थाईपुसम उत्सव एक हिंदू त्योहार है जो दक्षिण भारत के तमिल समुदाय द्वारा मनाया जाता है। यही नहीं थाईपुसम उत्सव केवल भारत में ही नहीं बल्कि यूएसए, श्रीलंका, अफ्रीका, थाईलैंड जैसे अन्य देशों में तमिल समुदाय द्वारा मनाया जाता है। थाईपुसम उत्सव में भगवान मुरुगन की पूजा की जाती है। थाई पुसम उत्सव तमिल समुदाय का प्रमुख त्योहार है। यह त्योहार किसी मेले से कम नहीं होता। थाईपुसम उत्सव हर वर्ष थाई के तमिल महीने में पूर्णिमा पर मनाया जाता है जो अंग्रेजी कैलेंडर के जनवरी-फरवरी महीने में आता है। पुसम शब्द, एक तारा को संदर्भित करता है जो इस त्योहार के समय अपनी उच्चतम स्थिति में होता है। इस वर्ष थाईपुसम उत्सव 8 फरवरी शनिवार को मनाया जाएगा। 

थाईपुसम उत्सव

थाईपुसम मनाने का इतिहास

हिन्दूओं द्वारा मनाए जाने वाले थाईपुसम उत्सव में भगवान मुरुगन की जयंती होती है। भगवान मुरुगन भगवान शिव और देवी पार्वती के छोटे पुत्र कार्तिकय हैं जिन्हें रुगन, कार्तिकेय्या, सुब्रमण्यम, संमुखा, शदानाना, स्कंद और गुहा आदि नामों से भी जाना जाता है। यह त्योहार पौराणिक कथाओं को याद दिलाता है जब भगवान मुरुगन ने दुष्ट राक्षस को पराजित किया था। ऐसा माना जाता है कि इस दिन देवी पार्वती ने भगवान मुरुगन को ताराकासुर नामक राक्षस और उसकी सेना को मारने का आदेश दिया था। जिसके बाद भगवान कार्तिकेय ने बुराई पर अच्छाई की जीत हासिल करते हुए तारकासुर का वध किया। इसी के फलस्वरुप यह थाईपुसम महोत्सव मनाया जाता है। इसे बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव भी कहते हैं। थाईपुसम उत्सव पूर्णिमा के दिन से शुरू होकर दस दिनों तक चलता है। हजारों भक्त भगवान के प्रति अपनी भक्ति साबित करने के लिए मंदिरों में इकट्ठे होते हैं। स्कंद पुराण के अनुसार, मुरुगन शिव के प्रकाश और ज्ञान का अवतार है। भक्त बाधाओं को दूर करने और बुराई को खत्म करने के लिए भगवान मुरुगन से प्रार्थना करते हैं। थाईपुसम त्योहार का मकसद भगवान की प्रार्थना करना और उसकी कृपा प्राप्त करना है ताकि भक्तों के बुरे गुण नष्ट हो जाएं।

क्या होता है थाईपुसम उत्सव

तमिल समुदाय के लिए थाईपुसम एक बड़ा उत्सव है। यह दक्षिण भारत और दक्षिण पूर्व एशिया के कई स्थानों पर मनाया जाता है, जहां तमिल समुदाय की जड़ें होती हैं। थाईपुसम तमिलनाडु में पलानी शहर में बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है। हजारों भक्त पवित्र थाईपुसम उत्सव के दौरान विशेष रूप से पलानी मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। थाईपुसम दिन पर, भक्तों की बड़ी संख्या 'छत्रिस' (कवडी) ले जाने वाले जुलूस के साथ मुरुगन मंदिरों की तरफ बढ़ते है। वे नृत्य के साथ आगे बढ़ते हैं, ड्रम को बजाते हैं और 'वेल वेल शक्ति वेल' का जाप करते हैं, जिसकी आवाज जुलूस को विद्युतीकृत करती है। कुछ भक्त अपनी जीभ और गाल में 'वेल' (छोटे लेंस) के साथ छेद करते हैं। भक्त भगवान मुरुगन को पीले और नारंगी फल एवं फूल चढ़ाते हैं। वे पीले या नारंगी रंग के रंगीन पोशाक पहनते हैं। इन दो रंगों की पहचान मुरुगन के साथ की जाती है। भक्त आध्यात्मिक रूप से प्रार्थना और उपवास के माध्यम से स्वयं को 48 दिनों तक त्योहार मनाने के लिए तैयार करते हैं। त्योहार के दिन, भक्त भगवान के आगे अपना सिर झुकाते हैं और धार्मिक अनुष्ठान के विभिन्न कृत्यों में खुद को शामिल करते हुए तीर्थयात्रा के लिए बाहर निकलते हैं। विशेष रूप से इस दिन भक्त कांवड़ लेते हैं। कुछ भक्त कावंड़ के रूप में दूध का एक बर्तन लेते हैं। कुछ त्वचा, जीभ या गाल में छेद कर कांवड़ या बोझ लेते हैं। इस त्योहार में सबसे कठिन और तपस्या का जो अभ्यास होता है वो ‘वाल कांवड़’ है। वाल कांवड़ एक पोर्टेबल वेदी है जो लगभग दो मीटर लंबा है और मोर पंखों से सजा हुआ होता है। इसे भक्त अपनी छाती में छेद कराकर 108 वेल्स के माध्यम से शरीर में जोड़ते हैं। ये भक्त भगवान की भक्ति में इतने लीन रहते हैं कि इन्हें किसी भी तरह की दर्द, तकलीफ का अहसास तक नहीं होता। वहीं यह छेद कराते वक्त ना खून निकलता है ना ही इन छेदों के निशान रह जाते हैं। कई बार थाईपुसम के दौरान भक्त स्वंय की भक्ति साबित करने के लिए आग पर चलते है एवं अपने आप को चाबूक मारते हैं। भक्तों के लिए थाईपुसम त्योहार भगवान मुरुगन के प्रति समर्पण का उत्सव है।

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