भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है जहां कई धर्मों के कई त्योहार मनाए जाते हैं। यहां सभी त्यौहारों को एक समान सम्मान दिया जाता है। इन्हीं समुदायों में से एक है मुस्लिम समुदाय। मुस्लिम समुदायों के लिए रमज़ान एक अत्यंत पवित्र महीना है। इस्लामी कैलेंडर के अनुसार यह मुस्लिम कैलेंडर का नौवां महीना होता है। मुस्लिम धर्म में इसे सबसे पाक एवं महत्वपूर्ण महीना माना जाता है क्योंकि रमज़ान के महीने को इबादत का महीना कहा जाता है। इस दौरान बंदगी करने वाले हर शख्स की ख्वाहिश अल्लाह पूरी करता है। इसमें सभी मुस्लिम समुदाय के लोग एक महीना रोजा रखते हैं। वो रमज़ान के पवित्र महीने के नियमों का पालन करते हैं। रमज़ान का महीना मुस्लिम समुदायों को उनके अल्लाह के करीब लाने का महीना होता है। इस महीने में सभी मुस्लिम समुदाय अपने बुरे कर्मों और आदतों का त्याग करते हैं और अल्लाह से नेक रास्ते पर चलने की इबादत करते हैं। रमज़ान को एक धन्य महीना माना जाता है, जिसमें मुसलमान पूरे महीने के दौरान उपवास करते हैं और रोज़ाना प्रार्थना करते हैं। इस महीने के दौरान, लोग कई धार्मिक कर्म करते हैं। माना जाता है कि इस पवित्र महीने में पैगंबर मुहम्मद को अल-कुर का पहला प्रकाशन मिला था। रमज़ान की आखिरी दस विषम रातों में से एक में मुस्लिम समुदाय में रमज़ान को इसलिए भी खास माना जाता है क्योंकि इसी दौरान इस्लामिक पैगम्बर मोहम्मद के सामने कुरान की पहली झलक पेश की गई थी। लिहाजा रमज़ान को कुरान के जश्न का भी मौका माना जाता है। रमज़ान एक अरेबिक शब्द है। ये अरेबिक के रमीदा और रमद शब्द से मिलकर बना है। इसका मतलब चिलचिलाती गर्मी और सूखापन होता है। रमज़ान का महीना स्वंय पर नियंत्रण करना सिखाता है। इस वर्ष रमज़ान का उपवास 23 अप्रैल (गुरुवार) से 23 मई (शनिवार) तक है।
रमज़ान

रमज़ान का महत्व

मुस्लिम समुदायों के लिए रमज़ान के महीने का बहुत महत्व होता है। यह महीना आत्मा को परमात्मा से मिलाने का महीना माना जाता है। मस्लिम समुदायों का मानना है कि इस महीने में रोजा रखने से अल्लाह की असीम कृपा प्राप्त होती है। रमज़ान की शुरुआत सन् दो हिजरी से हुई थी और तभी से अल्लाह के बंदों पर जकात भी फर्ज की गई थी। रमज़ान के महीने में अल्लाह के लिए हर रोजेदार बहुत खास होता है और खुदा उसे अपने हाथों से बरकत और रहमत नवाजता है। इस माह में बंदे को 1 रकात फर्ज नमाज अदा करने पर 70 रकात नमाज का सवाब (पुण्य) मिलता है। साथ ही इसमें शबे कद्र की रात में इबादत करने पर 1 हजार महीनों से ज्यादा वक्त तक इबादत करने का सवाब हासिल होता है। कुरान शरीफ में लिखा है कि मुसलमानों पर रोजे इसलिए फर्ज किए गए हैं ताकि इस खास बरकत वाले रूहानी महीने में उनसे कोई गुनाह नहीं होने पाए। यह खुदाई असर का नतीजा है कि रमज़ान में लगभग हर मुसलमान इस्लामी नजरिए से खुद को बदलता है और हर तरह से अल्लाह की रहमत पाने की कोशिश करते हैं। इस महीनें में बुरे कर्म ना करने के कारण और कुरान शरीफ का पाठ एवं नमाज अदा करन के कारण मुस्लिम दिल पवित्र और साफ होते हैं जिससे वो खुदा के बंदे बन जाते हैं। उर्ष वर्ष के चंद्र कैलेंडर के आधार पर रमज़ान 29 या 30 दिनों तक मनाया जाता है। जिसके बाद ईद-उल फितर मना कर इस पाक महीने का समापन किया जाता है। यह महीना कई मायनों में अलग और खास है। अल्लाह ने इसी महीने में दुनिया में कुरान शरीफ को उतारा था जिससे लोगों को इल्म और तहजीब की रोशनी मिली। साथ ही यह महीना मोहब्बत और भाईचारे का संदेश देने वाले इस्लाम के सार-तत्व को भी जाहिर करता है। रोजा न सिर्फ भूख और प्यास बल्कि हर निजी ख्वाहिश पर काबू करने की कवायद है। इससे मोमिन में न सिर्फ संयम और त्याग की भावना मजबूत होती है बल्कि वह गरीबों की भूख-प्यास की तकलीफ को भी करीब से महसूस कर पाता है। रमज़ान का महीना सामाजिक ताने-बाने को भी मजबूत करने में मददगार साबित होता है। इस महीने में सक्षम लोग अनिवार्य रूप से अपनी कुल संपत्ति का एक निश्चित हिस्सा निकालकर उसे 'जकात' के तौर पर गरीबों में बांटते हैं।

सहरी

रमज़ान के महीने के दौरान, नियमित रूपसे लोग सूरज उगने से पहले ही उठकर सहरी करते है, सहरी खाने का वक्त सूरज निकलने से करीब डेढ़ घंटे पहले का होता है। सहरी खाने के बाद रोज़ा शुरू हो जाता है। रोजेदार पुरे दिन कुछ भी खाता पीता नहीं है। शाम के समय तय वक्त पर इफ्तार कर रोज़ा खोला जाता है। सामान्यतौर पर सूरज डूबने के 3 से 4 मिनट बाद ही रोजा खोल लेना चाहिए। फिर रत की इशा की नमाज करीब 9 बजे पढ़ी जाती है और उसके बाद तरावीह की नमाज अदा की जाती है। इस समय मस्जिदों में क़ुरान पढ़ी जाती है। ये सिलसिला पुरे महीने चलता रहता है। महीने के आखिर में 29 का चाँद होने पर ईद मनाई जाती है। 29 का चाँद नहीं दिखने पर 30 रोजे पुरे कर अगले दिन ईद का जश्न मनाया जाता है।

फज्र
मुसलमानों के लिए, फ़ज्र रोज़ाना पांच नमाजों को अदा करने को कहते हैं। अल्लाह ने अपने बन्दों पर एक दिन और रात में पाँच नमाज़ें अदा करनी अनिवार्य की हैं जो अल्लाह तालाह की हिक्मत की अपेक्षा के अनुसार कुछ निश्चित और निर्धारित समय के साथ विशिष्ट हैं, ताकि बन्दा इन नमाज़ों के अंदर इन सभी वक़्तों की अवधि के दौरान अपने सर्वशक्तिमान रब के साथ संपर्क में रहे।

इफ्तार 
इफ्तार में मगरीब प्रार्थना की जाती है। सूर्यास्त के बाद भोजन किया जाता है जिसे इफ्तार कहते हैं। इस समय सभी मस्लिम लोग उनके रिश्तेदार आपस में मिलकर इफ्तार करते हैं।

तारावीह और ईशा
विशेष रात की प्रार्थनाओं को बुलाया जाता है, तारावी प्रार्थनाएं रात में आयोजित की जाती हैं और आखिर में ईशा प्रार्थनाएं की जाती है। हैं। दुनिया भर में मस्जिदों में इन प्रार्थनाओं में सुनाया जाता है।
रमज़ान

शिया और सुन्नी की अलग है मान्यता

आमतौर पर शिया और सुन्नी दोनों ही रमज़ान एक जैसे ही मनाते हैं, लेकिन दोनों के तरीकों में थोड़ा फर्क होता है। मसलन सुन्नी समुदाय के लोग अपना रोज़ा सूरज छिपने पर खोलते हैं। वहीं शिया पूरी तरह से अंधेरा होने के बाद रोज़ा खोलते हैं।

कुछ परिस्थिति में रोज़ा ना रखने की होती है इज़ाजत

यूं तो  रमज़ान के महीने में हर मुस्लिम व्यक्ति रोज़ा रख अपने खुदा को याद कर सकता है। लेकिन कुछ परिस्थितियों जैसे बीमार होना, यात्रा करना, गर्भावस्था में होना ,मासिक धर्म से पीड़ित होना एवं बुजुर्ग होने पर रोज़ा ना रखने की छूट होती है।

कैसा होता है रोज़ा

रमज़ान में रोज़ा किया जाता है जिसे अल्लाह की इबादत भी कहते हैं।  रोज़े के दौरान रोज़ेदार पूरे दिन बिना कुछ खाए-पिए रहते हैं। हर दिन सुबह सूरज उगने से पहले थोड़ा खाना खाया जाता है। इसे सुहूर (सेहरी) कहते हैं, जबकि शाम ढलने पर रोज़ेदार जो खाना खाते हैं उसे इफ्तार कहते हैं।

रोज़ेदार हर रोज खजूर खाकर रोज़ा तोड़ते हैं। एक इस्लामिक साहित्य के मुताबिक अल्लाह के एक दूत को अपना रोज़ा खजूर से तोड़ने की बात लिखी गई है। इसी के आधार पर सभी रोज़ेदार खजूर खाकर सेहरी एवं इफ्तार मनाते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी खजूर खाने के फायदे हैं। खजूर लीवर, पेट की दिक्कत व कमजोरी जैसी अन्य बीमारियों को ठीक करता है, इसलिए रोज़ेदार इसे खाते हैं।
रमज़ान के दौरान खास दुआएं पढ़ी जाती हैं। हर दुआ का समय अलग अलग होता है। दिन की सबसे पहली दुआ को फज्र कहते हैं। जबकि रात की खास दुआ को तारावीह कहते हैं।

रमज़ान में बुराई की होती है मनाही

रमज़ान के दौरान रोज़ेदारों को बुरी सौहबतों से दूर रहना चाहिए, उन्हें न तो झूठ बोलना चाहिए, न पीठ पीछे किसी की बुराई करनी चाहिए और न ही लड़ाई झगड़ा करना चाहिए। इस्लामिक पैगंबरों के मुताबिक ऐसा करने से अल्लाह की रहमत मिलती है।
रोज़ा यानी संयम। आप कितना संयम बरत सकते हैं, इस बात की परीक्षा इस दौरान होती है। तमाम बुराइयों से दूर रहना चाहिये। गलत या बुरा नहीं बोलना, आंख से गलत नहीं देखना, कान से गलत नहीं सुनना, हाथ-पैर तथा शरीर के अन्य हिस्सों से कोई नाजायज़ अमल नहीं करना।
रोज़े के दौरान किसी भी स्‍त्री को गलत नियत से नहीं देखना चाहिए। इस बात की सख्त मनाही होती है। यहां तक अपनी पत्नी तक को नहीं। पत्‍नी के लिये मन में कामवासना नहीं जागनी चाहिये। गैर औरत के बारे में तो ऐसा सोचना ही हराम है।
रोज़े में दिन भर भूखा व प्यासा ही रहा जाता है, जिससे इन्सान में एक वक्ती कमज़ोरी आ जाती है और वह किसी भी हैवानी काम के विषय में नहीं सोचता, शोर नहीं मचाता, हाथापाई नहीं करता इत्यादि। जिस स्‍थान पर ऐसा हो रहा हो, वहां रोज़ेदार के लिए खड़ा होना मना है।
रोज़े के वक्‍त झूठ नहीं बोलना चाहिये। हिंसा, बुराई, रिश्वत तथा अन्य तमाम गलत कामों से दूर रहना चाहिये। इसकी मश्क यानी (अभ्यास) पूरे एक महीना कराया जाता है ताकि इंसान पूरे साल तमाम बुराइयों से बचे और इंसान से हमदर्दी का भाव रखे। शराब का सेवन इस्‍लाम में हराम है। रमज़ान पाक में के दौरान इसके अलावा भी कोई भी नशा सिगरेट, बीड़ी, तम्‍बाकू, आदि हराम है।

रोज़े में करना चाहिए नेक काम

रमज़ान के माह में मुसलमान के हर नेक अमल यानी पुण्य के कामों का सबाव 70 गुना बढ़ा दिया जाता है। 70 गुना अरबी में मुहावरा है, जिसका मतलब होता है बेशुमार। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अपने पुण्य के कामों में अधिक से अधिक हिस्सा लेना चाहिये। दान पुण्‍य करें ज़कात इसी महीने में अदा की जाती है। यदि कोई व्यक्ति अपने माल की ज़कात इस महीने में निकालता है तो उसको 1 रुपये की जगह 70 रुपये अल्लाह की राह में देने का पुण्य मिलता है।
रमज़ान के दौरान पूरे महीने कुरान पढ़ना चाहिए। पैगंबरों के मुताबिक कुरान को इस्लाम के पांच स्तम्भों में से एक माना गया है। रोज़े के वक्त कुरान पढ़ने से खुदा बंदों के गुनाह माफ करते हैं और उनके लिए जन्नत का दरवाजा खोलते हैं।
रमज़ान के वक्त रोज़ेदारों को दरियादिली दिखानी चाहिए, उन्हें दान(जकात) देना चाहिए। इससे उन्हें सबाब(पुण्य) मिलेगा। कई लोग इस दौरान मस्जिदों में मुफ्त में लोगों को खाना खिलाते हैं। जबकि कई लोग जरूरतमंदों को जरूरी सामान भी बांटते हैं।

रमज़ान में क्या ना करें

रमज़ान में रोजा रखन को इसलिए कहा जाता है ताकि मुस्लिम लोग कम से कम एक महीने तक अपने पापों का प्रायश्चित कर सकें। गलत कामों से दूर रहें। संयम में रहें। रोज़ा यानी संयम होता है। रमज़ान में यह देखा जाता है कि कौन खुद पर कितना नियमंत्रण रख सकता है। रमज़ान के दौरान कई बातों की मनाही होती है। रोजेदार को या किसी भी मुस्लिम जन को रमज़ान के महीने में गलत कार्य नहीं करने चाहिए गलत या बुरा नहीं बोलना, आंख से गलत नहीं देखना, कान से गलत नहीं सुनना, हाथ-पैर तथा शरीर के अन्य हिस्सों से कोई नाजायज़ अमल नहीं करना। रोज़े में दिन भर भूखा व प्यासा ही रहा जाता है, जिससे इन्सान में एक वक्ती कमज़ोरी आ जाती है और उसके मन से हिंसा की भावना निकल जाती है जिससे लड़ाई-झगड़ा करने से वो खुद को रोक पाता है। रोज़े के दौरान किसी भी स्रील को गलत नियत से नहीं देखना चाहिए। अपनी पत्नी तक से संबध नहीं बनाना चाहिए। ब्रह्मचार्य का पालन करना चाहिए। शराब का सेवन इस्लानम में वर्जित है। रमज़ान के महीने में किसी भी तरह के नशे से बचना चाहिए। गुटखा, पान, तंबाकू, सिगरेट, एवं अन्य नशीले पदार्थों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

रमज़ान में क्या करें

रमज़ान का महीना जहां कुछ चीजों पर पाबंदी लगाता है वहीं इस महीने में दान पुण्य करने की अत्यंत महीमा होती है। रमज़ान को नेकियों का मौसम कहा जाता है। इस महाने में अल्लाह की इबादत पूरी ईमानदारी से करनी चाहिए, इस्लाम के नियमों का पालन करना चाहिए। गरीब, जरुरतमंदो के साथ हमदर्दी दिखाकर उनकी मदद करनी चाहिए। उन्हें जरुरत और अपनी हैसियत अनुसार दान करना चाहिए। ज़कात, सदक़ा, फित्रा, खैर खैरात, ग़रीबों की मदद, दोस्त अहबाब में जो ज़रुरतमंद हैं उनकी मदद करना ज़रूरी समझा और माना जाता है। अपनी ज़रूरीयात को कम कर और दूसरों की ज़रूरतो को पूरा करना चाहिए। ज़कात इसी महीने में अदा की जाती है। यदि कोई व्यक्ति अपने माल की ज़कात इस महीने में निकालता है तो उसको 1 रुपये की जगह 70 रुपये अल्लाह की राह में देने का पुण्य मिलता है। इस महीने अल्लाह का नाम लेना चाहिए और साफ मन से उनसे जन्नत में जाने की प्रार्थना करनी चाहिए।

विदेशों में रमज़ान

रमज़ान व्यंजनों इंडोनेशिया में हर साल अपने द्वीप जावा पर एक विशाल रमज़ान उत्सव आयोजित होता है। जकार्ता में हर सुबह बड़ी आतिशबाजी से दिन की शुरुआत होती है। ताकि लोग हंसी खुशी अपना दिन शुरु कर सकें। मिस्र और काहिरा रमज़ान उत्सव के प्रतीक के रूप में लाइट जलाई जाती है। अल्जीरिया, मिस्र, ईरान और कुवैत जैसे देश गंभीर रूप से मुस्लिमों को दंडित करते हैं जो दिन के दौरान भोजन का पालन करने में विफल रहते हैं या पाए जाते हैं। रमज़ान के दौरान, उपवास करने के लिए दबाव डालने के उद्देश्य से यू.ए.ई., कतर और उमान जैसे कई देश कानूनी रूप से कामकाजी घंटों को केवल 6 घंटे प्रति दिन कर देते हैं। पूर्वी सऊदी अरब और तुर्की जैसे देशों में अपराध दर इस दौरान कम हो जाती है। इस समय के दौरान, कई लोग सऊदी अरब में मक्का के पवित्र गंतव्य की यात्रा करने के लिए जाते हैं।
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