पुष्कर में दो चीजों की मान्यता है। एक तो यहां के ब्रह्मा जी के मंदिर और सरोवर की और दूसरी मेले की। जिस तरह मंदिर में आस्था का महाकुंभ होता है उसी तरह मेले में संस्कृति और मेल मिलाप का भी एक महाकुंभ देखने को मिलता है। पुष्कर मेला कई साल से चला आ रहा है। इसको शुरू करने के पीछे भी एक कहानी है। चलिये पहले पुष्कर मंदिर के बारे में जान लेते हैं



पुष्कर मंदिर का इतिहास

अजमेर से कुछ किलोमीटर आगे चलने पर आता है भव्य सरोवर और उसके आस पास मंदिर। ये मंदिर भगवान ब्रह्मा जी का है। माना जाता है कि पूरी दुनिया में ये ब्रह्मा जी का एकलौता मंदिर है। पुष्कर नाम का अर्थ होता है सरोवर जो कि पुष्प से बना हो। कहा जाता है कि भगवान ब्रह्मा जी के हाथ से एक असुर से युद्ध के दौरान कमल गिर गया था और जहां कमल गिरा वहां पर सोरवर बन गया। एक अन्य कथा के अनुसार समुद्रमंथन से निकले अमृत कलश को छीनकर जब एक राक्षस भाग रहा था तब उसमें से कुछ बूँदें इसी तरह सरोवर में गिर गईं तभी से यहाँ की पवित्र झील का पानी अमृत के समान स्वास्थ्यवर्धक हो गया।


क्यों है ब्रह्मा जी का सिर्फ एक ही मंदिर

ऐसा कहा जाता है कि ब्रह्मा ने संसार की भलाई के लिए ब्रह्मा जी ने यहां एक यज्ञ करने का फैसला किया। ब्रह्मा जी यज्ञ करने के लिए पुष्कर पहुंच गए लेकिन उनकी पत्नी सावित्री नहीं पहुंचीं। यज्ञ को पूर्ण करने के लिए उनके साथ उनकी पत्नी का होना जरूरी था। सावित्री जी के नहीं पहुंचने की वजह से ब्रह्मा जी ने गुर्जर समुदाय की एक कन्या गायत्री से विवाह कर इस यज्ञ को शुरू किया। उसी दौरान देवी सावित्री वहां पहुंची और ब्रह्मा के बगल में दूसरी कन्या को बैठा देख क्रोधित हो गईं।
उन्होंने ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि देवता होने के बावजूद कभी भी उनकी पूजा नहीं होगी। सावित्री के इस रुप को देखकर सभी देवता डर गए। सभी ने सावित्री जी से विनती की कि अपना श्राप वापस ले लीजिए, लेकिन उन्होंने किसा की न सुनी। जब गुस्सा ठंडा हुआ तो सावित्री ने कहा कि इस धरती पर सिर्फ पुष्कर में ही आपकी पूजा होगी।
तीर्थराज पुष्कर को सब तीर्थों का गुरु कहा जाता है। इसे धर्मशास्त्रों में पाँच तीर्थों में सर्वाधिक पवित्र माना गया है। पुष्कर, कुरुक्षेत्र, गया, हरिद्वार और प्रयाग को पंचतीर्थ कहा गया है।

पुष्कर में ब्रह्माजी का मंदिर वीडियो



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May (Baisakh/Jyeshta)​