भोजन कराने के साथ साथ दान और भंडारे भी करते हैं।

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इन बातों का रखें खास ध्यान

1.श्राद्धों के वक्त आपके पूर्वज किसी भी तरह घर आ सकते हैं तो किसी भी आने वाले को घर से बाहर न भगाएं।

2. पितृ पक्ष में पशु पक्षियों को  पानी और दाना देने से लाभ मिलता है।
 
3.पितृ पक्ष के दौरान मांस-मदिरा का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

4.तर्पण में काले तिल का प्रोयग करें ।

5.पितृ पक्ष में ब्राह्मणों को भोजन करवानएं ।

6. कुत्ते, बिल्ली, और गाय को भगाना या हानि नहीं पहुंचानी चाहिए।

उत्तम स्थान

पितरों के श्राद्ध के लिये गया जो कि बिहार में है वो स्थान काफी उत्तम माना गया है। कहते हैं यहां पर भगवान राम ने अपने पिता का पिंड दान किया था। जो कोई लावारिस होते हैं या जिनकी आगे संतान नहीं होती, उनका भी गया कि फल्गु नदी में पिंडदान किया जा सकता है। गया में भगवान विष्णु का भी मंदिर है।

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कैसे करें श्राद्ध


अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए वैसे तो अच्छे से दान-पुण्य करना चाहिए किन्तु यदि धन दान करने में समर्थ ना हों तो भी काले तिल और जल से अर्पण कर पिंडदान करना चाहिए। क्योंकि यदि पूर्वजों को जल भी अर्पित ना किया जाए तो वो श्राप देकर लौट जाते हैं। हर साल हमारे पूर्वज श्राद्ध के समय हमारी आस देखते हैं कि हम उनकी शांति के लिए क्या करते हैं क्या नहीं। ऐसे में उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पिंडदान विधि पूर्वक करना चाहिए।

कम से कम पंचमी से अष्टमी तक या फिर दशमी से अमावस्या तक श्राद्ध जरुर करना चाहिए।
समय ना होने पर सर्वपितृ अमावस्या के दिन अवश्य पितरों को जल अर्पित करें।
श्राद्ध हमेशा दिन के अष्टम भाग मेैं अपराह्न के कुतुप काल मे ंकरना चाहिए।
इस मुहुर्त में गंगाजल, दूध, घी, मधु, वस्त्र आदि का दान करना चाहिए।
ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।
श्राद्ध में कुश का प्रयोग करना बहुत जरुरी होता है इसे पित्तर प्रसन्न होते हैं। 
गरीबों को दान करना चाहिए। 
पित्तरों से प्रार्थना करनी चाहिए कि वो अपना आशीर्वाद प्रदान करें। 
 

आपके अपने जो अब इस दुनिया में नहीं हैं उनको श्रद्धांजलि देने के लिये यहां क्लिक करें-

                                      www.tributes.in

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