भारत का सबसे धार्मिक राज्य दक्षिण में बसा केरल है। केरल को भगवान का शहर भी कहा जाता है क्योंकि यहां हमेशा कोई ना कोई त्योहर भगवान को समर्पित कर मनाया जाता है। केरल के त्योहार भी केरल की तरह ही सुंदर और पारंपरिक होते हैं। जिनमें जानवरों और इंसानो के बीच एक अटूट प्रेम दिखाया जाता है। केरल के प्रत्येक त्योहार में जानवरों को भी शामिल किया जाता है। जिनमें हाथी प्रमुख है। हाथी को शुभ मान कर केरल के हर पुरम, त्योहार में हाथियों को विशेष रुप से तैयार किया जाता है। इंसान और आदमी के बीच में प्रेम को प्रदर्शित करता केरल का मुख्य त्योहार है त्रिशूर पूरम। केरल में कई पूरम के त्योहर मनाए जाते हैं किन्तु त्रिशूर पूरम उत्सव की रौनक ही अलग होती है। त्रिशूर पूरम केरल में हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। त्रिशूर पूरम त्रिशूर नगर का वार्षिकोत्सव है। यह भव्य रंगीन मंदिर उत्सव केरल के सभी भाग से लोगों को आकर्षित करता है। त्रिशूर पूरम की शुरुआत आज से 200 साल पहले त्रिशूर के राजा ने इस मकसद से करी थी की सारे मंदिर एकजुट हो जाएं। यह उत्सव थेक्किनाडु मैदान पर्वत पर स्थित वडक्कुन्नाथन मंदिर में, नगर के बीचोंबीच आयोजित होता है। यह मलयाली मेडम मास की पूरम तिथि को मनाया जाता है। इस त्योहार को भगवान शिव का पुनर्जन्म माना जात है। जहां हजारों भक्त भगवान के दर्शन करने इस उत्सव में एकत्र होते हैं। इस वर्ष त्रिशूर पुरम का त्योहार 13 मई सोमवार को मनाया जाएगा।
त्रिशूर पूरम उत्सव

त्रिशूर पूरम का महत्व

केरल के लोकप्रिय त्योहार विषु के बाद त्रिशूर में हाथियों का जुलूस सभी के आकर्षण का केंद्र रहता है जिसे देखने के लिए भारत के अलावा दुनिया भर के पर्यटक आते हैं। भारत का दक्षिण भारतीय राज्य केरल अपने मंदिरों के कारण लगातार धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दे रहा है और आज केरल और पर्यटन लगभग एक दूसरे के पर्यायवाची बन गए हैं। ये भारत का एक ऐसा राज्य है जहां जितना महत्त्व मंदिर और भगवान को दिया जाता है उतना ही हाथियों को भी। शायद यही कारण है कि हाथी केरल का राज्य पशु है। केरल के सभी त्योहारों में हाथी अनिवार्य है। इस त्योहार में देश के साथ-साथ विदेशों से भी आए पर्यटक बढ़-चढ़ कर शामिल होते हैं। केरल के निवासियों के लिए यह त्योहार बहुत पवित्र माना जाता है। त्रिशूर पूरम की सबसे विशेषता इसकी धर्मनिरपेक्ष प्रकृति है। मुस्लिम और ईसाई समुदाय सक्रिय रूप से इसमें भाग लेते हैं और वे त्योहार के आचरण में एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ज्यादातर पंडल मुस्लिम समुदाय के शिल्पकार बनाते हैं।

त्रिशूर पुरम की विशेषता

त्रिशूर पुरम केरल के नगर त्रिशूर का एक सामाजिक और धार्मिक उत्सव है, जो आठ दिनों तक चलता है। यह वार्षिक उत्सव यहां के हिन्दू समुदाय द्वारा प्रथम मलयालम महीना मेड़म (अप्रैल) में मनाया जाता है। पूरम का अर्थ होता है उत्सव। त्रिशूर पुरम की शुरुआत पूर्व कोच्चि राज्य के महाराज सकथान थामपुरन ने की थी। त्रिशूर पूरम के त्योहार का इतिहास 200 साल पूराना है। त्रिशूर राजा थांपुरन (1751-1805), पूर्वी राज्य कोच्चि के शासक थे उन्होंने वडक्कननाथन मंदिर परिसर का नवीनीकरण किया जो उच्च दीवारों से घिरा हुआ था। मंदिर में चार बड़े गोपुरम अंकित किए गए। एक समय जब किसी ने सर्वशक्तिमान नंबूदिरियों पर सीधे देखने की हिम्मत नहीं की थी, तो थांपुरन ने अपनी शक्तियों का सही प्रयोग कर मंदिर के प्रशासन को संभाला। कहा जाता है कि उन्होंने पूरम त्यौहार के 36 घंटे के अंदर मंदिर को तैयार करवा दिया था। पार्मेकावू ओर तिरुवामबाडी, कानिमंगलम, लाल्लूकर, अय्यनतहोल, नेथिलाक्का वू, करमुक्कुम, चेंबुकावू, चूराकोत्तुलकावू और पनमुक्कानमपिल्लीे के अलावा अन्य मंदिरों मंक भी यह उत्स व मनाया जाता है। आज यह उत्सव आस्था के साथ-साथ आतिशबाजियों के लिए जाना जाता है। वास्तव में यह एक भव्य रंगीन मंदिर उत्सव है, जो नगर के एक प्राचीन वडक्कुमनाथ मन्दिर के प्रांगण में आयोजित किया जाता है। इस उत्सव में त्रिशूर के त्रिरूवामबाड़ी कृष्ण मंदिर, पारामेकावु देवी मंदिर, वड़ाकुंठा मंदिर साहित आस-पास के अन्य छह मंदिर भाग लेते हैं। केरल के पारंपरिक गीत-संगीत और नृत्य के साथ सुसज्जित हाथियों का प्रदर्शन इस उत्सव के विशेष आकर्षण हैं। प्रत्येक मंदिर समूह को 15 हाथियों को प्रदर्शित करने की अनुमति होती है। हर समूह इस जुगत में रहता है कि उसे दक्षिण भारत में सबसे बेहतरीन हाथी और छतरी रखने की प्रशस्ति मिले। मंदिरों द्वारा प्रदर्शन की सारी तैयारियां गुप्त तरीके से अंजाम दी जाती हैं, कि एक समूह को दूसरे की गतिविधियों की भनक तक न लग सके।

कैसे मनाते है त्रिशूर पूरम

त्रिशूर पूरम उत्सव में त्रिशूर के ही त्रिरूवामबाड़ी कृष्ण मंदिर और पारामेकावु देवी मंदिर इस विशेष उत्सव के आयोजन में बढ़-चढ़ कर भाग लेते हैं। वास्तव में त्रिशूर पुरम की रोचकता इन्हीं दो मंदिरों के बीच के प्रतिस्पर्धा के कारण बढ़ जाती है। ये विशेष पारंपरिक ढोल नगाड़े और ये कलाकार भी हाथियों के अलावा त्योहार के मुख्य आकर्षण होते हैं। बताया जाता है कि इस त्योहार के लिए 250 से अधिक कलाकार यहां आकर अपनी कला को लोगों के बीच दिखाते हैं। कहा जाता है कि पर्व के दौरान ढोल बजाने वाले ये कलाकार स्वयं भगवान का रूप होते हैं तो इन्हें राज्य में विशेष सम्मान दिया जाता है। त्रिशूर पूरम उत्सव के अंत में ये दोनों समूह वडक्कुमनाथ मन्दिर के पश्चिमी द्वार से अंदर आते हैं और दक्षिणी द्वार से बाहर जाते हैं, लेकिन इस दौरान वे जिस भाव-भंगिमा से एक-दूसरे की आंखों में आंखें डाल कर देखते हैं, वह काबिलेगौर होता है, इससे दोनों समूहों के बीच के प्रतिस्पर्धा का पता साफ़-साफ़ लग जाता है। यह प्रतिस्पर्धा न केवल हाथियों की साज-सज्जा, कलियारपट्टू नृत्य और कुडमट्टम प्रतियोगिता के रूप में दिखता है, बल्कि दोनों समूहों के बीच आतिशबाजियों की टक्कर के रूप में भी होती है। आतिशबाजियों का प्रतिस्पर्धा एक तरह से यहां का 'ग्रांड फिनाले' है, जो सुबह के तीन-साढ़े तीन बजे से शुरू हो जाती है। भांति-भांति की आतिशबाजियों की आकर्षक और चौंधिया देनेवाली रौशनी से त्रिशूर का आसमान जगमगा उठता है। निस्संदेह यह इस उत्सव का एक विशेष आकर्षण है। इस उत्सव के अंतिम दो दिन काफी रोचक और देखने लायक होते हैं । केरल के विभिन्न मंदिरों से राज्य के सर्वश्रेष्ठ हाथियों को पूरम त्यौहार में भाग लेने के लिए त्रिशूर भेजा जाता है। त्रिशूर पूरम का त्योहार भारत के अन्य शहरों के त्योहारों की तरह ही मनाया जाता है। जैसे यह उत्तर प्रदेश के कुंभ मेला, मैसूर के विजयदशमी एवं उड़ीसा की रथ यात्रा जिनमें अपार जन समूह भाग लेता है। केरल वासियों की इस त्योहारह के प्रति गहरी आस्था होती है। इस त्योहार को वो भगवान का आशीर्वाद मान कर दिल से मनाते हैं और मंगल जीवन की कामना करते हैं।
त्रिशूर पूरम उत्सव
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