रेणुका मेला हिमाचल प्रदेश राज्य में एक बेहद लोकप्रिय मेला है। यह सिर्मुर जिले में स्थित प्रसिद्ध रेणुका झील के तट पर आयोजित किया जाता है। यह नवंबर के महीने में आयोजित एक वार्षिक मेला है। मेले में एक बहुआयामी महत्व है। चूंकि किसी भी निष्पक्ष और त्योहार के रूप में रेणुका मेला अत्यधिक अवसर और आनंद के तरीके प्रदान करता है, यह विशेष रूप से हिंदुओं के लिए धार्मिक महत्व भी रखता है। रेणुका झील, हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में, नाहन से 40 किमी की दूरी पर स्थित है। यह हिमाचल प्रदेश के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है। समुन्द्र तल से 672 मीटर की ऊँचाई पर स्थित 3214 मीटर की परिधि के साथ रेणुका झील हिमाचल प्रदेश की सबसे बड़ी झील के रूप में जानी जाती है। झील का नाम देवी रेणुका के नाम पर रखा गया था। देवी रेणुका भगवान परशुराम की मां है। उन्हीं के नाम पर इस मेले का आयोजन किया जाता है। यह मेला अच्छी तरह से सड़क मार्ग से जुडा हुआ है। झील पर नौका विहार उपलब्ध है। एक शेर सफारी और एक चिड़ियाघर रेणुका के पास हैं। यह नवंबर में आयोजित एक वार्षिक मेला  है। प्रबोधिनी एकादशी की पूर्व संध्या पर पांच दिनों के लिए राज्य स्तरीय श्री रेणुका जी मेला श्री रेणुका जी झील हिमाचल में, अपने दिव्य मां श्री रेणुका जी के घर पर पुत्र भगवान परशुराम के आगमन के साथ शुरू होता है। पांच दिवसीय मेले के दौरान यहां देश भर से कई लाखों  भक्त भगवान परशुराम व उनकी मां रेणुका जी के दिव्य मिलन के पवित्र अवसर को देखने के लिए यहाँ आते हैं।
रेणुका मेला

रेणुका मेले की खासियत

जिला सिरमौर के रेणुका मेले की परंपरा सदियों पुरानी है। यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य, शांत वादी केवल रेणुकावासी, सिरमौरियों, हिमाचलियों की ही नहीं अपितु समस्त आर्य जाति की पवित्र धरोहर है। यहाँ के मेले को मानने और इसमें शामिल होने के लिए लोगों में असीम लालसा रहती है और यही कारण है कि मेले में आने से पूर्व लोग अपनी तैयारियाँ आरंभ कर देते हैं। मेले के पीछे प्रत्येक माता को अपने पुत्र से मिलने, लड़कियों को देवठन त्योहार मनाने, व्यापारियों को समान बेचने–ख़रीदने, युवक युवतियों को मेले में मिलने, बच्चों को मिठाइयाँ व खिलौने खरीदने, भक्तों की रेणुका यात्रा तथा स्नान करने तथा कृषकों को अपनी पैदावार बेचने के बाद अपने लिए आवश्यक वस्तु ख़रीदने का आकर्षण हर साल बना रहता है। रेणुका मेले में दशमी के दिन ग्राम जम्मु, जहाँ परशुराम का प्राचीन मंदिर है, में भगवान परशुराम की सवारी बड़ी धूम–धाम से खूब सजा–धजा के निकाली जाती है। इस सवारी में पुजारी के साथ वाद्य यंत्र होते है एवं चाँदी की पालकी में भगवान की मूर्ति होती है जिसे गिरि नदी ले जाया जाता है। इस शोभायात्रा में ढोल, नगाड़े, करनाल, रणसिंगा, दुमानु आदि बाजे बजाते हैं एवं उसके पीछे लोकप्रिय तीर–कमानों का खेल "ठोड़ा", नृत्य दल, स्थानीय नृत्य प्रदर्शन व अन्य सांस्कृतिक झलकियाँ दिखाई देती हैं। इस शोभा यात्रा के दौरान मार्ग में चढ़ावा चढ़ाने वालों की इतनी भीड़ होती है कि लोग देवता को भेंट हेतु दूर से ही पैसों और कपड़ों का चढ़ावा चढ़ाते हैं। इस दिन झील में नाव चलाने की अनुमति नही है इसलिए नौका विहार के प्रेमी झील की ओर हसरत भरी निगाह डालते हुए दूसरे दिन का इंतज़ार करते हैं। लोग मंदिरों में जाकर माता रेणुका व भगवान परशुराम को माथा टेकते हैं। यह मेला पूर्णमासी तक चलता रहता है। पूर्णमासी के स्नान को बहुत महत्व दिया जाता है जिस कारण लोग इसी दिन के स्नान के लिए उमड़ पड़ते हैं। इसके अलावा मेले में पहलवानों की कुश्तियाँ, सरकस, झूले, जादूघर, प्रदर्शनी, सिनेमा का भी बोलबाला रहता है। शाम के समय आतिशबाजी छूटती है एवं रात्रि के समय लोक संपर्क विभाग तथा अन्य संस्थाओं, आयोजकों के प्रयास से विभिन्न प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन होता है। तरह–तरह के परिधानों से सुसज्जित लोगों की भीड़ से बाज़ार और दुकानों में रौनक बनी रहती है। हर जगह लोग तरह–तरह की वस्तुएं ख़रीदते, खाते और आनंद लेते नज़र आते हैं। मेले में मां रेणुका (परशुराम की मां) के बलिदान का जश्न मनाकर उनका सम्मान किया जाता है। अपने पति के आदेश पर अपने बेटे द्वारा रेणुका की हत्या कर दी गई थी। इस प्रकार, मेला वास्तव में रेणुका और उसके बेटे की अमरता को सलाम करता है। हर साल हजारों भक्त अपने प्रिय देवताओं और देवियों की पूजा करने के लिए यहां एकत्रित होते हैं। मेले यहां स्थानीय लोगों को बहुत सकारात्मकता मिलती है।

रेणुका मेले का महत्व

रेणुका मेला धार्मिक महत्व के अलावा, कई गतिविधियों और घटनाओं से भरा हुआ है। नृत्य, संगीत, शॉपिंग बाजार, प्रदर्शनी, और कई अन्य कार्यक्रम रेणुका झील के तट पर आयोजित किए जाते हैं। मेले के दौरान बारह स्थानीय देवताओं की प्रक्रिया देवी के मंदिर की यात्रा करती है। तीर्थयात्रियों के दौरे के लिए कई खाद्य प्रबंधन और मनोरंजन मंडप भी स्थापित किए गए हैं। इस प्रकार यह पर्यटकों और आगंतुकों के लिए हिमाचल प्रदेश की संस्कृति एवं सभ्यता को समझने एवं उसे जाने का एक अच्छा अवसर है। मेले के दौरान एक पुराना अनुष्ठान भी होती है, जिसमें प्रसिद्ध देवताओं के नाम पर भाई और बहनों बनने की रस्म की जाती है। हिमाचल प्रदेश में बहुत सारे अद्भुत झील स्थित हैं, फिर भी, रेणुका झील उन सभी के बीच सबसे सुंदर है। झील के तट पर परशुराम और रेणुका देवी का मंदिर स्थित हैं।

रेणुका मेले की पौराणिक कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन समय में भृगवंशी ब्रह्रामण हैहय वंशीय क्षत्रियों के राजपुरोहति थे। इसी कुल में महर्षि जमदग्रि का जन्म हुआ। उनका विवाह इक्ष्वाकु वंश की कन्या रेणुका से हुआष जिन्होंने परशुराम को जन्म दिया। एक बार उनकी माता रेणुका नदी में जल भरने के लिए गयी वहां गन्धर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ विहार करता देख रेणुका कुछ देर तक वहीं रुक गयीं। जिसके कारण उन्हें घर वापस लौटने में देर हो गयी। इधर हवन में बहुत देरी हो चुकी थी। उनके पति जमदग्नि ने अपनी शक्तियों से उनके देर से आने का कारण जान लिया और उन्हें अपनी पत्नी पर बहुत गुस्सा आने लगा। जब रेणुका घर पहुंची तो जमदग्नि ने अपने सभी पुत्रों को उसका वध करने के लिए कहा। किन्तु उनका एक भी पुत्र साहस नहीं कर पाया। तब क्रोधवश जमदग्नि ने अपने चार पुत्रों को मार डाला। उसके बाद पिता की आज्ञा का पालन करते हुए परशुराम ने अपनी माता का वध कर दिया। अपने पुत्र से प्रसन्न होकर परशुराम ने उसे वरदान मांगने को कहा। परशुराम ने बड़ी ही चतुराई से अपने भाइयों और माता को पुनः जीवित करने का वरदान मांग लिया। जिससे उन्होंने अपने पिता का भी मान रख लिया और माता को भी पुनर्जिवित कर दिया। वहीं दूसरी और एक बार सहस्त्राजुर्न ऋषि जमद्ग्नि के आश्रम में आया और उसने कामधेनु गाय मांगी ऋषि ने गाय देन से मना कर दिया जिसके बाद सहस्त्र्राजुन ने उनकी हत्या कर दी। पति की मृत्यु होते देख माता रेणुका ने भी सरोवर में डूब कर प्राण त्याग दिए। जिसके बाद परशुराम ने सहस्त्राजुर्न सहित उसके वंश का नाश कर दिया और माता-पिता को पुनः जीवित किया। उनकी माता रेणुका ने वचन दिया कि वह हर वर्ष कार्तिक मास में उनसे मिलने आएगीं। इसी उपलक्ष्य में रेणुका मेले का आयोजन किया जाता है। यह मेला माता व पुत्र के भेंट करने का प्रतिक है।

रेणुका मेले का समय

हर साल हिमाचल प्रदेश में नवंबर महीने में रेणुका मेले को आयोजित किया जाता है। यह तीन से पांच दिन मेला होता है, जो नवंबर के पहले हफ्ते में मनाया जाता है। इस लोकप्रिय मेले में आनंद लेने और भाग लेने के लिए नवंबर के दौरान हजारों भक्त और पर्यटक यहां इकट्ठे होते हैं।

कैसे पहुंचे रेणुका मेले में

हवाई जहाज द्वारा
रेणुका मेले में पहुंचने के लिए निकटतम हवाई अड्डा देहरादून और चंडीगढ़ हैं, जो सड़क से नहान और रेणुका से उपलब्ध हैं। देहरादून और चंडीगढ़ के ले लिए भारतीय एयरलाइंस द्वारा दिल्ली से उड़ान भरी जाती है। राज्य के भीतर, राजधानी शिमला में हवाई अड्डा जुड़ा हुआ है, जहां से सड़क के रास्ते यहां पहुंचा जा सकता है।

रेल द्वारा
नहान के लिए, निकटतम रेलवे अंबाला, 100 किमी दूर है। देहरादून भी पोंटा साहिब से 65 किलोमीटर दूर रेलवे के रूप में कार्य करता है। दिल्ली से नियमित ट्रेन सेवाएं दोनों टर्मिनल को जोड़ती हैं।

सड़क मार्ग से
दिल्ली इस क्षेत्र के लिए प्रवेश बिंदु है। रेणुका पहुंचने के लिए, लगभग 350 किलोमीटर दूर दिल्ली से दो मार्ग हैं। दिल्ली से पहला मार्ग शाहबाद, नारायणगढ़, कला अंब और नहान से रेणुका तक है। दूसरा मार्ग दिल्ली से शुरू होता है और पिपली, यमुनागर से रेणुका तक जाता है। नहान और पोंटा के बीच की दूरी 45 किमी है; पोंटा और रेणुका के बीच 58 किमी की दूरी है। साकेती नहान से 22 किमी दूर है।

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