गोआ में "फीस्ट ऑफ थ्री किंग्स" प्रसिद्ध त्योहारों मे से एक है | यदि हिन्दी में इसे अनुवादित करें तो तीन राजाओं की दावत कहा जाएगा| यह उत्सव फेस्टा डोस रीस या थ्री किंग्स डे या दी इपिफ़नी के उपलक्ष्य में मनाया जाता है | इन तीन अलग-अलग नामों का मतलब प्रभूप्रकाश या आविर्भाव होता है, जिसका तात्पर्य ईसामसीह का जन्मोत्सव जो, 6 जनवरी को मनाया जाता है | यह उत्सव उत्तरी गोआ के वेरेन और दक्षिण गोआ के चन्दोर और कॅन्सवूलीम में अधिक मनाया जाता है | इस उत्सव को ईसाई धर्म मानने और ना मानने वाले सभी लोग छोटे स्तर में गोआ के प्रसिद्ध चर्च "सेंचुरी ओल्ड स्टोन चॅपेल ऑफ नोस्सा सेन्रा डोस रेमेडिओस" जिसे "लेडी ऑफ क्यूर्स" के नाम से भी जानते है में जाकर बड़े उल्लास के मनाया जाता है |

थ्री किंग्स फीस्ट उत्सव

हर वर्ष गोआ में मनाया जाने वाला यह उत्सव "वांगॉड़डस" गौँकर्स समुदाय (भारतीय मूल के गोआ निवासी) जो कंसौलिं, अरोस्सीम और कुएलिम के अंतर्गत आते है | इसी समुदाय के लोगों ने गोआ में बने इस चर्च के निर्माण में बहुत सहायता की थी| इस उत्सव की तैयारी लगभग साल भर से चलती रहती है और अपने अंतिम चरण में तब आती है ,जब तीन किंग्स बनाए जाने के लिए तीन युवा लड़कों का चयन किया जाता है |

थ्री किंग्स फीस्ट उत्सव का महत्व

चर्च में मनायें जाने वालें इस उत्सव का अपना ही महत्व है | ऐसा कहां जाता है कि "दी लेडी ऑफ माउंट" लोगों की संरक्षक के रूप मे जानी जाती है | लेडी ऑफ माउंट प्रजनन की देवी के रूप में भी पूजी जाती है | शादीशुदा जोड़े जिन्हें बच्चे ना होने की समस्या होती है, उन्हें प्रजनन की देवी लेडी ऑफ माउंट की पूजा करने की सलाह दी ज़ाती है| चमत्कारिक इलाज़ के लिए ऐसे जोड़े जब बच्चे की चाहता करते है, तब वें लोग इन देवी की उपासना करते है| मान्यता है कि चॅपेल में सच्चें दिल से देवी की आराधना करने वालें अनुयाइयों की वह हर प्रार्थना सुनती है |
थ्री किंग्स डे

थ्री किंग्स उत्सव मुख्यतः लेडी ऑफ माउंट की पूजा हेतु मनाया जाता है | अनुयायी देवी की प्रतिमा को फूल, फूलों के हार, सोने और आभूषणों से सजाते है और आभार के प्रतीक के स्वरूप अपनी ओर से कई भेंट चढ़ाते है | हर वर्ष "दी लिट्ल स्टोन चॅपेल ऑफ नोस्सा सेन्रा डोस रीस" में हज़ारों की संख्या में लोग एकत्रित होते है, लेडी ऑफ माउंट के प्रति अपना आभार जताने हेतु जो उनके लिए प्रेम और विश्वास के प्रकाशस्तंभ के समान है | इस स्थान में लोग मिलकर हर्ष और उल्लास के साथ यह पर्व मनाते है | नौ दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में चॅपेल हिल्स पूरी तरह जगमगा उठती है| इस पूरे नौ दिन लोग नाचते-गाते हुए पार्टी करते है | लेडी ऑफ माउंट के सामने रोज़री उच्चारित करते है | इस पहाड़ी तक आने के लिए वाहनों की व्यवस्था होने बाद भी लोग आस्था के चलते उपर चर्च तक पैदल चलकर आते है |

दी थ्री किंग्स

उत्सव का आख़िरी दिन रंगारंग होता है | तीन राजाओं के लिए शहर से तीन 8-10 वर्ष के बच्चों को राजा बनाया जाता है | उन्हें राजसी परिवेश देने हेतु असल राजा के कपड़े पहनायें जाते है | कपड़ों के साथ राजाओं की तरह ही इन तीनों बच्चों को आभूषणों से सजाया जाता है | इसके बाद तीनों राजाओं की सवारी घोड़ें में तीन अलग-अलग रास्तों से शुरू होती है | राजाओं के इस क्षेत्र में रहने वालें सभी लोग राजा की प्रजा के भाँति इस यात्रा में शामिल होते है | राजाओं के घोड़ों के आगें ड्रम लिए बच्चे चल रहे होते है| तीनों राजाओं की यह यात्रा भगवान "बालक यीशू" को आभार स्वरूप भेंट देने के लिए होती है | तीनों राजा अलग-अलग रास्तें से चल आते हुए हिल के पास एक रास्तें में मिल जाते है और साथ चलने लगते है | राजाओं के चलने वाले मार्ग को "पाज़" कहते है| हिल के पास पहुँचकर सभी राजा घोड़ों से उतरकर पैदल ही आगें की यात्रा करते है |
दी थ्री किंग्स रंगारंग

हिल के पास आगें जाने के बीच में राजाओं के कई जगह रुकने के स्थान होते है,जिससे वह लोगों से मिल सकें| इन सभी पड़ावों के बाद अंततः सभी राजा उस स्थान पर पहुँचतें है और भगवान यीशू को भेंट देते है| जिसके बाद कुछ आराम करके तीनों राजा अलग रास्तें से लौट जाते जाते है| यहाँ आए लोगों के लिए पास के ही तीन बड़े घरों में दावत की व्यवस्था होती है| दावत में सभी लोगों को पेज़ या कॅंजी परोसा जाता है| इसके बाद सभी लौट जाते है और हिल फिर से सुनी हो जाती है |

मान्यताऐं

ऐसी मान्यता है कि इस पहाड़ी के पास एक बड़ी चट्टान पर एक बालक और एक औरत के पैरों के निशान है, जो मदर मॅरी और भगवान यीशू के है जो यात्रा के दौरान घोड़ो को आराम देने के लिए इस स्थान पर रुके थे | इसी हिल के साथ एक कहानी और भी जुड़ी है वो यह कि यह पहाड़ी रात को डरावनी हो जाती है| कहा जाता है कि महाराज शिवाजी और उनके सैनिक रात में मशाल लेकर चलते है और उनके चलने से होने वाली मार्च की आवाज़ पूरे इलाकें में सुनाई देती है, इसलिए इस त्योहार के बाद यह चर्च पूरी तरह से सुना हो जाता है | इसी वजह से इस चर्च में कोई पादरी भी नही रुकता है | कुछ इतिहासकारों के अनुसार इस जगह पर कई सालों पूर्व मंदिर हुआ करता था, शायद इसलिए इस उत्सव में गोआ में निवास करने वाले हिंदू भी पूरे जोश के हिस्सा लेते है |

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