प्रतिवर्ष उड़ीसा के पुरी में आषाढ़ मास की शुक्ल द्वितिया को भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा होती है। 10 दिनों तक चलने वाली इस यात्रा की अपार महिमा है। देश-विदेश के कोने-कोने से लोग इस यात्रा को देखने आते हैं। यह रथयात्रा उड़ीसा के जगन्नाथ मंदिर से आयोजित की जाती है जिसमें भक्तों की संख्या लाखों से भी उपर होती है। इस अवसर के दौरान हजारों भक्त पुरी में आते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि भगवान जगन्नाथ के रथ की मात्र झलक मिल जाने से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाएगी। पुरी में भगवान जगन्नाथ के रुप में भगवान श्रीकृष्ण के साथ, उनकी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र उपस्थित हैं। इन तीनों का विशाल रथ 10 दिनों के लिए बाहर निकलता है ऐसा माना जाता है कि भगवान जगन्नाथ अपनी मौसी के यहां 10 दिनों के लिए जाते हैं। हजारों भक्त इन रथों को 3 किमी दूर गुंडिचा मंदिर में खींचते हुए ले जाते हैं। ओडिशा के पुरी नगर में होने वाली भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि, विश्व के सबसे विशाल और महत्वपूर्ण धार्मिक उत्सवों में से एक है, जिसमें भाग लेने के लिए पूरी दुनिया से लाखों श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं। इस साल यह रथयात्रा 4 जुलाई से शुरु होगी। 

जगन्नाथ की रथयात्रा से जुड़ी रोचक बातें

पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर भारत के चार पवित्र धामों में से एक है। वर्त्तमान मंदिर 800 वर्ष से अधिक प्राचीन है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण, जगन्नाथ रूप में विराजित है। साथ ही यहां उनके बड़े भाई बलराम (बलभद्र या बलदेव) और उनकी बहन देवी सुभद्रा की पूजा की जाती है। पुरी रथयात्रा के लिए बलराम, श्रीकृष्ण और देवी सुभद्रा के लिए तीन अलग-अलग रथ निर्मित किए जाते हैं। रथयात्रा में सबसे आगे बलरामजी का रथ, उसके बाद बीच में देवी सुभद्रा का रथ और सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ श्रीकृष्ण का रथ होता है। इसे उनके रंग और ऊंचाई से पहचाना जाता है। बलरामजी के रथ को 'तालध्वज' कहते हैं, जिसका रंग लाल और हरा होता है। देवी सुभद्रा के रथ को 'दर्पदलन' या ‘पद्म रथ’ कहा जाता है, जो काले या नीले और लाल रंग का होता है, जबकि भगवान जगन्नाथ के रथ को ' नंदीघोष' या 'गरुड़ध्वज' कहते हैं। इसका रंग लाल और पीला होता है। भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ 45.6 फीट ऊंचा, बलरामजी का तालध्वज रथ 45 फीट ऊंचा और देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ 44.6 फीट ऊंचा होता है। ये सभी रथ नीम की पवित्र और परिपक्व काष्ठ (लकड़ियों) से बनाये जाते है, जिसे ‘दारु’ कहते हैं। इसके लिए नीम के स्वस्थ और शुभ पेड़ की पहचान की जाती है, जिसके लिए जगन्नाथ मंदिर एक खास समिति का गठन करती है। इन रथों के निर्माण में किसी भी प्रकार के कील या कांटे या अन्य किसी धातु का प्रयोग नहीं होता है। रथों के लिए काष्ठ का चयन बसंत पंचमी के दिन से शुरू होता है और उनका निर्माण अक्षय तृतीया से प्रारम्भ होता है। जब ये तीनों रथ तैयार हो जाते हैं, तब 'छर पहनरा' नामक अनुष्ठान संपन्न किया जाता है। इसके तहत पुरी के गजपति राजा पालकी में यहां आते हैं और इन तीनों रथों की विधिवत पूजा करते हैं और ‘सोने की झाड़ू’ से रथ, मण्डप और रास्ते को साफ़ करते हैं। आषाढ़ माह की शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि को रथयात्रा आरम्भ होती है। ढोल, नगाड़ों, तुरही और शंखध्वनि के बीच भक्तगण इन रथों को खींचते हैं। कहते हैं, जिन्हें रथ को खींचने का अवसर प्राप्त होता है, वह महाभाग्यवान माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, रथ खींचने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती है। शायद यही बात भक्तों में उत्साह, उमंग और अपार श्रद्धा का संचार करती है।




मौसी के यहां सात दिन विश्राम करते हैं भगवान जगन्नाथ

जगन्नाथ मंदिर से रथयात्रा शुरू होकर पुरी नगर से गुजरते हुए ये रथ गुंडीचा मंदिर पहुंचते हैं। यहां भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा सात दिनों के लिए विश्राम करते हैं। गुंडीचा मंदिर में भगवान जगन्नाथ के दर्शन को ‘आड़प-दर्शन’ कहा जाता है। गुंडीचा मंदिर को 'गुंडीचा बाड़ी' भी कहते हैं। यह भगवान की मौसी का घर है। इस मंदिर के बारे में पौराणिक मान्यता है कि यहीं पर देवशिल्पी विश्वकर्मा ने भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी की प्रतिमाओं का निर्माण किया था। कहते हैं कि रथयात्रा के तीसरे दिन यानी पंचमी तिथि को देवी लक्ष्मी, भगवान जगन्नाथ को ढूंढते हुए यहां आती हैं। तब द्वैतापति दरवाज़ा बंद कर देते हैं, जिससे देवी लक्ष्मी रुष्ट होकर रथ का पहिया तोड़ देती है और ‘हेरा गोहिरी साही पुरी’ नामक एक मुहल्ले में, जहां देवी लक्ष्मी का मंदिर है, वहां लौट जाती हैं। बाद में भगवान जगन्नाथ द्वारा रुष्ट देवी लक्ष्मी मनाने की परंपरा भी है। यह मान-मनौवल संवादों के माध्यम से आयोजित किया जाता है, जो एक अद्भुत भक्ति रस उत्पन्न करती है।

बहुड़ा यात्रा

आषाढ़ माह के दसवें दिन सभी रथ पुन: मुख्य मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। रथों की वापसी की इस यात्रा की रस्म को बहुड़ा यात्रा कहते हैं। जगन्नाथ मंदिर वापस पहुंचने के बाद भी सभी प्रतिमाएं रथ में ही रहती हैं। देवी-देवताओं के लिए मंदिर के द्वार अगले दिन एकादशी को खोले जाते हैं, तब विधिवत स्नान करवा कर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच देव विग्रहों को पुनः प्रतिष्ठित किया जाता है। वास्तव में रथयात्रा एक सामुदायिक पर्व है। इस अवसर पर घरों में कोई भी पूजा नहीं होती है और न ही किसी प्रकार का उपवास रखा जाता है। एक अहम् बात यह कि रथयात्रा के दौरान यहां किसी प्रकार का जातिभेद देखने को नहीं मिलता है। समुद्र किनारे बसे पुरी नगर में होने वाली जगन्नाथ रथयात्रा उत्सव के समय आस्था और विश्वास का जो भव्य वैभव और विराट प्रदर्शन देखने को मिलता है, वह दुनिया में और कहीं दुर्लभ है।

जगन्नाथ यात्रा से जुड़ी कथाएं

यह त्यौहार प्राचीन काल से मनाया जा रहा है। कहा जाता है कि इसकी उत्पत्ति के बारे में कई कहानियां प्रचलित है जिसके अनुसार, जगन्नाथ ने हर हफ्ते एक सप्ताह के लिए अपने जन्मस्थान पर जाने की अपनी इच्छा व्यक्त की है। जिसके फलस्वरुप उन्हें हर साल गुंडिचा मंदिर ले जाया जाता है। यह भी कहा जाता है कि एक बार भगवान श्रीकृष्ण सो रहे थे तभी वो स्वपन में राधे-राधे चिल्लाने लगे जिसे सुन रुकमणि और अन्य रानियों ने रोहिणी से राधा के विषय में पूछा तो रोहिणी ने सुभद्रा को कहा कि दरवाजें पर बैठ जाएं और किसी को अंदर ना आने दें इसके बाद उन्होंने सभी रानियों को श्रीकृष्ण और राधा की रासलीला सुनाई। इतने में भगवान कृष्ण और बलराम आ गए, लेकिन सुभद्रा ने उन्हें अंदर आने नहीं दिया। किन्तु तीनों बाहर से ही रासलीला सुनकर लीन हो गए, उन्हें अपनी सुधी नहीं रही। तभी से यह जगन्नाथ यात्रा निकाली जाती है। कुछ हिंदुओं का मानना है कि जगन्नाथ विष्णु का अवतार है चूंकि विष्णु की चार भुजाएं हैं, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन विष्णु की चार भुजाओं का प्रतिनिधित्व करतें हैं।
 एक पौराणिक कथा के अनुसार रथ की सवारी की उत्पत्ति, तब हुई जब एक जहरीले तीर ने गलती से कृष्ण को मार डाला, उसका शरीर एक पेड़ के नीचे छोड़ दिया गया था। बाद में, किसी ने उनका संस्कार किया और राख को एक बक्से में रख दिया था। विष्णु द्वारा निर्देशित इंद्रद्युम्मा ने दिव्य कारीगर विश्वकर्मा से उनके पवित्र अवशेषों से एक छवि को बनाने का अनुरोध किया। विश्वकर्मा इस कार्य को करने के लिए सहमत हुए, बशर्ते कि उन्हें पूरा होने तक निर्विवाद छोड़ दिया जाए। जब कई साल बीत गए, इंद्रद्युना अधीर हो गए और यह देखने के लिए चले गए कि काम कैसे प्रगति कर रहा है। जिसे देख विश्वकर्मा क्रोधित हो गए और काम आधा छोड़ कर चले गए। इसके बाद इंद्रदयुम्मा ने मूर्ति को रखने के लिए मंदिर का निर्माण कराया और भगवान जगन्नाथ की स्थापना की।

कैसे मनाते है जगन्नाथ रथ यात्रा

जगन्नाथ रथ यात्रा के दिन लोग जल्दी उठते हैं और जगन्नाथ की प्रार्थना करते हैं। रथों को पुरी मंदिर के सामने रखा जाता है। पुरी के राजा महान धूमधाम और समारोह के साथ देवताओं को उनके संबंधित रथों में लाते हैं। भक्त देवताओं से प्रार्थना करते हैं। राजा के वंशज रथ को साफ करते हैं और सुगंधित पानी छिड़कते हैं। केवल पुरी के राजा और नेपाल के राजा को मूर्तियां छूने की इजाजत है क्योंकि वे चंद्रवंशी वंश के हैं व कृष्ण के समान हैं। यात्रा पूरी होने पर हर साल, रथ तोड़ दिए जाते हैं, इसकी लकड़ी अवशेष और प्रतिकृति के रूप में बेची जाती है। हालांकि देवताओं की छवियां संरक्षित रखी जाती हैं। इस दिन राज्य में एक सार्वजनिक अवकाश होता है। सड़कों पर बच्चों को छोटे-छोटे रथों पर बैठाया जाता है। दुकानें और घरों को  फूल, रोशनी और रंगोली से सजाया जाता है। घरों में विशेष व्यंजन और मिठाईयां तैयार की जाती है। अधिकांश लोग मांसाहारी भोजन इन दिनों नहीं खाते। ज्यादातर लोग जुलूस में भाग लेते हैं और भगवान जगन्नाथ से प्रार्थना करते हैं कि सभी लोग सुख-शांति से जीवन व्यापन करें ताकि वो अगले साल फिर से जगन्नाथ रथयात्रा के दर्शन पा सकें।

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