रक्षा बंधन यानि राखी हर साल सावन की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। कई सदियों से रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जा रहा है , लेकिन इसकी शुरुआत कहां से हुई है ये अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है। और इसके पीछे कई कहानियां भी हैं। चलिये आपको कुछ ऐसी ही कथाएं पढ़ाते हैं।

रक्षाबंधन कथाएं

श्रीकृष्ण और द्रौपदी



जब श्रीकृष्ण ने शिशुपाल का वध किया था तब उनकी उंगली पर खून निकल आया था। द्रौपदी वहीं थीं और अपनी साड़ी का पल्ला फाड़कर उंगली में बांध दिया। उस दिन भी पूर्णिमा ही थी। श्रीकृष्ण ने इस राखी का उपकार चीरहरण के वक्त साड़ी बढ़ाकर चुकाया था। जैसे कि हर भाई अपनी बहन की रक्षा के लिये प्रतिबद्ध होता है।

सिकंदर की पत्नी ने बांधी राखी



सिकंदर अब पुरुवास से लड़ाई करने जा रहा था। पुरुवास बहुत ताकतवर था। सिकंदर की पत्नी को उसकी चिंता हुई और उसने पुरुवार सो राखी भेज कर मुहंबोला भाई बना लिया। पुरुवास ने सिकंदर को नहीं मारने का वचन दिया और इसी का सम्मान करते हुए युद्ध के दौरान उसने सिकंदर की जान बख्श दी।

कर्णावती और हुमायूं



बहादुरशाह मेवाड़ पर हमला करने वाला था। मेवाड़ की रानी कर्णावती को इसकी खबर लग गई। रानी लड़ने में सक्षम नहीं थी इसलिये उसने हुमायूं को राखी भेज कर रक्षा करने को कहा। हुमायूं मुसलमान था पर राखी का कर्ज चुकाने के लिये उसने बहादुरशाह के खिलाफ लड़ाई की और मेवाड़ की रक्षा की।

महाभारत युद्ध के दौरान

 
युधिष्ठिर ने जब श्रीकृष्ण से पूछा कि सेना की रक्षा कैसे हो सकती है तो उन्होंने उसे राखी बांधने को कहा था। श्रीकृष्ण ने कहा कि इस धागे में इतनी शक्ति है कि ये हर आपत्ति से छुटकारा पा सकते हैं।

राजा महाबलि और मां लक्ष्मी

जब वामन अवतार लेकर राजा महाबलि को विष्णु भगवान ने पाताल लोक भेज दिया तब महाबलि ने एक वर मांग था कि वो जब भी सुबह उठें तो उन्हें भगवान विष्णु के दर्शन हों। अब हर रोज विष्णु राजा बलि के सुबह उठने पर पाताल लोक जाते थे। ये देखकर माता लक्ष्मी व्याकुल हो उठीं। तब नारद मुनि ने सहाल दी कि अगर वो राजा बलि को भाई बना लें और उनसे विष्णु की मुक्ति का वचन ले लें तो सब सही हो सकता है। इस पर मां लक्ष्मी एक सुंदर स्त्री का भेष धरकर रोते हुए बलि के पास पहुंची और कहा कि उनका कोई भाई नहीं है जिससे वे दुखी हैं। राजा बलि ने उनसे कहा कि वे दुखी न हों आज से वे उनके भाई हैं। भाई बहन के पवित्र रिश्ते में बंधने के बाद मां लक्ष्मी ने बलि से उनके पहरेदार के रूप में सेवाएं दे रहे भगवान विष्णु को अपने लिए वापस मांग लिया और इस प्रकार नारायण संकट से मुक्त हुए।

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May (Baisakh/Jyeshta)​